Monday, June 05, 2017

बंधन

बंधन बहुत मीठा होता है, अधिकार बहुत सुंदर| प्यार में दोनों साथ-साथ चलते हैं, रुक कर एक दूसरे को सहलाते हैं, हँसते हैं, खिलखिलाते हैं, गम में संग मुस्कराते है....और एक दिन जब प्यार बन जाता है नियंत्रण, अधिकार बदल जाता है स्वामीत्व में, कसते-कसते, बंधन बनने लगता है फंदा, तब खुशी बन जाती है  घुटन, हँसी एक दबी चीख, मु्स्कान बेड़ी, और जीवन...एक दंड...












Saturday, February 18, 2017

मुहब्बत

मुझे इस ख़याल से मुहब्बत है
कि तुम्हें मुहब्बत है मुझसे।

ख़यालों की दीवानगी
में भटकती हूँ ,
किसी कहानी के किवाड़ के पीछे
छुप जाती है हक़ीक़त,
मेरी तन्हाई पे गिरती है बिजली ,
रूह चौंकती है,
पोर-पोर में बसे मिलते हो तुम,
सराबोर तुमसे मैं
तीर बन जाना चाहती हूँ,
उस पागलपन के चक्रव्यूह से निकल
किसी बादल पर जा कर अड़ जाना
चाहती हूँ ,
जो झमाझम बरस पड़े
तो भीग जाए तुम्हारा तन, मन, रूह
उस कठिन धरती पे बो आऊँ एक बीज
कल जो पौधा बने तो उस की छांव मेरी हो,
मुझे उस छांव से मुहब्बत है कि
तुम रोपोगे वह छांव
मुझे उस खयाल से मुहब्बत है कि
तुम हक़ीक़त हो मेरी,
मुझे मुहब्बत है तुमसे...

--मानोशी

Tuesday, January 10, 2017

माँ सुनो...


माँ सुनो,
आँखों में अब परी नहीं आती,
तुम्हारी थपकी नींद से कोसों दूर है,
आज भूख भी कैसी अनमनी सी है
तुम्हारी पुकार की आशा में,
"मुनिया...खाना खा ले"
माँ सुनो,
मैं बड़ी नहीं होना चाहती थी,
तुम्हारी छोटी उंगली से लिपटी
रहना चाहती थी,
छोटी बन कर ।
याद है माँ?
मैं माँ बनना चाहती थी?
'तुम' बनना चाहती थी?
बालों में तौलिया लगा कर?
बड़ी बिंदी में आईने से कितनी बातें की थीं...
सुनो माँ,
एक और बचपन उधार दोगी ?
बड़े जतन से
धो-पोंछ कर रखूँगी,
और जब बड़ी हो जाऊंगी,
बचपन-बचपन खेलूंगी
मैं, तुम बन कर..
माँ, 'तुम' ही तो हूँ न मैं?
तुम नहीं हो तो क्या...
मानोशी

Tuesday, January 03, 2017

गीत में अब मैं तुम्हें लिख नहीं पाती

गीत में अब मैं तुम्हें लिख नहीं पाती।

शब्द जैसे पंखुड़ी बन झर गये हैं,
भावनाओं के भ्रमर भी मर गए हैं,
छंद औ' गीतों में छिड़ता द्वन्द कोई 
बंद सारे इधर-उधर बिखर गए हैं,
ये अधूरी कथायें अब नहीं गाती। 

दूर तक किस शून्य को मैं देखती हूँ,
मन-तरंगों से संदेसा भेजती हूँ, 
क्यों जगत के सामने मैं प्रेम रोऊँ?
अश्रु-जल इस व्यथित हृदय सहेजती हूँ,
मूर्ति जो मन में बसी वह नहीं जाती। 

दिन गुज़रता ज्यों बड़ी चट्टान कोई
नहीं दिखता दूर तक अवसान कोई 
गहन वेदना शूल बन कर संग रहती 
बन रही मेरी यही पहचान कोई 
समय की यह सुई तो थम नहीं पाती...

--मानोशी 










Monday, August 22, 2016

A Journey - सफ़र- सुनिए एक गीत के अंश

मेरे आने  वाले  एल्बम "A Journey सफ़र" से एक  ट्रैक का अंश सुनने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें - 



Wednesday, August 17, 2016

सफ़र - A Journey

बड़ों के आशीर्वाद और दोस्तों की दुआओं का कारण है कि मेरे गीतों का यह अल्बम आप सब के समक्ष जल्द ही होगा| "सफ़र" के नाम से जल्द ही रिलीज़ होने वाला यह एल्बम एक जीवन का सफ़र है...अल्हड़ता, प्रेम, विरह, जीवन और जीवन की प्राप्ति तक का सफ़र - इसीलिए इस एल्बम का नाम है - " A Journey" या सफ़र | गीत और संगीत की कोशिश मेरी अपनी है और संगीत अरेंजमेंट किया है सुरजीत दास जी ने|  आशा है रिलीज़ होने पर आप सब को यह एल्बम पसंद आयेगा और इस के शब्द व संगीत  सब के दिलों तक पहुंचेंगे| 

अभी कवर की तसवीरें - 




Wednesday, June 22, 2016

खिल रही खिल-खिल हँसी

खिल रही खिल-खिल हँसी
जीवन हुआ फूलों भरा,
शाम कोई ढल रही है
विहँसती है नवधरा |  

अंकुरित से स्वप्न थे जो 
नींद से अब जग रहे
राह पथरीली रही 
निश्चय सदैव अडिग रहे,
बहुत थी दुश्वारियाँ  
आसान कुछ भी था नहीं
थे फफोले पाँव में पर
स्थिर हमारे पग रहे, 
बादलों के ओट से जो झाँकती है रोशनी, 
खुल रहा मौसम चलो अब  
छंट रहा है कोहरा


मैं चली निर्बाध गति
जिस ओर नदिया ले चली,  
नाव काग़ज़ की रही पर 
दूर तक खेती चली,
था किनारा ही नहीं कोई
क्षितिज के छोर तक,
सुनहरी आभा लुभाती
स्वयं के माया छली,
काट कर सब रेशमी जाले
छलावे तोड़ कर, 
एक निश्चित ठौर ढूँढे
अब कहीं मन बावरा |

साँझ ढलती है मगर इक 
अजब सा अहसास है
छूटता है वो कभी जो दूर था 
पर पास है
कुछ हृदय में मच रही हलचल 
कहीं इक दर्द है,
पर सवेरा धवल होगा
यह बड़ा विश्वास है,
भूल पाना भी विगत को 
कब सहज होता मगर
‘गर कदम हों दृढ़, सुना है
समय देता आसरा |  

--मानोशी 


Friday, May 27, 2016

देवदार के पेड़

Image result for cedar forest rain

शीश झुका कर ज्यों रोये हैं
देवदार के पेड़
बादल के घर ताक-झाँक
करने की उनको डाँट पड़ी है 
भरी हुई पानी की मटकी
सर से टकरा फूट पड़ी है
सूरज भी तो क्षुब्ध हुआ है
उसका रस्ता रुद्ध हुआ है
दिन भर चिंता में खोये हैं
देवदार के पेड़
थका हुआ सा दिन ले आया
कुहरे का इक बड़ा पिटारा
उसके पीछे फँसा पड़ा था
दल से बिछड़ा हुआ सितारा
टहनी-टहनी कुहरा छाँटे
आपस में संदेशा बाँटे
सारी रात नहीं सोये हैं
देवदार के पेड़
नई सुबह अब बाण सुनहरे
चला रही है आड़े-तिरछे
बादल भी अब संभले हैं कुछ
शांत हुए हैं इस के पीछे
गीले तन को पोंछ तने हैं
नए रूप में सजल बने हैं
किरणों की क्यारी बोये हैं
देवदार के पेड़

Manoshi

Sunday, March 20, 2016

तब और आज


तुम्हारा खिलखिलाना
हँसते रहना,
बात-बात पर
मेरी बातों का
भँवर सा जवाब देकर 
शरारत से यूँ देखना कि
मैं उस भँवर में डूब जाता,
एक मिनट की गंभीर चुप्पी
के बाद खुद ही को टटोल कर
हँस पड़ता,
और तुम्हारी आँखों की शरारत
दुगुनी हो जाती,
जैसे कुछ पा लिया हो तुमने
और मेरी इच्छा होती,
कि खींच लूँ तुम्हें ,
एक हल्की चपत लगा दूँ गालों पर
और प्यार से भर लूँ बाँहों में
पर कर नहीं पाया कभी,
...
आज तुम चुप हो
आज मैं तोड़ नहीं पा रहा तुम्हारी चुप्पी
आज भी मन है
कि भर लूँ तुम्हें बाँहों में
खींच लूँ अपने पास,
पर कर नहीं पाता
फर्क बस इतना है कि
तब तुम मेरे पास थी बहुत
आज, बहुत दूर हो कहीं...
----मानोशी

Saturday, February 13, 2016

प्यार और पागलपन

तुम कहते  हो
तुम ऐसी क्यों हो?
कोई तुम सा नहीं,
कोई पागल न हो जो तुम्हारे साथ रहे...?
अब सच  यकीं होने लगा है मुझे, 
इतनी दूरी में भी पास का अहसास कर लेना
बातो से ही मन बहला लेना
और एक दिन अचानक खोने के डर से 
सब तोड़ देना,
मेरा पागलपन,
तुम्हारा प्यार,
कुछ एक जैसा ही तो है. 




Saturday, February 06, 2016

जीवन कथा

नए भवन में
नई गृहस्थी,
डाल-डाल पर तितली तितली.

कली-हृदय कुछ अस्फुट सा है,
स्वप्न,  नींद में अंकुर सा है,
लगता जग सुन्दर निष्पापी
https://ssl.gstatic.com/ui/v1/icons/mail/images/cleardot.gifहृदय बड़ा सागर जैसा है,

चंचल मन में
कितने सपने,  
जीवन खट्टी मीठी इमली.

आँगन में चन्दा उतरेगा,
हँसकर मेरी गोद छुपेगा,
तारो की लोरी सुनकर मन
धीरे-धीरे झूम उठेगा,

नाचेगा जीवन
नन्हें हाथो की डोरी
बन कठपुतली.

खुशियों के ज्यों कलरव उठते
नीड़ चहकते सुबह सवेरे,
जीवन की आपाधापी फिर  
कम हो जाती धीरे-धीरे,

रह जाता खाली आँगन,  ज्यों
छुप जाती
बादल में बिजली.


---मानोशी 

Tuesday, January 05, 2016

कैसे कह दूँ आंखों में अब बाकी कोई स्वप्न नहीं है ।














कैसे कह दूँ आंखों में अब बाकी कोई स्वप्न नहीं है ।

जब आँधी ने ज़ोर पकड़ ली
तब भी हार नहीं मानी थी,
बारिश, तूफ़ां, रात घनेरी
सब से लड़ने की ठानी थी,
ध्वस्त किले में बना खंडहर
सो रहा है , मगर अभी भी
सुंदर किस्से बांच रहा है 
थका नहीं है स्वप्न कभी भी 

मिली नहीं हो जीवन भर की खुशियाँ लेकिन बिखरी-बिखरी
इधर-उधर मिल जायेंगी टुकड़ों में, साथी, ढूँढ! यहीं हैं...


यूँ तो जीवन बीत गया पर 
अभी अधूरा सा लगता है,
क्या पाया क्या खोया बस यह
गिनने मे ही दिन कटता है 
आंखें आंसू से धोती जब
मेरे दुख के मुर्झाये पल
बच्चों की किलकारी से खिल
उठता आंखों में पलता कल

शाम ढले फिर हो जाता है दिल बोझिल पत्थर सा कोई
वो जो छूट गया पीछे फिर मिलता क्या अब दोस्त कहीं है?

कैसे कह दूँ आंखों में अब बाकी कोई स्वप्न नहीं है...

Manoshi

लौट पाते पर कहीं यदि पल पुराने...


बहुत सुंदर है हमारा कल यकीनन,
लौट पाते पर कहीं यदि पल पुराने ।

संग में जो चित्र खींचे
हो रहे साकार अब पर, 
रंग सारे घुल गये हैं
वक्त के उस कैन्वस पर।
तूलिका इक हाथ ले कर
साथ में जो बुने सपने,
दीर्घ रजनी में गुमे हैं
शेष इक आभास है भर ।

अब उसी आभास को हम
चलो छू लें,
संग में अब चलो जी लें,
कल सुहाने ।

आज भी कुछ ख़्वाब मेरे
रखे सिरहाने तुम्हारे
जागते हैं रात भर
पर लुप्त हो जाते सेवेरे,
स्पर्श इक पल का तुम्हारा
दौड़ता है हर शिरा मे,
गंध की अनुभूति कोई
समा जाती बहुत गहरे,
एक भीनी हवा छू कर गई
जैसे,
बदलती जीवन-कथा के
सभी माने।

घेरता था बढ़ अंधेरा
जब अचानक हर तरफ़ से,
दूर कोई रोशनी तब
इक अजाना पथ दिखाती
आस की डोरी इशारों
ने तुम्हारे बाँध दी तो
कभी मेरी क्षणिक आशा
फिर तुम्हें चलना सिखाती,
चांद तक का हो सफ़र
अब पूर्ण शायद,
मिले शायद ख्वाब को भी
अब ठिकाने।

--मानोशी 

Sunday, October 25, 2015

दुर्गा पूजा पर

माँ का फिर आह्वान हुआ है 
जगत उल्लसित पुलक उठा।

शरत-प्रात की धवल धूप में 
ठण्ड गुलाबी नहा रही
कास फूल की लहर चली है
हवा हर्ष की बहा रही 

लाल पाड़ की घूँघट ओढ़े 
दीपक थाली हाथ लिये
पूजा को जब चली सुहागिन
हर दिक् चंदन महक उठा।

शंख नाद के साथ उलू ध्वनि 
थाप ढाक की मतवारी
बच्चों के दल के कलरव से
विहँस उठीं गलियाँ सारी

प्रतिमायें सज उठीं मनोरम
पंडालों से सजे शहर
आलोकित जग मन उत्साहित
हृदयांचल भी दमक उठा।

पुष्पांजलि संग मंत्रोचारण
रंग अल्पना के निखरे
महिषासुर मर्दिनी पधारो
आवाहन के स्वर बिखरे

हे दुर्गे, हे दुर्गतिनाशिनि
जग अँधियारा दूर करो
माँ के श्री चरणों में आकर 
अश्रु दृगों में छलक उठा।

- मानोशी चटर्जी   
१५ अक्तूबर २०१५

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/mamtamayi/2015/geet/manoshi_chatterjee.htm

Thursday, October 08, 2015

क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन



अनगिन तारो में इक तारा ढूँढ रहा है,

क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन।

छोटा सा सुख मुट्ठी से गिर

फिसल गया,
खुशियों का दल
हाथ हिलाता निकल गया
भागे गिरते-पड़ते पीछे,
मगर हाथ में 
आया जो सपना वो फिर से
बदल गया,
सबसे अच्छा चुनने में उलझा ये जीवन।
क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन।


सबकी देखा-देखी में 
मैं भी इतराया,
मिला नहीं कुछ मगर ह्रदय
क्षण को भरमाया,
आसमान को छू लेने के पागलपन में,
अपनी मिट्टी का टुकड़ा 
बेकार गँवाया,
सीधा सादा जीवन रस्ते कांकर बोये,
फूलों के मधुरस में भी 
पाया कड़वापन।
क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन।


--Manoshi