मानसी

कुछ दिल से...

Monday, May 30, 2005

प्रेम की व्यथा

भर गयी जब मेरी अन्जुलि
प्रेम से मन रंगा जब प्रिये
बँधी कुटिया जब मन-आंगन में
सूना कर प्रभु छोड चले
तन मन से जब हुई तुम्हारी
स्वप्न के लिये जब खुले किवाड
कुछ इच्छाओं ने मारी किलकारी
मन उड चला जब क्षितिज के पार
व्यथित हृदय होठों पर हँसी
वेदना सिक्त हुआ अस्थिर मन
बावरे होंठ हँस कर रोयें
कर अहसास वो मधुर छुअन
स्मृतिक्षण लहर बन खेल रहे
सागर में पीडा मन्थन ज्यों
तुम आज नयन में अश्रु बन झरे
प्रेम पूजा तप इतना कठिन क्यों

--मानोशी

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Thursday, May 12, 2005

तुम ही तो थे...


भगवान जिसे कहते हैं हम, वो और क्या है कि बस हम खुद ही, हमारे अन्दर की शक्ति। मन्त्र जाप और पूजा से ज़्यादा अपने को संयमित रखने की ज़रूरत होती है शायद...(अभी बहुत ज़्यादा कहने की योग्यता नहीं है मुझमें)


तुम ही तो थे...

तुम ही तो थे जो साथ थे मेरे
माना न पर कभी तुम्हें भगवान
जब यथार्थ से टकरा कर लहुलुहान हो
काँपे थे थर थर मेरे प्राण

आकाश ने सिर्फ़ अन्धेरा बरसाया
जब किसी भीषण दुख में मेघ डूब के रोये
तुम्ही तो थे जिसने मेरी पीठ सहलाई
और मेरे जीवन में कही से नव गति आई

कभी जब सूखी रेत की आंधी चली
साथ उड़ चला था मेरा भीरु मन भी
उस आंधी के एक हवा ने जो मुझे धकेला
हाथ थाम कर तुमने रहने न दिया अकेला

एक किनारे पर खडा खुद को मैने पाया
कब चुपके से रास्ता तुमने दिखाया
तुम्ही तो थे जिसने मुझे जीवन समझाया
जटिल ताने बाने में बंधा रूप इसका दिखाया

तुम ही तो थे जिसने हाथ बढा कर
अपने सशक्त हाथों से मेरा हाथ थामा
रातों को मेरे अन्धेरे मन में आकर
सिसकियों को एक सुर में बाँधा

मैने न मानी कभी तुम्हारी माया
धूप चन्दन न कभी फूल चढाया
पर शीश जो एक बार मैने आज झुकाया
अपने ही हृदय में अद्रुश्य हो तुम्हें बसा पाया

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