रौद्र मूरत लिये प्रचंड प्रकोपी
आ गया रवि तेज दिखाने
दोपहर के सूने मरुथल में
अलसाया सा गोते लगाने
संग अजगर सी लंबी सिसकी
खूब लंबी सांय-सांय करती
लू लपलपाती अपनी जिह्वा
दिशा दिशान्तर बाँहों में भरती
कंपकपाती ठिठुर पर अपनी
चमचमाती तलवार चलाती
सूखे पत्तों के नृत्य में
बेताल ही तांडव दिखाती
दिन भर हाहाकार मचा कर
सारे जग को सता कर
सन्नाटे को और बढाकर
गलियों में लू संग उत्पात मचाकर
एक नन्हें बालक की चोरी
शाम को ज्यों पकडी जाती
चुपचाप आँखें झुका कर
सुन्दर बयार में घुलमिल जाती
निकल पडे जो पाँव धूप के
विस्तृत फैले इस आँगन में
गरम हथेली की ताप पर
झुलस गया सारा जग ये
--मानोशी
आ गया रवि तेज दिखाने
दोपहर के सूने मरुथल में
अलसाया सा गोते लगाने
संग अजगर सी लंबी सिसकी
खूब लंबी सांय-सांय करती
लू लपलपाती अपनी जिह्वा
दिशा दिशान्तर बाँहों में भरती
कंपकपाती ठिठुर पर अपनी
चमचमाती तलवार चलाती
सूखे पत्तों के नृत्य में
बेताल ही तांडव दिखाती
दिन भर हाहाकार मचा कर
सारे जग को सता कर
सन्नाटे को और बढाकर
गलियों में लू संग उत्पात मचाकर
एक नन्हें बालक की चोरी
शाम को ज्यों पकडी जाती
चुपचाप आँखें झुका कर
सुन्दर बयार में घुलमिल जाती
निकल पडे जो पाँव धूप के
विस्तृत फैले इस आँगन में
गरम हथेली की ताप पर
झुलस गया सारा जग ये
--मानोशी
Labels: poetry