प्रेम की व्यथा
भर गयी जब मेरी अन्जुलि
प्रेम से मन रंगा जब प्रिये
बँधी कुटिया जब मन-आंगन में
सूना कर प्रभु छोड चले
तन मन से जब हुई तुम्हारी
स्वप्न के लिये जब खुले किवाड
कुछ इच्छाओं ने मारी किलकारी
मन उड चला जब क्षितिज के पार
व्यथित हृदय होठों पर हँसी
वेदना सिक्त हुआ अस्थिर मन
बावरे होंठ हँस कर रोयें
कर अहसास वो मधुर छुअन
स्मृतिक्षण लहर बन खेल रहे
सागर में पीडा मन्थन ज्यों
तुम आज नयन में अश्रु बन झरे
प्रेम पूजा तप इतना कठिन क्यों
--मानोशी
प्रेम से मन रंगा जब प्रिये
बँधी कुटिया जब मन-आंगन में
सूना कर प्रभु छोड चले
तन मन से जब हुई तुम्हारी
स्वप्न के लिये जब खुले किवाड
कुछ इच्छाओं ने मारी किलकारी
मन उड चला जब क्षितिज के पार
व्यथित हृदय होठों पर हँसी
वेदना सिक्त हुआ अस्थिर मन
बावरे होंठ हँस कर रोयें
कर अहसास वो मधुर छुअन
स्मृतिक्षण लहर बन खेल रहे
सागर में पीडा मन्थन ज्यों
तुम आज नयन में अश्रु बन झरे
प्रेम पूजा तप इतना कठिन क्यों
--मानोशी
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