Friday, May 10, 2013

मानोशी का काव्यसंग्रह - " उन्मेष "- जल्द ही भारत व कनाडा में उपलब्ध होगा। यह संग्रह आनलाइन फ़्लिपकार्ट व अमेज़ॉन पर भी उपलब्ध होगा। अपनी प्रति अभी से सुरक्षित करवाने हेतु manoshi.unmesh@gmail.com पर सम्पर्क करें।

Sunday, June 17, 2012

हैप्पी फ़ादर्स डे

रोज़ रात एक कहानी होती थी। वही कहानियाँ रोज़-रोज़...हालूम खा, बैचाराम, और नीलकमल-लालकमल। हर रविवार हाथ पकड कर मैं जाती थी घूमने, बाज़ार, और वहाँ हर रोज़ मुझे मिलती थी मेरे हाथों मे एक बर्फ़ी, बस एक, मेरा ईनाम :) हर शाम मेरे साथ गाने के रियाज़ में वे तबले पर संगत करते थे मेरे साथ। और हर सुबह स्कूल ले जाते थे अपने स्कूटर पर...ठीक बिल्कुल गेट के सामने उतारते थे..."क्या आप मुझे दूर उस मोड़ पर नहीं उतार सकते? मैं अब बच्ची नहीं" पर वे कभी नहीं सुनते। दुनिया की हर ’स्पेलिंग’ उन्हें आती थी और जहान के सारे गणित के सवाल उनकी मुट्ठी में थे। आज भी उन्हें सब आता है...ऐसा कुछ नहीं जो वो न कर सकें...सच्ची!!! मेरा बचपन सबसे खूबसूरत बचपनों में से एक था...और पापा आपने बनाया उसे सुंदर...सबसे सुंदर...हैप्पी फ़ादर्स डे, पापा!

Thursday, May 17, 2012

मैं "मैं" हूँ

  इस साल बच्चों को पढ़ाते हुये, कई अनुभवों से गुज़रते हुए एक बड़ी सीख मिली- प्रोत्साहन में बला की शक्ति होती है। बच्चे को अगर कुछ समझ नहीं आ रहा तो वह उसकी गलती नहीं है। उसे क्यों डाँटा जाये, मेरी समझ से बाहर है। भारत में (अब शायद स्थित बदल गई हो )बच्चे के नंबर कम आने पर, या फ़ेल होने पर कभी उस तरह ध्यान नहीं दिया जाता था कि हो सकता है कि बच्चे में कोई कमी हो जैसे लर्निंग डिसबिलिटी या कुछ और। डाँट डपट कर, मार-मार कर पढ़ा कर उस बच्चे के दिमाग़ में ज्ञान भरने की कोशिश की जाती थी। बच्चे का मनोबल और गिरता था और बच्चे में जितनी भी काबिलियत होती थी, वह भी किसी काम नहीं आती थी।

   मेरे क्लास में ७-८ साल की एक बच्ची है जो शर्मीली प्रकृति की है।  बात कम करती है शर्मीली होने की वजह से कुछ समझ न आये तो खुद सवाल करने से भी हिचकिचाती है।  उसके माता-पिता से बात करके भी यही समझ आया कि वह घर में भी कम बात करती है और बहुत धीरे बोलती है आदि।  उसे कक्षा में कई बार समझाया कि वह सवाल किया करे, बिना झिझक पूछा करे आदि।

   कुछ दिनों से मैंने गौर किया कि वह बच्ची सवाल पूछ रही है या कोई भी बात कर रही है तो कुछ चिल्ला कर। उसकी अपनी आवाज़ नहीं है यह उसकी, जैसे ज़बरदस्ती चिल्ला कर, गले पर बहुत ज़ोर डाल कर बात कर रही है।  आज उसे स्कूल के बाद थोड़ी देर अकेले पढ़ाते समय मैंने उसके कंधे पर हाथ रख कर उससे पूछा, " बेटा, क्या बात है कि आज कल देख रही हूँ तुम कुछ चिल्ला कर, गले पर ज़ोर डाल कर बात कर रही हो। हो सकता है मैं गलत हूँ, या बताओ अगर मैं सही हूँ तो।" बच्ची ने पहले तो कुछ नहीं कहा। फिर हामी भरी। कहा - घर में सब कहते हैं कि मुझे ज़ोर से बोलना चाहिये। मैंने उससे पूछा, "तो क्या तुम ऐसा कर के खुश हो? क्या तुम्हें कम्फ़र्टेबल लग रहा है?" उसका जवाब था, "दरअसल नहीं"। मैने उसे समझाया, ":जिस चीज़ से तुम अपनी पहचान खो दो वह मत करो। अगर तुम धीरे बात करती हो तो ठीक है। यह कोई गलत नहीं। हाँ कक्षा में कोई प्रेसेन्टेशन है तो अलग बात है, मगर बात करने के लिये तुम्हें ज़ोर लगा कर, चिल्ला कर बात करने की ज़रूरत नहीं।  मान लो मुझे कोई कहे कि आपके चलने का ढंग मुझे पसंद नहीं, बदल दीजिये, तो क्या मुझे बदल देना चाहिये?" बच्ची ने जवाब दिया, " नहीं" मैंने उससे पूछा, "क्यों? तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?" उसका जवाब था, "क्योंकि आप उससे आप नहीं रहेंगी और खुश भी नहीं रहेंगी।"  "बस यही बात है। अगर घर में कोई कहे तो कह देना मेरी टीचर ने कहा है कि मुझे "मैं" रहना है। मुझे इस तरह बात करना अच्छा नहीं लगता।"

बच्ची के चेहरे पर एक खुशी की आभा थी। बच्चों को समझाना तो आसान होता है पर हम बड़े भी क्या ऐसा कर पाते हैं? सबको खुश करने के लिये अपने को कई बार न चाहते हुये भी तो बदलने की कोशिश करते हैं हम।  हमारी पहचान ही तो हम हैं। फिर लोगों की इतनी परवाह क्यों होती है हमें। क्या इस सवाल का कोई उत्तर है?

Sunday, December 25, 2011

नया वर्ष २०१२- शुभकामनायें



"मिसेज़ सी, आई हैव गॉट अ प्रेसेन्ट फ़र यू फ़ॉर क्रिसमस"
"इट वॉसंट नेसेसरी, हन"
"बट आई ऑल्रेडी गॉट इट (रुँआसे स्वर में)"
"रीअली? आई ऍम सो वेरी एक्साइटेड, आई कांट वेट टु ओपेन इट, कॅन आई गेस व्हॉट इट इज़?"

और एक मुस्कान खिल गई उस बच्चे के चेहरे पर।  क्रिसमस की छुट्टियों को अभी ५ दिन और थे मगर सोमवार से ही बच्चों से क्रिसमस के प्रेसेंट मिलने लगे थे।  सब उत्साहित थे। शुरुआत में मैंने कह दिया कि यह ज़रूरी नहीं, तुम सब मुझे अच्छा काम कर के दिखाते हो वही मेरे लिये प्रेज़ेंट है, मगर जब देखा कि बच्चे दुखी हो जाते हैं मेरे इस भारी भरकम वाक्य से तो फिर मैंने अपने शब्द बदल दिये। अब हर बार कोई बच्चा मुझे बताता कि वह मेरे लिये क्रिसमस का तोहफ़ा खरीद रहा है या वह उसे आज गिफ़्ट रैप करेगा, तो मैं भी उसे बड़े ही उत्साहित हो कर कहती कि वाह! मैं कितनी खुश हूँ कि मुझे इतने तोहफ़े मिल रहे हैं।  और बच्चे कितने खुश हो जाते।

 कभी सोचती हूँ कि हम बड़े भी तो बच्चे ही होते हैं। हमारे दिये हुए किसी चीज़ को कोई खुश हो कर न ले तो हमें भी कितना दुख होता है।  ’ना-ना’ करने के बजाय तारीफ़ कर के तोहफ़ा लेना क्या बेहतर नहीं?

दिवाली, ईद, क्रिसमस, क्वान्ज़ा और हनुका ये सारे त्यौहार एक दो महीने के अंदर ही पड़ते हैं।  इस साल इन महीनों में मैंने भी बच्चों के साथ बहुत कुछ सीखा। हर त्यौहार के ऊपर हम सबने मिल कर विडियो देखे, किताबें पढ़ीं, और किसी ऐसे व्यक्ति को कक्षा में उस त्यौहार विशेष के बारे में कहने को आमंत्रित किया जो उस त्यौहार को मनाता है।  दिवाली के बारे में मैंने ही बच्चों को बताया, ईद के लिये एक अभिभावक ने आकर बच्चों को समझाया और क्रिसमस के लिये एक क्रिसचन टीचर ने बताया।  हनुका (यह jews  का त्यौहार है और ८ दिन तक मनाया जाता है) के लिये कोई मिला नहीं मगर हम सबने मिल कर किताबें पढ़ीं और एक आर्ट प्रोजेक्ट किया (हनुका रीथ बनाया)।  क्वान्ज़ा अफ़्रीकन अमेरीकन लोग २६ तारीख़ से ले कर ७ दिन तक मनाते हैं। इस त्यौहार के बारे में भी मैंने बच्चों को किताब पढ़ कर सुनाई और उनके रिवाज़ों को जाना। यह सब करने के बाद हमने इन त्यौहारों के बीच की समानतायें और पार्थक्य पर गवेषणा की।  ७-८ साल के बच्चे अब इन त्यौहारों के बारे में विस्तार से जानते हैं और इन के बीच की समानतायें व भिन्नतायें बता सकते हैं।  और समानता यह कि सभी त्यौहारों में किसी भगवान के दूत या अवतार का महत्व है। हर त्यौहार में रोशनी का महत्व है और घर सजाये जाते हैं, दीया या मोमबत्ती जलाई जाती है और सबसे ज़रूरी, अच्छाई की बुराई पर विजय का जश्न मनाया जाता है।

कल ही से क्रिसमस की छुट्टियाँ शुरु हुई हैं। बच्चों की "मेरी क्रिसमस " और " हैपी न्यू ईअर" के बीच दिन खत्म हुआ कल। बच्चों के इन आर्ट प्रोजेक्ट व और कुछ कामों को लगाया  है स्कूल की दीवारों पर। हनुका रीथ कैसे बनाया जाये, इन्टरनेट से ही मिल गया। इंटरनेट तो वरदान है मेरे लिये। इनकी तस्वीरें नहीं ले पाई, पर छुट्टी के बाद  इस पोस्ट को अपडेट करूँगी, तस्वीरों के साथ।

सभी को क्रिसमस व नये वर्ष २०१२ की शुभकामनायें।







Monday, October 31, 2011

आज हैलोवीन का त्यौहार था।  भूतप्रेतों को याद करते इस त्यौहार के दिन स्कूल में बच्चे तरह-तरह के कपड़े पहन कर आये थे।  छोटे-छोटे प्यार- प्यारे कूदते-फ़ाँदते बच्चे।  कोई कद्दू बना था तो कोई छोटा सा भूत।  कोई माइकल जैकसन तो कोई तितली या परी। और मैं  उनकी टीचर ,चुड़ैल।  सर पर चुड़ैल की टोपी पहन बच्चों का सुबह स्वागत करते हुये बच्चों की खिलखिल और उत्साह में मेरे अंदर भी एक लंबा दिन काटने का उत्साह भर जाता है रोज़।  छोटे-छोटे बैग में कुछ खिलौने और कैंडी भर कर कक्षा के कोने कोने में छुपा रखे थे मैंने। हर बैग में बच्चों का नाम लिख दिया था। फिर बच्चों को उन बैग को ढूँढना था और उनका नाम मिला बैग उन्हें दिख जाये तो वह बैग उनका।  ऐसे ही खेल-खेल में हुई पढाई आज।  

छोटे बच्चों को पढ़ाते हुये उनसे काफ़ी कुछ सीखने को मिला।  प्रामिस इज़ अ प्रामिस।  कभी भी कोई वादा कर के न निभाऊँ तो बच्चे कैसे सीखंगे कि जो वादा किसी से किया कभी तो उसे निभाना है। चाहे एक किताब पढ़ने की बात हो या कोई पुरस्कार देने की, अगर वादा है तो उसे पूरा होना है।  बच्चे भी तो जानते हैं कि हमारी टीचर ने कहा है तो ज़रूर होगा वह काम।  चाहे वह खेल हो या पढ़ाई।  

बच्चों की काबिलियत पर अचरज होता है मुझे।  कितने ही काम हैं जो सोचती हूँ शायद बच्चे नहीं कर पायेंगे, पर  बाद में हैरानी होती उनके काम को देख कर।  आर्ट या कला बहुत पसंद करते हैं बच्चे।  उनको अगर बता दिया जाये कि किस तरह से उनका काम सबसे अच्छा हो सकता है तो वह भी कोशिश करते हैं। हमेशा ही एक उदाहरण दिखाना ज़रूरी होता है। एक बुरा उदाहरण और एक अच्छा उदाहरण। जैसे कि किसी प्रश्न का बुरे उदाहरण का जवाब कैसा होगा और अच्छे उदाहरण का जवाब कैसा होगा।  किसी अच्छे जवाब के लिये या अच्छे काम के लिये बच्चे को क्या करना होगा कि वह काम जो बच्चे ने किया वह अच्छा काम कहलाये।  

एक वर्कशाप में एक इन्स्ट्रक्टर ने कहा- "ताली बजाइये, मैं आपको पास या फ़ेल बताऊँगी" मैंने तीन बार ताली बजाई। तो इन्स्ट्रक्टर ने कहा." आप फ़ेल हुई"। मुझे समझ नहीं आया। तब इन्स्ट्रक्टर ने कहा, " अच्छा अब मैं आपको बताती हूँ कि मैं आपके ताली बजाने को कैसे जाँच रही हूँ। मुझे ताली एक rhythm  में चाहिये, १२१२३, १२१२३, १२१२३...इस तरह या कोई और ‘पैटर्न’ । इसके अलावा उस पैटर्न को ३ बार दोहराने पर ही आपको नंबर मिलेंगे। तो अब बजाइये " ।  ऐसे ताली बजाने पर मुझे पास कर दिया गया।  इन्स्ट्रक्टर ने बताया, बच्चे में क्षमता होती है मगर ज़रूरी है कि बच्चा जाने कि उसे करना क्या है, कैसे जवाब लिखेगा तो उसे अच्छे नंबर मिलेंगे।  

मेरे बच्चों के काम के कुछ सैम्पल के फोटो निकाले थे।  बच्चों का काम प्रदर्शित करना भी कितना ज़रूरी है। बच्चों का इस तरह का प्रोत्साहन उन्हें मदद करता है और अच्छा कर दिखाने का।  








Sunday, October 09, 2011

प्रोत्साहन बहुत ज़रूरी है


बच्चों के साथ रोज़ जाने कितने ही अनुभव होते रहते हैं।  कक्षा २/३ के छात्र-छात्रायें। ७-८ साल के बच्चे। रोज़ ही किसी न किसी वजह से एक बार खुल कर हँस लेने का मौका मिल ही जाता है।  यहाँ के नियम के अनुसार, सारे दिन ही शिक्षिका को कक्षा के बच्चों के साथ रहना होता है।  चाहे कोई भी विषय हो, उन्हें एक ही शिक्षिका को पढ़ाना होता है (कुछ एक को छोड़ कर)।  इस तरह शिक्षक/ शिक्षिका और बच्चों के बीच का संपर्क बहुत मज़बूत होता है।  एक दिन मेरे स्कूल न आने से बच्चे उदास हो जाते हैं और अगले दिन बच्चों से सबसे पहले यही सुनने को मिलता है, " आई मिस्ड यू येस्टर्डे"।  उपस्थिति मार्क करते समय बच्चे मुझे गुड्मार्निं कहते हैं।  कार्पेट पर बैठ कर बच्चे अपनी पिछले दिन की कई घटनायें बताते हैं।  सारा दिन उनके साथ किस तरह गुज़र जाता है पता ही नहीं चलता।

कई छोटी-छोटी बातें होती ही रहती हैं।  कल रीसेस के समय दो बच्चियाँ मेरे पास आईं, " आपके लिये हमने एक केक बनाया है...चॉकोलेट आइसिंग वाला"। मैंने कहा अच्छा? वो कैसे? तो पता चला कि रीसेस में उन्होंने खेलते हुये मिट्टी और पत्थर से मेरे लिये एक केक बनाया था। तो वो चाहतीं थी कि मैं उस केक को काटूँ। तो भई हम ने भी उस केक को काटा...कहा, कितना सुंदर है...आदि :)  बच्चियों की चेहरे की खुशी देखते बनती थी।

सराहना बच्चों के लिये बहुत बड़ा प्रोत्साहन का काम करती है।  प्रोत्साहन भी दो तरह के होते हैं- एक प्रोत्साहन वह कि बच्चे किसी चीज़ की आशा में अपना काम करें। यह अच्छी बात है मगर दूसरा प्रोत्साहन वह जो कि जो अन्दरुनी परिवर्तन लाये।  बच्चा खुद अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर उस काम को करे, किसी प्राइज़ की आशा में नहीं।  सराहना करते वक़्त सिर्फ़ इतना कह देना कि ’वाह बहुत अच्छा जवाब दिया’ और एक "गुड" लिख देना काफ़ी नहीं होता। साथ में ये भी बताया जाये कि क्या अच्छा था जवाब में। इसके अलावा भी जवाब में और क्या होना चाहिये था कि जवाब और अच्छा होता। कक्षा में गलत जवाब के लिये कभी भी सज़ा नहीं दी जानी चाहिये।  सज़ा भला क्यों? कि उसे जवाब नहीं आया? या उसका ध्यान नहीं था पढ़ाई में।  अगर बच्चे को नहीं आता कोई जवाब तो मौका दिया जाये कि वो अपने साथी के साथ मिल कर जवाब तलाशे और फिर खुद इन्जडिपेंडेट्ली जवाब दे। इस तरह बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है। सज़ा ( वह भी ऐसी जिससे बच्चा कुछ सीखे) सिर्फ़ व्यवहार या अन्य वाजिब वजह से दी जानी चाहिये। जैसे मेरी कक्षा में बच्चे कोई काम करना भूल जायें (जैसे रीडिंग लॉग या स्कूल डायरी न साइन करवाई हो अनुभावकों से) तो ज़रूर सज़ा मिलती है उन्हें कि वो अपना काम याद रखें अगले दिन के लिये।  उन्हें अपने मूल्यवान रीसेस के आधे घंटे में से २ मिनट देने होते हैं यानि सभी मित्रगण खेलने गये पर वो दो मिनट बाद जायेंगे। और जो बच्चे यह सब साइन करवा के लायें, उन्हें एक स्टिकर मिलेगा और ३० स्टिकर इकट्ठा कर लें वे तो एक प्राइज़।  हाँ होमवर्क न करे कोई, तो रीसेस में मेरे साथ बैठ कर करना होगा होमवर्क...! प्राय: सभी बच्चे अपना काम करते हैं इस तरह।

कल एक बच्ची का जन्मदिन था मेरी कक्षा में। मेरे पास एक बक्सा है, छोटा सा कार्ड्बोर्ड का। बच्चे जानते हैं कि टीचर का यह ट्रेशर बॉक्स किसी के जन्मदिन पर खुलता है या टीचर बहुत खुश हो किसी के व्यवहार से तो ही। तो उस वक़्त उस बच्चे को उस ट्रेशर बॉक्स से आँख बंद कर के कोई भी चीज़ चुनने का मौका मिलता है। वह एक छोटी सी किता ब भी हो सकती है, कोई पेन या कोई खिलौना भी।  बच्चे नहीं जानते कि उस बक्से के अंदर क्या है।  देखा जाये तो यह सब बाह्य प्रोत्साहन हैं (extrinsic motivation) लेकिन कई बातों के लिये बहुत कारगर।  बच्चे द्वारा किये गए किसी भी अच्छे काम की सराहना और यह बताना कि वो काम क्यों अच्छा था, इसके क्या अच्छे फल हुये अन्दरुनी प्रोत्साहन का उदाहरण है।  उसी को नियम बना लेना बच्चों की आदत में ढल जाता है फिर।  पूरे जीवन के लिये एक अच्छी शिक्षा।

फिर अगले सप्ताह की शुरुआत होगी। बच्चों की खिलखिलाहट सुनने को मिलेगी और उनके सप्ताहांत के अनुभव सुनने को। मैं भी उन्हें बताने को उत्सुक हूँ कि इस सप्ताहांत मेरी पिट्स्बर्ग की यात्रा, रंगीन पेड़ों को देखते हुये कैसी रही...।  फिर फ़ॉल कलर्स पर कुछ चित्र बनाने का आर्ट प्रोजेक्ट उसी से संबंधित...








Sunday, December 19, 2010

बच्चे मन के सच्चे

स्कूल में पढ़ाते हुये कितने ही अनुभव होते रहते हैं।  कुछ खट्टे, कुछ मीठे...कई छोटी-छोटी घटनायें होती रहती हैं, मगर ज़्यादातर ही, ये घटनायें मानसपटल के किसी कोने में कुछ दिनों के लिये कैद होती हैं और फिर धीरे-धीरे धूमिल। बच्चों की बातें, अक्सर ही मेरे चेहरे पर एक मुस्कान बिखेर जाती है।

कल क्रिसमस की छुट्टियों के पहले आखिरी दिन था स्कूल का।  पढ़ाई कम, गिफ़्ट-एक्सचेंज और खेल ज़्यादा। सभी बहुत खुश थे, बच्चे, टीचर, सभी...माहौल छुट्टियों का, क्रिसमस का...

रीसेस के बाद, बच्चे कक्षा में आकर बैठने लगे थे।  सबके कक्षा में आने का इंतज़ार कर रही थी मैं कि एक बच्ची आ कर उदास चेहरे से अपनी सीट पर अनमनी हो बैठी। कक्षा तीसरी की वह बच्ची, बहुत होशियार और मिलनसार है। मैं उसके पास गई और पूछा-

"क्या हुआ बेटा? आप इतनी उदास क्यों बैठी हैं? "

"कुछ नहीं..."

"अच्छा, अभी बाहर रीसेस में कुछ हुआ? किसी सहेली या दोस्त से अनबन हो गई? क्या बात है?"

"नहीं कुछ नहीं... "

"अच्छा जब तक तुम अपनी भावनाओं के बारे में बताओगी नहीं कैसे पता चलेगा? इसलिये अपने दिल की बात कह देना सबसे अच्छा होता है।  क्या हुआ है?"

"वो...वो...जेनेट है न, वो रिचर्ड को, वो जो कक्षा दूसरी में है...उसे पसंद करती है।  तो क्रिसमस के लिये रिचर्ड ने जेनेट को फूल और ज्वूलरी दी है। तो जेनेट उसी के साथ खेल रही है। मेरे साथ नहीं खेल रही।"

एक बार मन ही मन हँस पड़ी मैं।  कक्षा दूसरी का ७ साल का बच्चे का कक्षा तीसरी की ८ साल की बच्ची को पसंद करना और इस बच्ची का बहुत ही सीरियसली इस वाकये का कहना और फिर उसे कोई ऐसा तोहफ़ा न मिल पाने का गम...मैं ने अपनी मुस्कान छुपा कर उतने ही गंभीरता से कहा,

"अच्छा, तो ये बात है।  जेनेट तो तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त है, तुम दोनों ही एक क्लास में हो तो उसे बताओ कि तुम भी उसके साथ खेलना चाहती हो, और रिचर्ड भी तो तुम्हारा दोस्त है, तीनों साथ-साथ खेलो।"

"पर वो नहीं खेलते मेरे साथ अब..."

"अच्छा तो ऐसा करो, उन्हें बताओ कि इस से तुम्हारी भावनायें आहत होती हैं। और फिर उन्हें भी थोड़ा खेलने दो, तुम्हारे और भी कितने अच्छे दोस्त हैं, उनके साथ भी खेलो..है न?

"ह्म्म्म...."

बच्चे आहत होते हैं तो परिष्कार मन से कह देते हैं। और हम...अपने अहम में, और भी जाने कितनी बातें सोच कर कह नहीं पाते...और क्या सब समझ ही पाते हैं?

Thursday, November 18, 2010

आओ साथी जी लेते हैं

उदीयमान गीतकारों में मुझे अमिताभ त्रिपाठी ’अमित’ के गीत अच्छे लगते हैं। इलाहाबाद में रह रहे, अमित जी कई विधाओं में पारंगत हैं मगर उनके गीतों में जो सरसता और सहजता होती है, वह आजकल के गीतकारों में बहुधा नहीं पाई जाती है।  आप उनके ब्लाग रचनाधर्मिता  पर जा कर उनकी अन्य रचनायें पढ़ सकते हैं।आज उनका एक गीत प्रेषित कर रही हूँ।

आओ साथी जी लेते हैं
विष हो  या अमृत हो जीवन
सहज भाव से पी लेते हैं

सघन कंटकों भरी डगर है
हर प्रवाह के साथ भँवर है
आगे हैं संकट अनेक, पर
पीछे हटना भी दुष्कर है।
विघ्नों के इन काँटों से ही
घाव हृदय के सी लेते हैं
आओ साथी जी लेते है

नियति हमारा सबकुछ लूटे
मन में बसा घरौंदा टूटे
जग विरुद्ध हो हमसे लेकिन
जो पकड़ा वो हाथ न छूटे
कठिन बहुत पर नहीं असम्भव
इतनी शपथ अभी लेते हैं
आओ साथी जी लेते है

श्वासों के अंतिम प्रवास तक
जलती-बुझती हुई आस तक
विलय-विसर्जन के क्षण कितने
पूर्णतृप्ति-अनबुझी प्यास तक
बड़वानल ही यदि यथेष्ट है
फिर हम राह वही लेते हैं
आओ साथी जी लेते हैं

--अमिताभ त्रिपाठी ’अमित’

Wednesday, November 17, 2010

महावीर शर्मा जी को श्रद्धांजलि


ग़ज़ल लेखने में मेरा मार्गदर्शन करने वाले, मेरे गुरु श्री महावीर शर्मा जी के निधन पर मेरी उनको भावभीनी श्रद्धांजलि है मेरा ये पोस्ट।  

Saturday, September 04, 2010

मेरा मन मेरी बात नहीं सुनता है- अचला दीप्ति कुमार

अचला दीप्ति कुमार जिन्हें कविता विरासत में महादेवी जी से मिली है, की एक कविता प्रस्तुत है- (उन्हीं की आवाज़ में विडियो देखने के कविता के नीचे जायें)

हठी मन

मेरा मन मेरी बात नहीं सुनता है
जो गलियाँ पीछे छूट चुकीं,
जिनमें अपनी पहचान नहीं,
अपने उगने के बढ़ने के,
फलने के और पनपने के,
हैं बाक़ी जहाँ निशान नहीं,
यह उन गलियों में लौट लौट कर
अपना सिर क्यों धुनता है?
मेरा मन मेरी बात नहीं सुनता है।

जो चादर ओढ़ कुहासे की,
करवट ले मानो सोया है,
अपनी हर कोशिश, हर उद्यम
जिससे टकरा कर खोया है,
जिस पर अपना अधिकार नहीं,
जिसका निश्चित आकार नहीं,
उस अनदेखे कल को लेकर
यह क्या-क्या सपने बुनता है।
मेरा मन मेरी बात नहीं सुनता है।

बढ़ कर पैरों को छू फैली,
यह वर्तमान की जो रेती
है अपने साथ बहा लाई,
कितने दुलर्भ सीपी-मोती।
यह तो मन की अपनी निधि है
पर इसको भला कहाँ सुधि है?
कब झुक कर वह इस सिक्ता से
ये मुक्ता-माणिक चुनता है?
बस अनजाने कल को लेकर
जाने क्या सपने बुनता है,
या सूनी गलियों में जा-जा
अपना सिर क्यों धुनता है
मेरा मन मेरी बात नहीं सुनता है।

Sunday, July 25, 2010

जगत में झूठी देखी प्रीत- गुरु पूर्णिमा पर





जगत में झूठी देखी प्रीत ।
 अपने ही सुखसों सब लागे, क्या दारा क्या मीत ॥

मेरो मेरो सभी कहत है, हित सों बाध्यो चीत ।
अंतकाल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज की रीत ॥

मन मूरख अजहूँ नहिं समुझत, सिख दै हारयो नीत ।
नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के गीत ॥

Sunday, June 13, 2010

उस मोड़ से शुरु करें ये ज़िंदगी- जगजीत सिंह

जिस मोड़ पर ठहरे हो, वहाँ से दो रास्ते हैं, एक लौट जाता है पीछे और एक ठहर जाता है। आगे नहीं जाता।  ठहर कर पीछे मत देखो, आगे देखोगे तो भी पीछे देखना होगा।  बस ठहरे रहो। हवा उड़ा ले जायेगी तो चले जाना, हवा के साथ। पर तब भी मत देखना पीछे।  वो तुम नहीं थे, हवा थी जो गई, तुम तो अभी भी ठहरे रहोगे, वहीं।  किसी का हाथ पकड़ कर नहीं, अपना हाथ पकड़ कर रहो, वो तुम्हारे साथ था तो वहीं होगा, अपने मोड़ पर ठहरा हुआ, पीछे वो भी नहीं देखता होगा, आगे भी नहीं, बस वहीं, जहाँ है। प्रेम विश्वास है, स्थिरता, और कुछ नहीं।  

आइये सुनें ये सुंदर गज़ल, जगजीत की आवाज़ में।

Wednesday, June 02, 2010

दो रवीन्द्र संगीत- प्रेम एशे छीलो/आमारो परानो जाहा चाये...

रवीन्द्र संगीत की शृंखला में आज, दो और गीत।  भावानुवाद करने की कोशिश की है। किसी त्रुटि के लिये अग्रिम क्षमा याचना के साथ।

प्रेम एशे छीलो नि:शब्दो चौरोने...



प्रेम आया था, नि:शब्द पांव से
तब स्वप्न लगा वो
नहीं दिया आसन
प्रेम आया था...

बिदाई ली जब उसने
आहट पा कर
गया था दौड़ कर
तब वो शब्द-काया विहीन
सुनसान रात में विलीन
दूर पथ पर ज्यों दीपशिखा
रक्तिम मरीचिका
प्रेम आया था..

बंग्ला  में
प्रेम एशे छीलो नि:शब्दो चौरोने

ताई स्वप्नो मोने होलो तारे
दीनी ताहारे आसन
प्रेम एशे छीलो

बीदाए नीलो जोबे
शब्द पेये
गेनू धेये
से तोखुनो शब्द काया बिहीन
निशीतो तीमीरे बीलीन
दूरो पौथे दीप्शिखा
रक्तिम मोरीचीका
प्रेम एशे छीलो

दूसरा गीत-

आमारो परानो जाहा चाये ...

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मेरा प्राण जो चाहता है
तुम बस वही हो, ओ प्रिय!
तुम्हारे सिवा इस जगत में
मेरा कोई नहीं और
कुछ नहीं है, प्रिय!

तुम अगर सुख न पाओ,
तो सुख के संधान में जाओ
मैंने तो तुम्हें पाया है
हृदय मध्य
और कुछ नहीं चाहिये, ओ प्रिय!

मैं तुम्हारे विरह में रहूँगी विलीन
तुममें ही करूँगी वास
दीर्घ दिवस, दीर्घ रजनी, दीर्घ बरस मास,
यदि किसी और से प्रेम करो
यदि और कभी न फिर सको
तब तुम जो चाहो, वही तुम्हें मिले
मैं जितने भी दुख पा लूँ, ओ प्रिय!

बंग्ला में

आमारो परानो जाहा चाये
तूमी ताई, तूमी ताई गो!
तोमा छाड़ा आर जोगोते मोरा केहो नाई
किछू नाई गो!

तूमी सुख जोदी नाही पाओ
जाओ सुखेरो संधाने जाओ
आमि तोमारे पेयेछि हृदयो माझे
आर कीछू नाहि चाई गो

आमी तोमारी बीरोहे रोइबो बिलिन
तोमाते कोरीबो वास
दीर्घो दीबौशो, दीर्घ रौजौनी, दीर्घो बरौशो माश
जोदी आरो कारे भालोबाशो जोदी आर फीरे नाही आशो
तोबे तूमि जाहा चाओ ताहा जैनो पाओ
आमि जोतो दूखो पाई गो!

Sunday, April 18, 2010

याद पिया की आये

याद पिया की आये, ये दुख सहा न जाये...

सबसे पहले the authentic - बड़े गुलाम अली खां की आवाज़ में ...ये दर्द और कहाँ...



और एक नया तरीक़ा, रीमिक्स? मगर असरदार है- वडाली बंधु की आवाज़- निराला



फिर सुनिये उभरती हुईं- कौशिकी चक्रवर्ती की आवाज़- अब इतना बस चुके हैं बड़े गुलाम अली खां साहब जैसे लगती है बस उन्हीं की हो कर रह गई है ये ठुमरी, किसी और की आवाज़ में सुनना कुछ अजीब सा ही लगता है।

Thursday, March 11, 2010

मिताली (मुखर्जी) सिंह- दो गज़लें


उन दिनों ख़ूब ग़ज़लें सुनती थी, ख़ाली वक़्त में। जगजीत सिंह की ग़ज़लें सबसे प्रिय थीं। मेरी उम्र रही होगी सोलह-सत्रह साल की।  इसी तरह मिताली मुखर्जी (मिताली सिंह) की गायी एक दो गज़लों ने दिल में ऐसी जगह बनाई थी, कि अब भी उन ग़ज़लों को सुन कर वे दिन याद आ जाते हैं। उनकी आवाज़ की दीवानी थी मैं। आज उनकी दो गज़लें सुन रही थी। वे दिन भी कितने हसीन थे। :-)

अहमद फ़राज़ की ये गज़ल उनकी आवाज़ में-



कुछ प्यार जहां में ऐसे हैं
अश्कों में जो पलते देखे हैं
दुश्मन तो न बदले अपने कभी
हमदम ही बदलते देखे हैं

कुछ न किसी से बोलेंगे
तन्हाई में रो लेंगे

हम बेरहबरों का क्या
साथ किसी के हो लेंगे

ख़ुद तो हुए रुसवा लेकिन
तेरे भेद न खोलेंगे

नींद तो क्या आयेगी "फ़राज़"
मौत आई तो सो लेंगे

मिताली जी की ही गाई हुई एक और ग़ज़ल। शायरी तो ख़ास नहीं पर इस ग़ज़ल की कम्पोज़िशन में जादू था। जाने कितने हज़ार बार सुना होगा उसे तब-



मुझे माफ़ कर मेरे हमसफ़र तुझे चाहना मेरी भूल थी
किसी राह पर यूँ ही इक नज़र तुझे देखना मेरी भूल थी

तुझे देख के किसी हाल में, वो उलझना ज़ुल्फ़ों के जाल में
सुबहो-शाम तेरे ख़याल में, मेरा डूबना मेरी भूल थी

तुझे ढूँढती है मेरी नज़र न है रास्ता न कोई डगर
वो गली गली वो नगर नगर तुझे ढूँढना मेरी भूल थी

मेरे ख़्वाब भी हैं अजीब से, तुझे देख लूँ मैं क़रीब से
मुझे तू मिला है नसीब से, यही सोचना मेरी भूल थी।

Monday, January 25, 2010

मां-बाबा- आज तुम्हारे लिये- रवीन्द्र संगीत

एक पूरी ज़िंदगी के कुछ लम्हों को जी लेना ही कितना मुश्किल होता है, वहीं आज एक बहुत प्यारे जोड़े ने ऐसे कई सुनहरे लम्हों को साथ गुज़ारते हुये अपनी सुनहरी वर्षगांठ यानि कि अपने ५०वें साल में प्रवेश किया है- मेरे मां-बाबा।  आज २६ जनवरी को उनकी शादी की सालगिरह है। बचपन से ही मां को कभी भी कोई काम इन्डिपेन्डेन्ट्ली करते नहीं देखा है, बाबा ने मां का एक राजकुमारी की तरह ख़याल रखा है हमेशा। आज भी जब सुबह मां को फ़ोन किया, तो पता चला बाबा इस अवसर पर मां की पसंद की मिठाई लेने गये थे दुकान।

ये उनके शादी के (५० साल पहले)  अवसर पर छपी एक कविता-


आज इस अवसर पर, बचपन से उन दोनों की आवाज़ में जिस गाने को डुएट सुनती आई हूँ, उस रवीन्द्र संगीत को पेश कर रही हूँ-


तुमि रबे निरबे
हृदये मम...
इस गाने में हेमंत दा व लता जी की आवाज़- फ़िल्म कुहेली

Saturday, January 23, 2010

ट्रैफ़िक टिकट

मेरे ड्राइविंग के कि़स्सों का ज़िक्र कर चुकी हूँ पहले।  तो अब तो मैं एक्सपर्ट हो चुकी हूँ (ये और बात है कि हाइवे से अभी भी डर लगता है और पति हों साथ तो कभी भूल से भी ड्राइविंग व्हील को हाथ नहीं लगाती)।

कल स्कूल के पार्किंग लॉट में मुड़ ही रही थी कि पीछे पुलिस की गाड़ी की भयानक "ढैं-ढैं" हार्न की आवाज़ से चौंकी। " हैं? क्या ये मेरे लिये है? मैंने क्या किया?" नियमानुसार तो मुझे उसी वक़्त गाड़ी दाहिनी तरफ़ खड़ी कर देनी चाहिये थी, मगर मैंने और थोड़ा आगे ले लिया और वह पुलिस की गाड़ी फिर " ढैं-ढैं" । मैंने गाड़ी रोक दी। और पुलिस वाला तेज़ी से गाड़ी से उतरा। मेरी तरफ़ तेज़ी से आया।

मैंने उससे पूछा, ( बिल्कुल चूहे जैसी आवाज़ में- स्क्वीक स्क्वीक)- "  क्या बात है?"

पुलिस वाला कड़ी आवाज़ में बोला, " मैं जब आपको रोकने के लिये कह रहा था, तो आपने रोका क्यों नहीं?"

" स्क्वीक स्क्वीक- रोका तो...मुझे नहीं पता था कि आप मुझे रोक रहे थे, पर बात क्या है"

" आप स्टॉप साइन पर नहीं रुकीं थीं"


" (स्क्वीक स्क्वीक)- रुकी तो थी।

" आपको पता है कम्प्लीट स्टाप और रोलिंग स्टाप में फ़र्क़ है? आप को पूरी तरह रुकना था।"

"ह्म्म...रुकी तो थी...स्क्वीक..."

" अपना लाइसेंस दें"

"जी...मैं इतनी डर गई हूँ"


" डर क्यों गईं हैं?"

" आप ...मैं डर गई हूँ (स्क्वीक)" (लाइसेंस दिया)


 "गाड़ी के पेपर्स दिखायें।"


"जी- आज ये मेरे पति की गाड़ी है, वह ही संभालते हैं सब, देखती हूँ"
(किसी तरह ढूँढते हुए वो पेपर्स मुझे मिले।)


"आप गाड़ी में बैठिये- मैं आपको कारर्वाही के डॉक्यूमेंट्स आप तक ला कर दूँगा।

"जी, ठीक है"

मेरी हालत ख़राब थी। जाने कितने का जुर्माना हो और ऊपर से अगर पाइंट्स कटे तो जाने इन्श्योरेंस कितना बढ़ जाये। उफ़! कहाँ फँस गई सुबह-सुबह।

पति को सेल पर फ़ोन किया- "सुनो, मझे न ट्रैफ़िक पुलिस ने पकड़ा है, कहता है, स्टाप साइन पर नहीं रुकी"

उन्होंने टिपिकली पति स्टाइल में कहा," मुझे पता था, तुम से मैंने पहले ही कहा था, ठीक से देख कर चलाया करो... यार! देखो अब  कितने की फ़ाइन लगाता है"।

"क्या यार, मैं अभी परेशां हूँ..."

"ठीक है, परेशान हो कर क्या होगा, देखो क्या कहता है वो"

कोई १५-२० मिनट बाद वह पुलिस वाला निकला अपनी गाड़ी से और मेरी तरफ़ आया।

अचानक ही जैसे हृदय परिवर्तन हो चुका था उसका।

उसने कहा, (बड़े ही प्यार से)- देखिये, स्टॉप साइन पर पूरा रुकना पड़ता है। आप रोल कर रहीं थीं। इसके वैसे तो डेढ़ सौ डालर का जुर्माना और ३ पाइंट्स कटते हैं ,पर आपको आज मैं वार्निंग दे कर ही छोड़ रहा हूँ।  आइंदा कभी आपने ये किया तो, फिर माफ़ी नहीं मिलेगी। "

मेरी जान में जान आई। मैंने कहा (अभी भी- स्क्वीक-स्क्वीक), " थैंक्यू सो मच"।

" और देखिये, जब पुलिस पीछे से आपको रोकने को कहे तो रुक जाते हैं, तभी उसी वक़्त"

" हाँ, पर मुझे समझ नहीं आया था कि आप मुझे रुकने को कह रहे थे"

"पर फिर भी, अगर वो आपके लिये नहीं होगा तो, पुलिस आगे बढ़ जायेगी, पर आपको रोकना ज़रूरी होता है"

" जी.... थैक्यू, फिर से"

और पुलिस वाला अपनी लाल-पीली बत्ती वाली भयानक गाड़ी घुमा कर चला गया।

बाद में सोचने पर लगा, शायद उसने मेरा ड्राविंग रिकार्ड क्लीन देख कर पहली ख़ता समझ कर माफ़ कर दिया हो, और स्कूल में अक्सर ही अभिभावकों की गाडि़याँ बहुत परेशान करती हैं , कई कम्प्लेन आते हैं, पर जब उसे पता चला हो कि मैं उसी स्कूल की टीचर हूँ, तो शायद थोड़ी नरमी से काम लिया हो उसने। चाहे जो भी हो, अब मैं उस स्टॉप साइन पर ज़रूरत से ज़्यादा समय रुकती हूँ, चाहे पीछे वाली गाड़ी हार्न मारे या कुछ भी करे, या वह पुलिस वाला आकर कहे कि स्टाप साइन पर इतनी देर नहीं रुकते मैडम।

Thursday, December 17, 2009

मैं छोटे, बड़े सभी को सही सम्मान दूँगा

वो स्कूल के आफ़िस के सामने, अन्य बच्चों के साथ, फ़र्श पर बैठा अपनी मां के आने का इंतज़ार कर रहा था। मुझे उसकी आँखों से दो बूँद आँसू ढुलकते दिखाई दिये। मैं उसे उसकी कक्षा में नहीं पढ़ाती पर, उसे स्कूल में रोज़ देखती हूँ। सो , मैं उसके पास जाती हूँ और कहती हूँ, " क्या बात है बेटे? तुम ठीक हो न? तुम्हारी मां अभी आती ही होंगी"। 

वो मेरी तरफ़ नहीं देखता, और धीरे से कहता है, " मैं आपको देख कर मुस्कराया, आप वापस नहीं मुस्कराईं"। " ओह! आइ ऐम सो सारी बेटे, मैंने तो तुम्हें देखा ही नहीं।" 

फिर मैं उसके साथ एक छोटा सा खेल खेलती हूँ, " चलो दोनों साथ मुस्करायें..एक...दो...और ये तीन" दोनों साथ मुस्कराते हैं और मैं अपने पीछे खड़े उसकी अभी पहुँचे मां को भी मुस्कराता पाती हूँ। 

बच्चे कह पाते हैं...क्या हम?...

पिछले दिनों मेरे बचपन के स्कूल के एक सीनियर ने आर्कुट पर कुछ तस्वीरें लगाईं। वह साउथ अफ़्रीका में वह स्टेशन घूम आया जहाँ महात्मा गांधी को ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास कम्पार्ट्मेंट से उतार दिया गया था।  उस घटना ने उनकी ज़िंदगी बदल दी और उन्होंने दुनिया को बदलने का सोच लिया। अचानक ही फिर से जैसे उस काले, पतले, सीधे-साधे आदमी के लिये एक बार श्रद्धा उमड़ आई मेरे मन में। कितनों में होती है हिम्मत...?


पिछले साल, मैंने अपने स्कूल में बुलींग प्रिवेन्शन को लेकर काफ़ी काम किया था।  कई वर्कशाप में जाकर मैंने जाना कि मनोवैज्ञानिक या साइकोलॉजिकल बुलींग बहुत खतरनाक होती है, और बच्चों में, ख़ासकर लड़कियों में होती पाई जाती है। विशेषकर उनके साथ जो स्कूल में नये आते हैं।  उनको अनदेखा करना, अलग-थलग कर देना, बात न करना, मुँह फेर लेना आदि...और मैं सोचती थी, बड़ों की दुनिया कहाँ अलग है?

आज सुबह स्कूल में  ’आज का विचार’ पढ़ा गया, " मैं छोटे, बड़े सभी को सही सम्मान दूँगा।"

Tuesday, December 15, 2009

आज सारा दिन जिंजर-ब्रेड आदमी को ढूँढते हुये

छुट्टियों के आने की तैयारी हो रही है स्कूलों में। किसी कक्षा में जिंजर-ब्रेड मेन बन रहे हैं तो किसी कक्षा में हनुका के लिये लैटके बन रहे हैं। स्कूल के शीत- उत्सव (विन्टर कन्सर्ट) में प्यारे- प्यारे, छोटे-छोटे बच्चों को अपने छोटे-छोटे हाथों को नचा-नचा कर गाने के साथ ऐक्शन करते हुये स्टेज पर देख कर मन अनायास ही खुश हो जाता है। 

आज मेरा दिन इन ३-४ साल के बच्चों के साथ जिंजर-ब्रेड मैन को ढूँढते हुये निकला। बड़ी मेहनत से क्लास में सब ने टीचर की मदद से इन जिंजर-ब्रेड मैन कुकीज़ को बनाया और टीचर जा कर स्कूल के किचन में इन्हें अवन में रख आई। मगर जैसे ही कुछ बच्चों के साथ वो उन्हें लेने पहुँची, जिंजर-ब्रेड मेन तो वहाँ थे ही नहीं। सब के सब भाग चुके थे अवन से। तो फिर हम सब निकले उनकी खोज करने।


पहले किचन में एक नोट मिला, जिसमें लिखा हुआ था- आप मुझे केयर टेकर (स्कूल की सफ़ाई आदि का ध्यान रखने वाला स्टाफ़) के ऑफ़िस में ढूँढिये। वहाँ जब बच्चे टीचर के साथ गये तो उन्हें एक और नोट मिला कि वो सब तो भाग कर कम्प्यूटर लैब गये हैं। बच्चे वहाँ ढूँढ आये और इस तरह एक के बाद एक कई कक्षाओं में, प्रिंसिपल के आफ़िस में और स्कूल में हर जगह ढूँढ आने के बाद वह उन्हें मिले ...तो लाइब्ररी में। फिर सब ने उन्हें लाकर, उन पर कक्षा में आइसिंग कर उन्हें खा लिया।

बच्चे कितने भोले होते हैं। सब के सब उन जिन्जर ब्रेड कुकीज़ को इस तरह ढूँढ रहे थे जैसे सच वो भाग कर कहीं छुप गये हैं। उनके मिल जाने पर बच्चों की खुशी के एक्सप्रेशन को शब्दों में बयान करना मुमकिन नहीं। 

इन नन्हें फूलों के कि़स्सों से अब लगता है मेरा ब्लाग सजता ही रहेगा।

Saturday, November 28, 2009

श्रीकांत आचार्य- आमार शाराटा दीन

बँगला गानों की शृंखला में, ये एक अत्यंत मधुर गीत आज, श्रीकांत आचार्य की आवाज़ में। मैंने इस गीत को पहली बार कुछ दिनों पहले ही, बंगाल से एक दोस्त के भेंट करने पर सुना।  इतना मधुर संगीत और मख़मली आवाज़ में इस गीत को सुन कर भाषा को जानने न जानने की ज़रूरत नहीं रह जाती है। फिर भी शब्द दे रही हूँ साथ में-



बंग्ला मे गीत- (नीचे हिन्दी में भावानुवाद)

आमार शारा टा दीन, मेघला आकाश बृष्टि तोमाके दीलाम
शुधु श्राबन संध्या टुकु तोमार थेके चेये निलाम

हृदयेर जानाला ए चोख मेले राखि
बाताशेर बांशी ते कान पेते थाकी
ताके ई काछे डेके
मोनेर आँगिना थेके
बृष्टि तोमाके तोबू फिरिये दिलाम

तोमार हाथ ए ई होक रात्रि रचना
ए आमार स्वप्न सूखेर भाबना
चेयेछि पेते जाके चाईना हाराते ताके
बृष्टि तोमाके ताई फिरे चाइलाम

हिन्दी में भावानुवाद-

मेरा सारा ये दिन, मेघमय आकाश, वृष्टि तुम्हें दे दी मैंने
बस श्रावन संध्या ही एक तुम से मांग ली है मैंने

हृदय की खिड़की पर आंखें बिछाये बैठा हूँ
हवा के बंसी पर कान लगाये बैठा हूँ
उसे ही पास बुला कर
मन के आंगन से
बृष्टि तुम्हें फिर भी लौटा रहा हूँ


तुम्हारे हाथों ही हो रात्रि रचना
यही मेरा स्वप्न है, सुख की भावना
जिसे पाना चाहा है, उसे चाहता नहीं खोना
वृष्टि तुम्हें इसलिये वापस मांगता हूँ

Friday, November 20, 2009

नन्हें फूल- रोज़ ही एक नया मज़ेदार कि़स्सा

"अब के इस मौसम में नन्हें
फूलों से महकी गलियाँ हैं"

इस शेर को जब लिखा था तो वो प्यारे-प्यारे, छोटे-छोटे बच्चे थे दिमाग़ में, जिन्हें पढ़ाने का मौक़ा मिला है इस साल। कक्षा किंडर्गार्टन से कक्षा दूसरी तक के बच्चे, ४ - ७ साल तक के।


शुरुआत में बड़ी परेशानी होती थी। मैं घबराई हुई सी इन कक्षाओं में जाती थी।  इतने छोटे बच्चों को पढ़ाने का कोई अनुभव नहीं था मुझे। मगर अब कोई २-३ महीने बाद, हर दिन एक खुशगवार दिन होता है और हर दिन के नये कि़स्सों को घर आकर याद कर के चेहरे पर अपने आप मुस्कराहट आ जाती है। रोज़ एक नया मज़ेदार क़िस्सा।

अभी कल की ही बात है। किंडरगार्टन के बच्चों को स्कूल में ही, लाइब्ररी ले कर जाना था। उनकी कक्षा से दूर, सीढ़ियों से ऊपर लाइब्ररी में ले जाना मतलब, पहले ही हिदायतें दोहरानी होती हैं-
"हम लाइन में कैसे चलते है?"
" मुँह पर उँगली रख कर...."
"क्या हम लाइन में चलते हुए अपने दोस्त से बात करते हैं?
"न-हीं--" (-कोरस में सभी-)
"जब हम सीढ़ी चढ़ते हैं तो क्या ज़रूरी है?"
"सीढ़ी की रेलिंग पकड़ना"
आदि आदि...
इस तरह से उनको (मैं बच्चों की लाइन की तरफ़ मुँह किये हुये, अपनी उँगली अपने होठों पर रखे हुये,  धीरे-धीरे क़दम दर क़दम पीछे की ओर चलते हुये) लाइब्ररी तक ले कर जाती हूँ। यहाँ बच्चे अपनी पसंद की किताब लेते हैं और एक बेंच पर बैठ कर सब बच्चों के किताब ले लेने तक प्रतीक्षा करते हैं।

कल देखा, बेंच पर बैठी, ये छोटी सी बच्ची, चार-साढ़े चार साल, की खूब खी-खी कर के हँस रही है।  मैंने पूछा कि क्या हुआ है? पास ही बैठी दूसरी बच्ची ने बताया, "मिसेज़ चटर्जी, फ़लाना इज़ टेलिंग दैट दे आर किसिंग" । मुझे हँसी आई, और मैंने कहा, "व्हाट इज़ इट हनी? " तो उस बच्ची ने अपनी किताब दिखाई, परी कथा थम्बलीना की कहानी में, आखिरी पन्ने पर राजकुमार और राजकुमारी पास-पास खड़े थे। वो कहने लगी, "दे आर किसिंग" । मैंने कहा, :" नो दे आर नाट..., दे आर स्टैंडिंग"। बच्ची ने थोड़े ध्यान से उस तस्वीर को फिर देखा और मुझे समझाते हुए कहा," येस, बट दे आर गोंइंग टु किस आफ़्टर" - (बस मन में यही कह पाई- जी अच्छा दादी अम्मा)

एक बच्चा है कक्षा पहली में, उसे मैंने कारीडर में चलते हुये नहीं देखा है कभी। वो अपने जूतों से लगातार फिसलते हुए ही चलता है। और फिर ब्रेक लगाते हुये, गिरते हुये, और फिर फ़िसलते हुये...हम टीचर भी अपना काम करते हैं, उसे रोज़ समझाते हैं, और वापस जाकर फिर चल कर आने को कहते हैं...आदि आदि, न वो सुधरा है अब तक, न हम :-)

सबसे अच्छा लगता है जब ये बच्चे खिल-खिल कर के हँसते हैं। छोटी-छोटी बातें इनको हँसाने के लिये काफ़ी होती हैं। कल एक खेल खिलवा रही थी बच्चों से। सभी एक गोलाकार में बैठे। एक बच्चे को खड़े होकर सबसे पहले अपनी उँगली को पेन्सिल मान कर हवा में अपना नाम लिखना था। फिर अपने सिर को पेन्सिल मान कर, फिर अपने पेट को , कुहनी को, आदि आदि...उनकी निश्छल हँसी देखते बनती थी।

रोज़ के कई कि़स्से...जाने कितने, इन दो महीनों में ही...जो सालों से इस उम्र के बच्चों को पढ़ा रहे हैं, उनके पास तो किस्सों का ख़ज़ाना होगा, इसमें भला क्या संदेह है...

Thursday, November 12, 2009

भालोबाशो शुधु भालोबाशो- हेमंत कुमार


बचपन में इस गाने को सुनती थी, एल.पी. रेकार्ड पर। आज ये आनलाइन मिल गई। हेमंत कुमार द्वारा गाया ये बंग्ला गीत- भालोबाशो शुधु भालोबाशो। इसके रचनाकार कौन हैं नहीं जानती, पर शायद संगीत हेमंत कुमार का अपना हो, पक्का पता नहीं। इस गाने के मिठास के क्या कहने।



बंग्ला गीत (नीचे हिन्दी में भावानुवाद)


अनेक रात
झिमोनो चाँद
शब्द नेई
कथा कोयोना ना
भालोबाशो शुधू भालोबाशो

माझे-माझे
पाता देर
काना कानी
फिश-फिश
बहू दू्रे आकाशे ते
तारादेर म्जलिस
दूटी हृदय
स्वप्नमय
अनुभवे बाधा दियो ना

जूई बोने शिशिरे
आनागोना टूक-टूक
जोनाकी आर झाउ शाखार
लूकोचूरी चूप-चूप
दूटी चोखे जोतो कोथा
संकेते शोरे जेओ ना
भालोबाशो शुधू भालोबाशो

हिन्दी भावानुवाद 

गहरी रात
नशीला चांद
सन्नाटा
बातें न करो
प्रेम...बस प्रेम

कभी-कभी
पत्तों की
कानाफ़ूसी
फिस-फिस
बड़े दूर आकाश में
तारों की मजलिस
दो हृदय
स्वप्नमय
अनुभूति में
बाधा न बनो
प्रेम बस... प्रेम

जूही बन में
शिशिर के बीच
आनाजाना
टुक-टुक
जुगनु और
झाउ की डार
लुकाछिपी
चुप-छुप
दो आँखों में
जितनी बातें
इशारों से
दूर न जाओ
प्रेम...बस प्रेम

Wednesday, November 04, 2009

क्या आप सत्तर के दशक में पैदा हुये हैं?

क्या आप ७० के दशक में पैदा हुये हैं? या ऐसा कहें कि ८०-९० के दशक में बड़े हो रहे थे...स्कूल जा रहे थे, कालेज जा (नहीं जा, बदले में फ़िल्म देखने) रहे थे?

तब तो -

- फ़ैंटम, मैंड्रेक, बहादुर (वो घोड़े पर...) आपके ड्रीम हीरो थे। आप अगर लड़की हैं, तो "प्रेत का विवाह" वाली कॉमिक (वेताल) कई बार पढ़ चुकी थीं। इसके अलावा, लोट-पोट, चंदामामा, चंपक, नंदन, चाचा चौधरी और साबू, मधुमुस्कान आपके प्रिय पत्रिकाओं में से हुआ करती थीं, और पढ़ाकुओं के लिये कम्पिटीशन सक्सेस रिव्युह

-अमर चित्रकथा दोस्तों से बदल बदल कर पढ़ना और उसकी सिरीज़ जमा करना आपके लिये गर्व की बात होती थी।

- कैमलिन ज्यामिती बाक्स और फ़्लोरा पेन्सिल आपको बर्थडे पर मिले होंगे।

-छुट्टी पर जाने का मतलब दादा-दादी या नाना नानी जी से मिलने जाना होता था।

-आइसक्रीम का मतलब आरेन्ज स्टिक या वनीला का कोन हुआ करता था। वाडीलाल, दिनशा आदि कुछ नये नाम आने लगे थे आइसक्रीम की दुनिया में।

-आपकी फ़ैमिली कार फ़ियट (या अम्बैसैडर) थी।

-उस गाड़ी में पर्दे लगे होते थे, सफ़ेद नेट के बने हुये, शायद मां के हाथों सीये हुये।

-शायद एक छोटा सा पंखा भी लगा हो गाड़ी मॆं।

-आप सर्कस देखने एक न एक बार तो ज़रूर गये होंगे जहाँ, झकमक कपड़ों में लड़कियाँ करतब दिखाती थीं, बौने जोकर बेसर पैर की बातें कर हँसाते थे और किसी बैट जैसी वस्तु से एक दूसरे के पीछे मारते थे।

-अगर आपके घर टी.वी. था तो चित्रहार के समय घर पर भीड़ जमा होना कोई नई बात नहीं थी। रविवार को शाम को दूरदर्शन पर सिनेमा और दोपहर को रीजनल मूवी (सबटाइटल्स के साथ) आप बड़े शौक़ से देखते थे। कृषिदर्शन क्यों दिखाते हैं आपको कभी समझ नहीं आया क्योंकि वो वक़्त आपको पढ़ाई करने के लिये बैठना पड़ता था । रविवार को सुबह दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत के वक़्त पूरे शहर में कर्फ़्यू लग जाता था।

-जे.बी रमन और सलमा सुलतान (बालों में गुलाब के फूल के साथ, बिना मुस्काये समाचार पढ़ते हुये) आपके घर के सदस्य बन बैठे थे। किसी नेता के देहांत हो जाने पर तीन दिन का शोक दूरदर्शन पर आपको बहुत पीड़ा देता था, जब सारे दिन बांसुरी और शास्त्रीय संगीत सुनना पड़ता था।

-इंदिरा गांधी का देहांत और राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन का टीवी पर उनकी अंतिम क्रिया पर दिखाया जाना, सीधा प्रसारण, घरों मॆं टीवी देखने वालों की भीड़, भूले नहीं होंगे आप।

-घर में मार्डर्न गजेट के नाम पर फ़्रिज, मिक्सी और टी.वी. हुआ करते थे।

-डिस्को दीवाने नाज़िया हसन के गानों के आप दीवाने थे।

-मां, पिताजी, स्कूल के टीचर से मार खाना कोई बड़ी बात नहीं थी।

-तस्वीरें खींचना/खिंचवाना बड़ी बात थी। ३६ फ़िल्मों वाले कैमेरा से या किसी स्टुडियो में जा कर परिवार सहित फ़ोटो खिंचवाई होगी आपने, जहाँ सभी सावधान की अवस्था में खड़े हों।

-थोड़े बड़े होने पर लड़कियाँ, मिल्स ऍन्ड बून्स पढ़ाई की किताबों के नीचे रख कर कभी तो पढ़ी होंगी।

-बिनाका/सिबाका गीत माला रेडियो पर सुनना....

यादें बहुत सी हैं...अभी बस इतना ही ...

(एक फ़ार्वर्डेड ईमेल से कई अंश लिये गये हैं, जिसने सचमुच पुराने दिन याद दिला दिये...)


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Sunday, September 27, 2009

डूब जायें बस...मुल्तानी काफ़ी- उस्ताद सलामत खां

मुल्तानी-काफ़ी राग सिन्धी भैरवी में उस्ताद सलामत खां की आवाज़ में - डूब जायें बस...

मुल्तानी काफ़ी एक तरह की गायकी है जिसमें सूफ़ी प्रभाव देखा जा सकता है। इसे सिन्ध और पंजाब में बहुत गाया जाता है। ये बहुधा पंजाबी या सिंधी भाषा में होती है। ये मुल्तानी काफ़ी ख्वाजा ग़ुलाम फ़रीद की लिखी हुई है।