ग़ज़ल
दुआ में मेरी कुछ यूँ असर हो
तेरे सिरहाने हर इक सहर हो
जहां के नाना झमेले सर हैं
कहाँ किसी की मुझे ख़बर हो
यहाँ तो कुछ भी नहीं है बदला
वहाँ ही शायद नई ख़बर हो
मिले अचानक वो ख़्वाब मे कल
कहीं दुबारा न फिर कहर हो
दिलों दिलों में भटक रहे हैं
कहीं तो अब ज़िंदगी बसर हो
न याद कोई जुड़ी हो तुम से
कहीं तो ऐसा कोई शहर हो
चलो चलें फिर से लौट जायें
शुरु से फिर ये शुरु सफ़र हो
--मानोशी
Labels: poetry
1 Comments:
At 7:55 PM,
मीत said…
क्या बात है. बहुत ख़ूब.
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