एक ग़ज़ल और...
दुआ मे तेरी असर हो कैसे
सिर्फ़ फूलों का शहर हो कैसे
आप आ तो गये ज़िन्दगी में
साथ ये ज़िन्दगी बसर हो कैसे
बात जज़्बात की होती नहीं बस
रेत पर खड़ा ये घर हो कैसे
ये मुहब्बत है कोई खेल नहीं
इतना आसां भी सफ़र हो कैसे
बात माने नहीं चाँद क्यों आज
छुपता ही नहीं तो सहर हो कैसे
ढूँढते ही रहे चारों तरफ़ हम
दिल में जो छुपा, उधर हो कैसे
आप से हम ख़फ़ा तो नहीं हैं
दोस्ती ऐ 'दोस्त' मगर हो कैसे
--मानोशी
सिर्फ़ फूलों का शहर हो कैसे
आप आ तो गये ज़िन्दगी में
साथ ये ज़िन्दगी बसर हो कैसे
बात जज़्बात की होती नहीं बस
रेत पर खड़ा ये घर हो कैसे
ये मुहब्बत है कोई खेल नहीं
इतना आसां भी सफ़र हो कैसे
बात माने नहीं चाँद क्यों आज
छुपता ही नहीं तो सहर हो कैसे
ढूँढते ही रहे चारों तरफ़ हम
दिल में जो छुपा, उधर हो कैसे
आप से हम ख़फ़ा तो नहीं हैं
दोस्ती ऐ 'दोस्त' मगर हो कैसे
--मानोशी
Labels: poetry