मानसी

कुछ दिल से...

Monday, April 18, 2005

एक ग़ज़ल और...

दुआ मे तेरी असर हो कैसे
सिर्फ़ फूलों का शहर हो कैसे

आप आ तो गये ज़िन्दगी में
साथ ये ज़िन्दगी बसर हो कैसे

बात जज़्बात की होती नहीं बस
रेत पर खड़ा ये घर हो कैसे

ये मुहब्बत है कोई खेल नहीं
इतना आसां भी सफ़र हो कैसे

बात माने नहीं चाँद क्यों आज
छुपता ही नहीं तो सहर हो कैसे

ढूँढते ही रहे चारों तरफ़ हम
दिल में जो छुपा, उधर हो कैसे

आप से हम ख़फ़ा तो नहीं हैं
दोस्ती ऐ 'दोस्त' मगर हो कैसे

--मानोशी

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Monday, April 11, 2005

सोता हूँ आराम से...

फुटपाथ पर सब कुछ भुला, सारे दिन की थकान के बाद, आराम की नींद सोने वालों के नाम लिखी थी ये कविता...

घुटनों से भर पेट
फटे आस्मां से ढक बदन
पैबंद लगी ज़मीं पर
सोता हूं मैं आराम से....

माथे पर की ओस हटा
गरजते बादलों को डरा
चाँद को भी मुँह चिढा
सोता हूँ मैं आराम से...

दीवारों से लड़ झगड़
कोहनी का तकिया लगा
सूखी शाख़ पर सपने टांग
सोता हूँ मैं आराम से...

तारों से आँखें लड़ा
अपने को गले लगा
बाहों की गर्मी में
सोता हूँ आराम से...

----मानोशी

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