मानसी

कुछ दिल से...

Wednesday, March 23, 2005

स्मृतियों के आँगन में


स्मृतियों के विस्तृत आँगन में
मन मन्दिर के इस प्राँगण में
तुम्हारी मूरत के छाँव तले
एक दीपक चुपचाप जले

इक लहराता सा प्रतिबिम्ब
उभरे और हो जाये धूमिल
फिर छलकती बूँदों के सँग
सरिता बन निर्झर झरे

बाँध कर कुछ क्षण आँचल में
डूब कर स्मृति के काजल में
रात पूनम की रूप बिखेरती
बन सादी बिरहिनी झरे

गूँथ कर प्राणों मे ज्यों स्वर
मधुर राग बन झंकृत हो कर
बज उठे जल तरंग सी हवा
प्रणय गीत बन सुर ढले

सीमाऒं के बंधन सब तज
आँखों में सुन्दर सपना सज
दबे पाँव आते हो जब तुम
लहरों का उफ़ान चले

जीवन का प्रतिक्षण प्रतिपल
रहा उन्माद अभिलाषा में जल
मृगतृष्णा में भ्रमित मन अब
लौट चल कि दिन ढले

चुपचाप जल रहा नवैद्य थाल में
स्मृतियों को गूँथ जीवन माल में
अन्तर में छुपा पीडा असह्य
स्वप्न यथार्थ के गाँव चले


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Tuesday, March 15, 2005

ग़ज़ल

बलाग में पहला ख़त मेरा...

हम ज़िन्दगी के साथ चलते चले गये
जैसी मिली हम उसमें ढलते चले गये

छोडा था उसने हाथ एक उम्र हो चुकी
फिर भी ख्वाब जाने क्यूँ पलते चले गये

इक उफ़ भी ना निकली ज़ुबां से उनके
हँस के निगली आग और जलते चले गये

आखिर हम ने तोड ली यादों से दोस्ती
दुश्मनी मे खुद को हम छलते चले गये

आई जो एक आँधी नया दौर कह के
कुछ लोग इसके साथ बदलते चले गये

--मानोशी

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