स्मृतियों के आँगन में
स्मृतियों के विस्तृत आँगन में
मन मन्दिर के इस प्राँगण में
तुम्हारी मूरत के छाँव तले
एक दीपक चुपचाप जले
इक लहराता सा प्रतिबिम्ब
उभरे और हो जाये धूमिल
फिर छलकती बूँदों के सँग
सरिता बन निर्झर झरे
बाँध कर कुछ क्षण आँचल में
डूब कर स्मृति के काजल में
रात पूनम की रूप बिखेरती
बन सादी बिरहिनी झरे
गूँथ कर प्राणों मे ज्यों स्वर
मधुर राग बन झंकृत हो कर
बज उठे जल तरंग सी हवा
प्रणय गीत बन सुर ढले
सीमाऒं के बंधन सब तज
आँखों में सुन्दर सपना सज
दबे पाँव आते हो जब तुम
लहरों का उफ़ान चले
जीवन का प्रतिक्षण प्रतिपल
रहा उन्माद अभिलाषा में जल
मृगतृष्णा में भ्रमित मन अब
लौट चल कि दिन ढले
चुपचाप जल रहा नवैद्य थाल में
स्मृतियों को गूँथ जीवन माल में
अन्तर में छुपा पीडा असह्य
स्वप्न यथार्थ के गाँव चले
मन मन्दिर के इस प्राँगण में
तुम्हारी मूरत के छाँव तले
एक दीपक चुपचाप जले
इक लहराता सा प्रतिबिम्ब
उभरे और हो जाये धूमिल
फिर छलकती बूँदों के सँग
सरिता बन निर्झर झरे
बाँध कर कुछ क्षण आँचल में
डूब कर स्मृति के काजल में
रात पूनम की रूप बिखेरती
बन सादी बिरहिनी झरे
गूँथ कर प्राणों मे ज्यों स्वर
मधुर राग बन झंकृत हो कर
बज उठे जल तरंग सी हवा
प्रणय गीत बन सुर ढले
सीमाऒं के बंधन सब तज
आँखों में सुन्दर सपना सज
दबे पाँव आते हो जब तुम
लहरों का उफ़ान चले
जीवन का प्रतिक्षण प्रतिपल
रहा उन्माद अभिलाषा में जल
मृगतृष्णा में भ्रमित मन अब
लौट चल कि दिन ढले
चुपचाप जल रहा नवैद्य थाल में
स्मृतियों को गूँथ जीवन माल में
अन्तर में छुपा पीडा असह्य
स्वप्न यथार्थ के गाँव चले
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