मानसी

कुछ दिल से...

Friday, June 24, 2005

रौद्र मूरत लिये प्रचंड प्रकोपी
आ गया रवि तेज दिखाने
दोपहर के सूने मरुथल में
अलसाया सा गोते लगाने

संग अजगर सी लंबी सिसकी
खूब लंबी सांय-सांय करती
लू लपलपाती अपनी जिह्वा
दिशा दिशान्तर बाँहों में भरती

कंपकपाती ठिठुर पर अपनी
चमचमाती तलवार चलाती
सूखे पत्तों के नृत्य में
बेताल ही तांडव दिखाती

दिन भर हाहाकार मचा कर
सारे जग को सता कर
सन्नाटे को और बढाकर
गलियों में लू संग उत्पात मचाकर

एक नन्हें बालक की चोरी
शाम को ज्यों पकडी जाती
चुपचाप आँखें झुका कर
सुन्दर बयार में घुलमिल जाती

निकल पडे जो पाँव धूप के
विस्तृत फैले इस आँगन में
गरम हथेली की ताप पर
झुलस गया सारा जग ये

--मानोशी

Labels:

Saturday, June 04, 2005

तेरे आने से...ग़ज़ल

तेरे आने से ज़िन्दगी देखी
अंधेरों में कहीं रोशनी देखी

जाने भी दे दिया तुम्हे हमने
मौत खुद आज ही अपनी देखी

कुछ तो है बात जो रात भर आज
ख्वाब और नींद में ठनी देखी

आर्ज़ू ये थी कोई नाता होता
दोस्ती मिली न दुश्मनी देखी

मांगी थी दुआयें कितनी हमने
खुदा से न आज तक बनी देखी

--Manoshi

Labels: