Thursday, March 01, 2012



आज दुनिया मना रही होली
शोर फिर से मचा रही होली

मीठी रस्में निभा रहे हैं कुछ
गालियाँ भी निभा रही होली

मैल मन का जला नहीं अब तक
कब से दुनिया जला रही होली

साल दर साल बदलते चेहरे
अक़्स कितने मिटा रही होली

डिस्को पब हो गया है कल्चर जो
फाग-होरी भुला रही होली

Saturday, January 21, 2012

प्रिय न जाओ,



स्वार्थ मेरा रोकता है, प्रेम कहता प्रिय न जाओ,
चाहती हूँ कह सकूँ पर कहूँ कैसे, प्रिय न जाओ...

सिर्फ़ मेरे कब हुये तुम, मन तुम्हें कब बाँध पाया,
विरह-पीड़ा हदय की पाषाण मन कब जान पाया,
स्वयं को मैं रोक भी लूँ अश्रु थमते ही नहीं हैं
शूल जिसको बींधता है वही उसको जान पाया,
बस तुम्हें कर्तव्य प्रिय, मैं कुछ नहीं? हे प्रिय न जाओ...

जगत के जो नियम हैं वह मानना है, मानती हूँ,
राह आगे की कठिन है सत्य यह भी जानती हूँ,
प्रेम पर विश्वास है पर धैर्य मेरा छूटता है,
तुम भले योगी मगर मै संग-सुख अनुमानती हूं,
है तुम्हीं से जगत तुम संसार मेरे, प्रिय न जाओ...

प्रेम तो अनुभूति है अभिव्यक्ति में है छल समाया,
प्रेम होता आत्मा से, दो दिवस की मर्त्य काया,
दूर होने से भला क्या प्रेम भी घटता कहीं है?
यह सभी मैं जानती हूँ पर कहाँ मन मान पाया,
एक ही जीवन मिला है संग तुम्हारे, प्रिय न जाओ...

चाहती हूँ कह सकूँ पर कहूँ कैसे प्रिय न जाओ।

Wednesday, January 18, 2012

जीवन


सुबह का सपना था
एक तारा टूट कर बिखरा था
और फिर सूरज की रोशनी में धूमिल...
दूर दूर...बहुत दूर ...

हर शाम एक तारा टूटता है
फिर रात भर बिखरता है
कुछ बुने-अनबुने पलों से बना
एक पूरा समय खुल जाता है
एक अधूरी कहानी का आखिरी पन्ना
फड़फड़ाता है, पूरा होने को....

पल-पल गिनती है ज़िंदगी,
दर्द के कलम से 
एक लम्हा लिखती है
उधेड़ती है उसे फिर 
और 
हँसती है, खिलखिलाती है,
एक टीस उगली में पिरो कर
एक और पल बिनती है
आसपास देख कर
उधेड़ती है उसे और मुस्कराती है....

अब तो शाम भी ढलने आई, 
रात भी कटने वाली है....
टूटा तारा भी खो चुका है....

एक जीवन पूरा होता है,
रेत पर कोई निशान नहीं
कहानी पूरी होती है
बिना किसी कथानक के 
खाली, कोरे पन्ने शांति से
बंद हो जाते हैं किताब की तह में...

Sunday, January 15, 2012

शीत का आँचल फिर से फहरा


पिछले सप्प्ताह बर्फ़ पड़ी। बर्फ़ पड़ने के बाद वाले दिन, जब पूरी ज़मीन ढकी होती है सफ़ेद रूई से, और निकलती है खूबसूरत झिलमिलाती धूप, जब  -२५ डिग्री सेलसियस तक तापमान नीचे जाता है,  तब कुछ ऐसी होती है ठंड की सुबह, दोपहर और रात यहाँ, कनाडा में...





शीत का आँचल फिर से फहरा|

जैसे मोती पात जड़े हैं,
हीरक कण झरते, बिखरे हैं,
डाली-डाली लुक-छुप लुक-छुप
दल किरणों के खेल रहे हैं,
गोरे आसमान के सर पर
धूप ने बाँधा झिलमिल सेहरा |

शीत का आँचल फिर से फहरा |

बूढी सर्दी हवा सुखाती,
कलफ़ लगा कर कड़क बनाती,
छटपट उसमें फ़ँसी दुपहरी
समय काटने ठूँठ उगाती,
चमक रहा है सूर्य प्राणपन,
देखो उसका विफल सा चेहरा |

शीत का आँचल फिर से फहरा| 

रात कँटीली काली डायन,
सहमे घर औ’ राहें निर्जन,
है अधीन जादू निद्रा के 
सभी दिशायें, जड़ औ’ जीवन,
अट्टहास करती रानी जब
सारा जग ज्यों जम कर ठहरा |

शीत का आँचल फिर से फहरा |

Sunday, December 25, 2011

नया वर्ष २०१२- शुभकामनायें



"मिसेज़ सी, आई हैव गॉट अ प्रेसेन्ट फ़र यू फ़ॉर क्रिसमस"
"इट वॉसंट नेसेसरी, हन"
"बट आई ऑल्रेडी गॉट इट (रुँआसे स्वर में)"
"रीअली? आई ऍम सो वेरी एक्साइटेड, आई कांट वेट टु ओपेन इट, कॅन आई गेस व्हॉट इट इज़?"

और एक मुस्कान खिल गई उस बच्चे के चेहरे पर।  क्रिसमस की छुट्टियों को अभी ५ दिन और थे मगर सोमवार से ही बच्चों से क्रिसमस के प्रेसेंट मिलने लगे थे।  सब उत्साहित थे। शुरुआत में मैंने कह दिया कि यह ज़रूरी नहीं, तुम सब मुझे अच्छा काम कर के दिखाते हो वही मेरे लिये प्रेज़ेंट है, मगर जब देखा कि बच्चे दुखी हो जाते हैं मेरे इस भारी भरकम वाक्य से तो फिर मैंने अपने शब्द बदल दिये। अब हर बार कोई बच्चा मुझे बताता कि वह मेरे लिये क्रिसमस का तोहफ़ा खरीद रहा है या वह उसे आज गिफ़्ट रैप करेगा, तो मैं भी उसे बड़े ही उत्साहित हो कर कहती कि वाह! मैं कितनी खुश हूँ कि मुझे इतने तोहफ़े मिल रहे हैं।  और बच्चे कितने खुश हो जाते।

 कभी सोचती हूँ कि हम बड़े भी तो बच्चे ही होते हैं। हमारे दिये हुए किसी चीज़ को कोई खुश हो कर न ले तो हमें भी कितना दुख होता है।  ’ना-ना’ करने के बजाय तारीफ़ कर के तोहफ़ा लेना क्या बेहतर नहीं?

दिवाली, ईद, क्रिसमस, क्वान्ज़ा और हनुका ये सारे त्यौहार एक दो महीने के अंदर ही पड़ते हैं।  इस साल इन महीनों में मैंने भी बच्चों के साथ बहुत कुछ सीखा। हर त्यौहार के ऊपर हम सबने मिल कर विडियो देखे, किताबें पढ़ीं, और किसी ऐसे व्यक्ति को कक्षा में उस त्यौहार विशेष के बारे में कहने को आमंत्रित किया जो उस त्यौहार को मनाता है।  दिवाली के बारे में मैंने ही बच्चों को बताया, ईद के लिये एक अभिभावक ने आकर बच्चों को समझाया और क्रिसमस के लिये एक क्रिसचन टीचर ने बताया।  हनुका (यह jews  का त्यौहार है और ८ दिन तक मनाया जाता है) के लिये कोई मिला नहीं मगर हम सबने मिल कर किताबें पढ़ीं और एक आर्ट प्रोजेक्ट किया (हनुका रीथ बनाया)।  क्वान्ज़ा अफ़्रीकन अमेरीकन लोग २६ तारीख़ से ले कर ७ दिन तक मनाते हैं। इस त्यौहार के बारे में भी मैंने बच्चों को किताब पढ़ कर सुनाई और उनके रिवाज़ों को जाना। यह सब करने के बाद हमने इन त्यौहारों के बीच की समानतायें और पार्थक्य पर गवेषणा की।  ७-८ साल के बच्चे अब इन त्यौहारों के बारे में विस्तार से जानते हैं और इन के बीच की समानतायें व भिन्नतायें बता सकते हैं।  और समानता यह कि सभी त्यौहारों में किसी भगवान के दूत या अवतार का महत्व है। हर त्यौहार में रोशनी का महत्व है और घर सजाये जाते हैं, दीया या मोमबत्ती जलाई जाती है और सबसे ज़रूरी, अच्छाई की बुराई पर विजय का जश्न मनाया जाता है।

कल ही से क्रिसमस की छुट्टियाँ शुरु हुई हैं। बच्चों की "मेरी क्रिसमस " और " हैपी न्यू ईअर" के बीच दिन खत्म हुआ कल। बच्चों के इन आर्ट प्रोजेक्ट व और कुछ कामों को लगाया  है स्कूल की दीवारों पर। हनुका रीथ कैसे बनाया जाये, इन्टरनेट से ही मिल गया। इंटरनेट तो वरदान है मेरे लिये। इनकी तस्वीरें नहीं ले पाई, पर छुट्टी के बाद  इस पोस्ट को अपडेट करूँगी, तस्वीरों के साथ।

सभी को क्रिसमस व नये वर्ष २०१२ की शुभकामनायें।







Monday, October 31, 2011

आज हैलोवीन का त्यौहार था।  भूतप्रेतों को याद करते इस त्यौहार के दिन स्कूल में बच्चे तरह-तरह के कपड़े पहन कर आये थे।  छोटे-छोटे प्यार- प्यारे कूदते-फ़ाँदते बच्चे।  कोई कद्दू बना था तो कोई छोटा सा भूत।  कोई माइकल जैकसन तो कोई तितली या परी। और मैं  उनकी टीचर ,चुड़ैल।  सर पर चुड़ैल की टोपी पहन बच्चों का सुबह स्वागत करते हुये बच्चों की खिलखिल और उत्साह में मेरे अंदर भी एक लंबा दिन काटने का उत्साह भर जाता है रोज़।  छोटे-छोटे बैग में कुछ खिलौने और कैंडी भर कर कक्षा के कोने कोने में छुपा रखे थे मैंने। हर बैग में बच्चों का नाम लिख दिया था। फिर बच्चों को उन बैग को ढूँढना था और उनका नाम मिला बैग उन्हें दिख जाये तो वह बैग उनका।  ऐसे ही खेल-खेल में हुई पढाई आज।  

छोटे बच्चों को पढ़ाते हुये उनसे काफ़ी कुछ सीखने को मिला।  प्रामिस इज़ अ प्रामिस।  कभी भी कोई वादा कर के न निभाऊँ तो बच्चे कैसे सीखंगे कि जो वादा किसी से किया कभी तो उसे निभाना है। चाहे एक किताब पढ़ने की बात हो या कोई पुरस्कार देने की, अगर वादा है तो उसे पूरा होना है।  बच्चे भी तो जानते हैं कि हमारी टीचर ने कहा है तो ज़रूर होगा वह काम।  चाहे वह खेल हो या पढ़ाई।  

बच्चों की काबिलियत पर अचरज होता है मुझे।  कितने ही काम हैं जो सोचती हूँ शायद बच्चे नहीं कर पायेंगे, पर  बाद में हैरानी होती उनके काम को देख कर।  आर्ट या कला बहुत पसंद करते हैं बच्चे।  उनको अगर बता दिया जाये कि किस तरह से उनका काम सबसे अच्छा हो सकता है तो वह भी कोशिश करते हैं। हमेशा ही एक उदाहरण दिखाना ज़रूरी होता है। एक बुरा उदाहरण और एक अच्छा उदाहरण। जैसे कि किसी प्रश्न का बुरे उदाहरण का जवाब कैसा होगा और अच्छे उदाहरण का जवाब कैसा होगा।  किसी अच्छे जवाब के लिये या अच्छे काम के लिये बच्चे को क्या करना होगा कि वह काम जो बच्चे ने किया वह अच्छा काम कहलाये।  

एक वर्कशाप में एक इन्स्ट्रक्टर ने कहा- "ताली बजाइये, मैं आपको पास या फ़ेल बताऊँगी" मैंने तीन बार ताली बजाई। तो इन्स्ट्रक्टर ने कहा." आप फ़ेल हुई"। मुझे समझ नहीं आया। तब इन्स्ट्रक्टर ने कहा, " अच्छा अब मैं आपको बताती हूँ कि मैं आपके ताली बजाने को कैसे जाँच रही हूँ। मुझे ताली एक rhythm  में चाहिये, १२१२३, १२१२३, १२१२३...इस तरह या कोई और ‘पैटर्न’ । इसके अलावा उस पैटर्न को ३ बार दोहराने पर ही आपको नंबर मिलेंगे। तो अब बजाइये " ।  ऐसे ताली बजाने पर मुझे पास कर दिया गया।  इन्स्ट्रक्टर ने बताया, बच्चे में क्षमता होती है मगर ज़रूरी है कि बच्चा जाने कि उसे करना क्या है, कैसे जवाब लिखेगा तो उसे अच्छे नंबर मिलेंगे।  

मेरे बच्चों के काम के कुछ सैम्पल के फोटो निकाले थे।  बच्चों का काम प्रदर्शित करना भी कितना ज़रूरी है। बच्चों का इस तरह का प्रोत्साहन उन्हें मदद करता है और अच्छा कर दिखाने का।  








Sunday, October 16, 2011

जीवन का हर पल प्रिय तुम से





जीवन का हर पल प्रिय तुम से, तुमको ही अर्पित जीवन हूँ ।

रोम-रोम में कस्तूरी ज्यों, आते-जाते श्वासों में तुम,
कविता के उर के स्पंदन हो, बन कर स्वर सब गीतों में तुम ,
संझा दीपक जलता तुम संग, रैना बाती तुम संग बुझती,
सुबह भोर की किरणें भी आँखों से सपन तुम्हारे चुनतीं,
हृदयांगन में तुलसी बन कर महकूँ मैं चिर संग तुम्हारे,
सुख में हो दुख में हो प्रियतम, जो माँगो वह अपनापन हूँ।

चंदा बिन आभा के जैसे, यूँ मैं तुम्हारी स्मृति बिन हूँ,
वीणा हो झंकार रहित जब, वैसे प्राणहीन जीवन हूँ ,
लहरें बिन सागर कब सागर, कब छाया बिन तरुवर होता,
केशव-मन्दिर में कब कोई राधा बिन चरणों को धोता ,
कोयल जब हो कूक रहित औ’ मधुबन फूलों से वंचित हो,
तुम्हारे संबल बिन प्रियतम नीरस जीवन, सूनापन हूँ।

मेरे नयनों में काजल बन चंचलता को बाँध लिया कब?
अश्रु धार में धुलकर पावन पूजा का यह स्थान लिया कब?
नियति डोर में बँध कर जाने कितने रंग के ताने-बाने,
आड़े-तिरछे स्वप्न गढ़े फिर राह चले हम अदृश अजाने,
तेजस्मय वह रूप तुम्हारा अंकित है मेरे मानस पर
बसा आत्मन कभी सत्य हो, मन ही मन नीरव याचन हूँ।

जीवन का हर पल प्रिय तुम से, तुम को ही अर्पित जीवन हूँ ।


Sunday, October 09, 2011

प्रोत्साहन बहुत ज़रूरी है


बच्चों के साथ रोज़ जाने कितने ही अनुभव होते रहते हैं।  कक्षा २/३ के छात्र-छात्रायें। ७-८ साल के बच्चे। रोज़ ही किसी न किसी वजह से एक बार खुल कर हँस लेने का मौका मिल ही जाता है।  यहाँ के नियम के अनुसार, सारे दिन ही शिक्षिका को कक्षा के बच्चों के साथ रहना होता है।  चाहे कोई भी विषय हो, उन्हें एक ही शिक्षिका को पढ़ाना होता है (कुछ एक को छोड़ कर)।  इस तरह शिक्षक/ शिक्षिका और बच्चों के बीच का संपर्क बहुत मज़बूत होता है।  एक दिन मेरे स्कूल न आने से बच्चे उदास हो जाते हैं और अगले दिन बच्चों से सबसे पहले यही सुनने को मिलता है, " आई मिस्ड यू येस्टर्डे"।  उपस्थिति मार्क करते समय बच्चे मुझे गुड्मार्निं कहते हैं।  कार्पेट पर बैठ कर बच्चे अपनी पिछले दिन की कई घटनायें बताते हैं।  सारा दिन उनके साथ किस तरह गुज़र जाता है पता ही नहीं चलता।

कई छोटी-छोटी बातें होती ही रहती हैं।  कल रीसेस के समय दो बच्चियाँ मेरे पास आईं, " आपके लिये हमने एक केक बनाया है...चॉकोलेट आइसिंग वाला"। मैंने कहा अच्छा? वो कैसे? तो पता चला कि रीसेस में उन्होंने खेलते हुये मिट्टी और पत्थर से मेरे लिये एक केक बनाया था। तो वो चाहतीं थी कि मैं उस केक को काटूँ। तो भई हम ने भी उस केक को काटा...कहा, कितना सुंदर है...आदि :)  बच्चियों की चेहरे की खुशी देखते बनती थी।

सराहना बच्चों के लिये बहुत बड़ा प्रोत्साहन का काम करती है।  प्रोत्साहन भी दो तरह के होते हैं- एक प्रोत्साहन वह कि बच्चे किसी चीज़ की आशा में अपना काम करें। यह अच्छी बात है मगर दूसरा प्रोत्साहन वह जो कि जो अन्दरुनी परिवर्तन लाये।  बच्चा खुद अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर उस काम को करे, किसी प्राइज़ की आशा में नहीं।  सराहना करते वक़्त सिर्फ़ इतना कह देना कि ’वाह बहुत अच्छा जवाब दिया’ और एक "गुड" लिख देना काफ़ी नहीं होता। साथ में ये भी बताया जाये कि क्या अच्छा था जवाब में। इसके अलावा भी जवाब में और क्या होना चाहिये था कि जवाब और अच्छा होता। कक्षा में गलत जवाब के लिये कभी भी सज़ा नहीं दी जानी चाहिये।  सज़ा भला क्यों? कि उसे जवाब नहीं आया? या उसका ध्यान नहीं था पढ़ाई में।  अगर बच्चे को नहीं आता कोई जवाब तो मौका दिया जाये कि वो अपने साथी के साथ मिल कर जवाब तलाशे और फिर खुद इन्जडिपेंडेट्ली जवाब दे। इस तरह बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है। सज़ा ( वह भी ऐसी जिससे बच्चा कुछ सीखे) सिर्फ़ व्यवहार या अन्य वाजिब वजह से दी जानी चाहिये। जैसे मेरी कक्षा में बच्चे कोई काम करना भूल जायें (जैसे रीडिंग लॉग या स्कूल डायरी न साइन करवाई हो अनुभावकों से) तो ज़रूर सज़ा मिलती है उन्हें कि वो अपना काम याद रखें अगले दिन के लिये।  उन्हें अपने मूल्यवान रीसेस के आधे घंटे में से २ मिनट देने होते हैं यानि सभी मित्रगण खेलने गये पर वो दो मिनट बाद जायेंगे। और जो बच्चे यह सब साइन करवा के लायें, उन्हें एक स्टिकर मिलेगा और ३० स्टिकर इकट्ठा कर लें वे तो एक प्राइज़।  हाँ होमवर्क न करे कोई, तो रीसेस में मेरे साथ बैठ कर करना होगा होमवर्क...! प्राय: सभी बच्चे अपना काम करते हैं इस तरह।

कल एक बच्ची का जन्मदिन था मेरी कक्षा में। मेरे पास एक बक्सा है, छोटा सा कार्ड्बोर्ड का। बच्चे जानते हैं कि टीचर का यह ट्रेशर बॉक्स किसी के जन्मदिन पर खुलता है या टीचर बहुत खुश हो किसी के व्यवहार से तो ही। तो उस वक़्त उस बच्चे को उस ट्रेशर बॉक्स से आँख बंद कर के कोई भी चीज़ चुनने का मौका मिलता है। वह एक छोटी सी किता ब भी हो सकती है, कोई पेन या कोई खिलौना भी।  बच्चे नहीं जानते कि उस बक्से के अंदर क्या है।  देखा जाये तो यह सब बाह्य प्रोत्साहन हैं (extrinsic motivation) लेकिन कई बातों के लिये बहुत कारगर।  बच्चे द्वारा किये गए किसी भी अच्छे काम की सराहना और यह बताना कि वो काम क्यों अच्छा था, इसके क्या अच्छे फल हुये अन्दरुनी प्रोत्साहन का उदाहरण है।  उसी को नियम बना लेना बच्चों की आदत में ढल जाता है फिर।  पूरे जीवन के लिये एक अच्छी शिक्षा।

फिर अगले सप्ताह की शुरुआत होगी। बच्चों की खिलखिलाहट सुनने को मिलेगी और उनके सप्ताहांत के अनुभव सुनने को। मैं भी उन्हें बताने को उत्सुक हूँ कि इस सप्ताहांत मेरी पिट्स्बर्ग की यात्रा, रंगीन पेड़ों को देखते हुये कैसी रही...।  फिर फ़ॉल कलर्स पर कुछ चित्र बनाने का आर्ट प्रोजेक्ट उसी से संबंधित...








Thursday, August 25, 2011

शेष समय इतना करना प्रिय...




शेष समय इतना करना प्रिय। 

सपनों का आकाश बड़ा था,
आँखों मुक्ताहार जड़ा था,
चुन-चुन मोती बड़े जतन से 
संग-संग हाथों महल गढ़ा था,
स्वप्न नहीं अब एक कहानी 
बन मेरी आंखों झरना प्रिय ।
शेष समय इतना करना प्रिय ।

एक स्वप्न था, अंक तुम्हारे
अपना सर रख कर सो जाऊँ, 
मांग सितारे, माथे सूरज
पहन जगत में मैं इतराऊँ,
और नहीं तो उस अंतिम क्षण
अपने अश्रु मांग भरना प्रिय ।
शेष समय इतना करना प्रिय ।

जितना हम संग राह चले हैं,
सुख-दुख, सपने संग पले हैं,
बाधाओं, झंझावातों से 
हाथ पकड़ कर हम निकले हैं,
अब एकल पथ जाना मुझको 
तुम ही मेरा भय हरना प्रिय।
शेष समय इतना करना प्रिय।

Wednesday, March 23, 2011

लौट चल मन..

लौट चल मन

लौट चल मन,
द्विधा छोड़ सब
लौट चल अब |

सीमायें तज,
भटक-भटक कर
थका चूर है,
घर सुदूर है,
श्रांत मन, चल शांत हो
अब लौट चल...

मधुरामृत की लालसा में,
चाह कर विष किया पान क्यों?
प्रीत भँवर में उलझ कर के
मिथ्यानंद से किया स्नान क्यों?
ग्लानिसिक्त यह रुदन छोड़ कर
अब झूठे सब बंध तोड़ कर
अश्रु ले कर, अंजुरि में भर
लौट चल मन...

विहगवृंद संग क्षितिज पार तू
सुवर्ण रेखा स्पर्श करने
बंधु घुलमिल जोड़ श्वेत पर
चला कहाँ मन किसे हरने?
स्वप्न बाँध अब किस झोली में
नश्वर तारों की टोली में
वेष आडंबर
आलिंगन कर
क्या मिलता सब?

लौट चल अब...

Saturday, March 19, 2011

सखि बसंत आया- होली पर


सखि बसंत आया ।

कोयल की कूक तान,
व्याकुल से हुए प्राण,
बैरन भई नींद आज,
साजन संग भाया ।
सखि बसंत आया ।

लगी प्रीत अंग-अंग,
टेसूओं के लाल रंग,
बिखरी महुआ सुगंध,
मदिरा मद छाया ।
सखि बसंत आया ।

पाँव थिरक देह हिलक,
सरसों की बाल किलक,
धवल धूप आज छिटक,
सोन जग नहाया ।
सखि बसंत आया ।

अमुवा की डार-डार,
पवन संग खेल हार,
उड़ गुलाल रंग मार,
सुखानंद लाया ।
सखि बसंत आया ।

Monday, February 28, 2011

काश!

काश! रात ये लम्बी होती,
सुबह नही यूँ जल्दी होती।

सोमवार को सूरज भी गर 
उठता, लेकिन आँख मीच कर,
अंगडाई लेता, सो जाता,
मुँह पर चादर और खींच कर।

किरणे भी झट बांह समेटे,
दुबक रजाई भीतर जातीं,
फिर से रजनी सपनों का तब
एक नया संसार सजाती।

एक अंचभित चिड़िया का,
नन्हा बच्चा ले कर पंखड़ाई,
कहता मम्मी आज सवेरे
से ही देखो बदली छाई।

रवि उठना जो भूल ही जाता, 
तो किस्मत क्या अपनी होती...
काश रात ये लंबी होती,
सुबह नही यूं जल्दी होती।

Sunday, January 23, 2011

गज़ल-ज़िंदगी रोज़ आज़माती है

कोई खुश्बू कहीं से आती है
मेरे घर की ज़मीं बुलाती है

ज़िंदगी इक पुरानी आदत है
यूँ तो आदत भी छूट जाती है

जाने क्या-क्या सहा किया हमने
पत्थरों पर शिकन कब आती है
 
आप होते हैं पर नहीं होते
रात यूँ ही गुज़रती जाती है

"दोस्त" हर पल नया तजुर्बा है
ज़िंदगी रोज़ आज़माती है

Sunday, December 19, 2010

बच्चे मन के सच्चे

स्कूल में पढ़ाते हुये कितने ही अनुभव होते रहते हैं।  कुछ खट्टे, कुछ मीठे...कई छोटी-छोटी घटनायें होती रहती हैं, मगर ज़्यादातर ही, ये घटनायें मानसपटल के किसी कोने में कुछ दिनों के लिये कैद होती हैं और फिर धीरे-धीरे धूमिल। बच्चों की बातें, अक्सर ही मेरे चेहरे पर एक मुस्कान बिखेर जाती है।

कल क्रिसमस की छुट्टियों के पहले आखिरी दिन था स्कूल का।  पढ़ाई कम, गिफ़्ट-एक्सचेंज और खेल ज़्यादा। सभी बहुत खुश थे, बच्चे, टीचर, सभी...माहौल छुट्टियों का, क्रिसमस का...

रीसेस के बाद, बच्चे कक्षा में आकर बैठने लगे थे।  सबके कक्षा में आने का इंतज़ार कर रही थी मैं कि एक बच्ची आ कर उदास चेहरे से अपनी सीट पर अनमनी हो बैठी। कक्षा तीसरी की वह बच्ची, बहुत होशियार और मिलनसार है। मैं उसके पास गई और पूछा-

"क्या हुआ बेटा? आप इतनी उदास क्यों बैठी हैं? "

"कुछ नहीं..."

"अच्छा, अभी बाहर रीसेस में कुछ हुआ? किसी सहेली या दोस्त से अनबन हो गई? क्या बात है?"

"नहीं कुछ नहीं... "

"अच्छा जब तक तुम अपनी भावनाओं के बारे में बताओगी नहीं कैसे पता चलेगा? इसलिये अपने दिल की बात कह देना सबसे अच्छा होता है।  क्या हुआ है?"

"वो...वो...जेनेट है न, वो रिचर्ड को, वो जो कक्षा दूसरी में है...उसे पसंद करती है।  तो क्रिसमस के लिये रिचर्ड ने जेनेट को फूल और ज्वूलरी दी है। तो जेनेट उसी के साथ खेल रही है। मेरे साथ नहीं खेल रही।"

एक बार मन ही मन हँस पड़ी मैं।  कक्षा दूसरी का ७ साल का बच्चे का कक्षा तीसरी की ८ साल की बच्ची को पसंद करना और इस बच्ची का बहुत ही सीरियसली इस वाकये का कहना और फिर उसे कोई ऐसा तोहफ़ा न मिल पाने का गम...मैं ने अपनी मुस्कान छुपा कर उतने ही गंभीरता से कहा,

"अच्छा, तो ये बात है।  जेनेट तो तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त है, तुम दोनों ही एक क्लास में हो तो उसे बताओ कि तुम भी उसके साथ खेलना चाहती हो, और रिचर्ड भी तो तुम्हारा दोस्त है, तीनों साथ-साथ खेलो।"

"पर वो नहीं खेलते मेरे साथ अब..."

"अच्छा तो ऐसा करो, उन्हें बताओ कि इस से तुम्हारी भावनायें आहत होती हैं। और फिर उन्हें भी थोड़ा खेलने दो, तुम्हारे और भी कितने अच्छे दोस्त हैं, उनके साथ भी खेलो..है न?

"ह्म्म्म...."

बच्चे आहत होते हैं तो परिष्कार मन से कह देते हैं। और हम...अपने अहम में, और भी जाने कितनी बातें सोच कर कह नहीं पाते...और क्या सब समझ ही पाते हैं?

Thursday, November 18, 2010

आओ साथी जी लेते हैं

उदीयमान गीतकारों में मुझे अमिताभ त्रिपाठी ’अमित’ के गीत अच्छे लगते हैं। इलाहाबाद में रह रहे, अमित जी कई विधाओं में पारंगत हैं मगर उनके गीतों में जो सरसता और सहजता होती है, वह आजकल के गीतकारों में बहुधा नहीं पाई जाती है।  आप उनके ब्लाग रचनाधर्मिता  पर जा कर उनकी अन्य रचनायें पढ़ सकते हैं।आज उनका एक गीत प्रेषित कर रही हूँ।

आओ साथी जी लेते हैं
विष हो  या अमृत हो जीवन
सहज भाव से पी लेते हैं

सघन कंटकों भरी डगर है
हर प्रवाह के साथ भँवर है
आगे हैं संकट अनेक, पर
पीछे हटना भी दुष्कर है।
विघ्नों के इन काँटों से ही
घाव हृदय के सी लेते हैं
आओ साथी जी लेते है

नियति हमारा सबकुछ लूटे
मन में बसा घरौंदा टूटे
जग विरुद्ध हो हमसे लेकिन
जो पकड़ा वो हाथ न छूटे
कठिन बहुत पर नहीं असम्भव
इतनी शपथ अभी लेते हैं
आओ साथी जी लेते है

श्वासों के अंतिम प्रवास तक
जलती-बुझती हुई आस तक
विलय-विसर्जन के क्षण कितने
पूर्णतृप्ति-अनबुझी प्यास तक
बड़वानल ही यदि यथेष्ट है
फिर हम राह वही लेते हैं
आओ साथी जी लेते हैं

--अमिताभ त्रिपाठी ’अमित’

Wednesday, November 17, 2010

महावीर शर्मा जी को श्रद्धांजलि


ग़ज़ल लेखने में मेरा मार्गदर्शन करने वाले, मेरे गुरु श्री महावीर शर्मा जी के निधन पर मेरी उनको भावभीनी श्रद्धांजलि है मेरा ये पोस्ट।  

Wednesday, September 08, 2010

कोशिशें


कहते हैं कोशिशें कामयाब होती हैं

कितनी कोशिशें
हमने भी कीं...
याद है वह हमारा छुपना चांद से,
अपने-अपने छतों पर?
उसे न देखने की कोशिश?
खिड़की भी तो बंद कर ली थी मैंने
कि वही चाँदनी तुम्हारी आँखों से छन कर
मुझ तक पहुँचती होगी।

और वो शाम?
जिस शाम हम मिले थे
आसमां का रंग और हमारे प्यालों की कॉफ़ी का 

कत्थई रंग जो आँखों में समा गया था,
उसे मिटाने की कोशिश...
देखो! आज भी तो आ जाती है वह शाम ख्वाबों में
डूबते हुये सूरज का पता देने?

तुम्हें न हो याद शायद पर मुझे है याद,
वह आधी रात को उठ कर
सितारों के कारवां में एक सितारा बन
तुम्हारे साथ-साथ चलना मेरा,
तुम्हें अहसास नहीं मगर
मैं चलती थी तुम्हारे आंगन में,
देख आती थी तुम्हें सोते हुये
तुम्हारे ख्वाबों में,
उन सोने-चांदी के पेड़ पत्तों को छू आती थी,
उसे सिरहाने रख सोने की कोशिश की थी
नींद नहीं आई उस रात,
फिर किसी रात...

और सुनो! वो लाल फूल
जो  दहकते हैं आज भी
तुमने जिन्हें सींचा था अपने प्यार से,
आज भी मेरे बगी़चे में महकते हैं,
कैसे मिटा दूँ खुश्बू हवा से बताओ!
जानती हूँ खुश्बू का बसेरा नहीं।
उसे कहां बाँध सकूंगी मैं,
पर ये कोशिशें...नाकाम कोशिशें!

कौन कहता है कोशिशें कामयाब होती हैं?

Saturday, September 04, 2010

मेरा मन मेरी बात नहीं सुनता है- अचला दीप्ति कुमार

अचला दीप्ति कुमार जिन्हें कविता विरासत में महादेवी जी से मिली है, की एक कविता प्रस्तुत है- (उन्हीं की आवाज़ में विडियो देखने के कविता के नीचे जायें)

हठी मन

मेरा मन मेरी बात नहीं सुनता है
जो गलियाँ पीछे छूट चुकीं,
जिनमें अपनी पहचान नहीं,
अपने उगने के बढ़ने के,
फलने के और पनपने के,
हैं बाक़ी जहाँ निशान नहीं,
यह उन गलियों में लौट लौट कर
अपना सिर क्यों धुनता है?
मेरा मन मेरी बात नहीं सुनता है।

जो चादर ओढ़ कुहासे की,
करवट ले मानो सोया है,
अपनी हर कोशिश, हर उद्यम
जिससे टकरा कर खोया है,
जिस पर अपना अधिकार नहीं,
जिसका निश्चित आकार नहीं,
उस अनदेखे कल को लेकर
यह क्या-क्या सपने बुनता है।
मेरा मन मेरी बात नहीं सुनता है।

बढ़ कर पैरों को छू फैली,
यह वर्तमान की जो रेती
है अपने साथ बहा लाई,
कितने दुलर्भ सीपी-मोती।
यह तो मन की अपनी निधि है
पर इसको भला कहाँ सुधि है?
कब झुक कर वह इस सिक्ता से
ये मुक्ता-माणिक चुनता है?
बस अनजाने कल को लेकर
जाने क्या सपने बुनता है,
या सूनी गलियों में जा-जा
अपना सिर क्यों धुनता है
मेरा मन मेरी बात नहीं सुनता है।

Sunday, July 25, 2010

जगत में झूठी देखी प्रीत- गुरु पूर्णिमा पर





जगत में झूठी देखी प्रीत ।
 अपने ही सुखसों सब लागे, क्या दारा क्या मीत ॥

मेरो मेरो सभी कहत है, हित सों बाध्यो चीत ।
अंतकाल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज की रीत ॥

मन मूरख अजहूँ नहिं समुझत, सिख दै हारयो नीत ।
नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के गीत ॥

Sunday, June 13, 2010

उस मोड़ से शुरु करें ये ज़िंदगी- जगजीत सिंह

जिस मोड़ पर ठहरे हो, वहाँ से दो रास्ते हैं, एक लौट जाता है पीछे और एक ठहर जाता है। आगे नहीं जाता।  ठहर कर पीछे मत देखो, आगे देखोगे तो भी पीछे देखना होगा।  बस ठहरे रहो। हवा उड़ा ले जायेगी तो चले जाना, हवा के साथ। पर तब भी मत देखना पीछे।  वो तुम नहीं थे, हवा थी जो गई, तुम तो अभी भी ठहरे रहोगे, वहीं।  किसी का हाथ पकड़ कर नहीं, अपना हाथ पकड़ कर रहो, वो तुम्हारे साथ था तो वहीं होगा, अपने मोड़ पर ठहरा हुआ, पीछे वो भी नहीं देखता होगा, आगे भी नहीं, बस वहीं, जहाँ है। प्रेम विश्वास है, स्थिरता, और कुछ नहीं।  

आइये सुनें ये सुंदर गज़ल, जगजीत की आवाज़ में।

Wednesday, June 02, 2010

दो रवीन्द्र संगीत- प्रेम एशे छीलो/आमारो परानो जाहा चाये...

रवीन्द्र संगीत की शृंखला में आज, दो और गीत।  भावानुवाद करने की कोशिश की है। किसी त्रुटि के लिये अग्रिम क्षमा याचना के साथ।

प्रेम एशे छीलो नि:शब्दो चौरोने...



प्रेम आया था, नि:शब्द पांव से
तब स्वप्न लगा वो
नहीं दिया आसन
प्रेम आया था...

बिदाई ली जब उसने
आहट पा कर
गया था दौड़ कर
तब वो शब्द-काया विहीन
सुनसान रात में विलीन
दूर पथ पर ज्यों दीपशिखा
रक्तिम मरीचिका
प्रेम आया था..

बंग्ला  में
प्रेम एशे छीलो नि:शब्दो चौरोने

ताई स्वप्नो मोने होलो तारे
दीनी ताहारे आसन
प्रेम एशे छीलो

बीदाए नीलो जोबे
शब्द पेये
गेनू धेये
से तोखुनो शब्द काया बिहीन
निशीतो तीमीरे बीलीन
दूरो पौथे दीप्शिखा
रक्तिम मोरीचीका
प्रेम एशे छीलो

दूसरा गीत-

आमारो परानो जाहा चाये ...

Get this widget | Track details | eSnips Social DNA

मेरा प्राण जो चाहता है
तुम बस वही हो, ओ प्रिय!
तुम्हारे सिवा इस जगत में
मेरा कोई नहीं और
कुछ नहीं है, प्रिय!

तुम अगर सुख न पाओ,
तो सुख के संधान में जाओ
मैंने तो तुम्हें पाया है
हृदय मध्य
और कुछ नहीं चाहिये, ओ प्रिय!

मैं तुम्हारे विरह में रहूँगी विलीन
तुममें ही करूँगी वास
दीर्घ दिवस, दीर्घ रजनी, दीर्घ बरस मास,
यदि किसी और से प्रेम करो
यदि और कभी न फिर सको
तब तुम जो चाहो, वही तुम्हें मिले
मैं जितने भी दुख पा लूँ, ओ प्रिय!

बंग्ला में

आमारो परानो जाहा चाये
तूमी ताई, तूमी ताई गो!
तोमा छाड़ा आर जोगोते मोरा केहो नाई
किछू नाई गो!

तूमी सुख जोदी नाही पाओ
जाओ सुखेरो संधाने जाओ
आमि तोमारे पेयेछि हृदयो माझे
आर कीछू नाहि चाई गो

आमी तोमारी बीरोहे रोइबो बिलिन
तोमाते कोरीबो वास
दीर्घो दीबौशो, दीर्घ रौजौनी, दीर्घो बरौशो माश
जोदी आरो कारे भालोबाशो जोदी आर फीरे नाही आशो
तोबे तूमि जाहा चाओ ताहा जैनो पाओ
आमि जोतो दूखो पाई गो!

Sunday, April 18, 2010

याद पिया की आये

याद पिया की आये, ये दुख सहा न जाये...

सबसे पहले the authentic - बड़े गुलाम अली खां की आवाज़ में ...ये दर्द और कहाँ...



और एक नया तरीक़ा, रीमिक्स? मगर असरदार है- वडाली बंधु की आवाज़- निराला



फिर सुनिये उभरती हुईं- कौशिकी चक्रवर्ती की आवाज़- अब इतना बस चुके हैं बड़े गुलाम अली खां साहब जैसे लगती है बस उन्हीं की हो कर रह गई है ये ठुमरी, किसी और की आवाज़ में सुनना कुछ अजीब सा ही लगता है।

Friday, April 16, 2010

विरह गीत- दीप बना कर याद तुम्हारी


दीप बना कर याद तुम्हारी, प्रिय, मैं लौ बन कर जलती हूँ
प्रेम-थाल में प्राण सजा कर लो तुमको अर्पण करती हूँ।

अकस्मात ही जीवन मरुथल में पानी की धार बने तुम,
पतझड़ की ऋतु में जैसे फिर जीवन का आधार बने तुम,
दो दिन की इस अमृत वर्षा में भीगे क्षण हृदय बाँध कर,
आँसू से सींचा जैसे अब बन कर इक सपना पलती हूँ।
दीप बना कर...

मेरे माथे पर जो तारा अधरों से तुमने आँका था,
पाकर के वह स्पर्श मृदुल यह गात रक्त्मय निखर उठा था,
उन चिह्नों को अंजुरि में भर पीछे डाल अतीत अंक में,
दे दो ये अनुमति अब प्रियतम, अगले जीवन फिर मिलती हूँ।
दीप बना कर...

तुम रख लेना मेरी स्मृति को अपने मन के इक कोने में,
जैसे इक छोटा सा तारा दूर चमकता नील गगन में,
दग्ध ह्रदय में धधक रहे आहत पल के दंशों को अपने ,
आहुति के आँसू से धो कर आंगन लो अब मैं चलती हूँ।
दीप बना कर...

Sunday, March 28, 2010

एक सपना जी रही हूँ

एक सपना जी रही हूँ

पारदर्शी काँच पर से
टूट-बिखरे झर रहे कण
  विहँसता सा खिल रहा है
आँख चुँधियाता हर इक क्षण
  कुछ दिनों का जानकर सुख
मधु कलश सा पी रही हूँ

एक सपना जी रही हूँ

वह अपरिचित स्पर्श जिसने
छू लिया था मेरे मन को
अनकही बातों ने फिर धीरे
से खोली थी गिरह जो
और तब से जैसे हाला
जाम भर कर पी रही हूँ
 
एक सपना जी रही हूँ

इक सितारा माथ पर जो
तुमने मेरे जड़ दिया था
और भँवरा बन के अधरों
से मेरे रस पी लिया था
उस समय के मदभरे पल
ज्यों नशे में जी रही हूँ

एक सपना जी रही हूँ