मानसी

कुछ दिल से...

Monday, August 29, 2005

लौट चल मन

लौट चल मन
दुविधा छोड सब
लौट चल अब

सीमायें तज भटक भटक
थक कर चूर
घर से दूर
श्रांत मन हो शांत
लौट चल अब

मधुर अमृत की लालसा में
चाह कर विष किया पान
प्रीत भँवर में उलझ कर
मिथ्या आनंद से किया स्नान
ग्लानिसिक्त रुदन छोड
अब झूठे बंधन तोड
सब अश्रु संचय कर
अंजुरि में भर
लौट चल मन

विहगवृंद संग क्षितिज के पार
स्वर्ण रेखा स्पर्श करने
घुलमिल कर जोड श्वेत पर
चला मन तू किसे हरने
झूठ बांध झोली में
नश्वर तारों की टोली में
मिथ्या वेष धर
सुख-स्वप्न आलिंगन कर
मिलेगा क्या ऐ मन
अब लौट चल...

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Saturday, August 20, 2005

शाम हुई और तुम नहीं आये

आज फिर शाम हुई और तुम नहीं आये
आसमां की लाल बिंदी
छूने चली भौहें क्षितिज की
और कुछ झोंके हवा के
ढेरों भीगे पल ले आये
पर तुम नहीं आये

चल पड़ा ये मन अचानक
फिर उसी पेड़ के नीचे से गुज़रा
कुछ सूखे पत्ते पड़े थे नीचे
और एक पहचानी खुश्बू आ लिपटी
वैसा ही एक पत्ता कबसे
मेरेसपनों के पास रखा है
कभी रेत की सूखी आँधी में
जाने क्यों मचल उठता है
उड़ता है गोल गोल और
उस खुश्बू से जा उलझता है
जैसे उलझा करते थे कभी
झूठी कहानियों पे हम भी
आज पत्ते क्यों चुपचाप पड़े हैं
कैसे उस खुश्बू को समझायें
शाम वही पर तुम नहीं आये

गुज़रा अभी मेरे पास से एक क्षण
हल्की सी दस्तक दे गया वो
गुनगुना रहा था वही धुन जिसपे
हम दोनों साथ चले थे कभी
कितने बेसुरे लगते थे तुम
मेरा सुर हँसता था तुम पर
आज भी वो ढुँढ रहा तुम्हें
अब कैसे उस सुर को समझायें
शाम हुई तुम क्यों नहीं आये

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Tuesday, August 09, 2005

कुछ हाइकु


vancouver dusk

टोरॊन्टो के बाद वैन्क्यूवर। बहुत फ़र्क़ है दोनों शहरों में । टोरोंटॊ न सोने वाला शहर कहा जाता है और सच भी है। सुबह के ३ बजे भी हाइवे पर गाडियाँ यूँ दौडती हैं जैसे सारे शहर को किसी खज़ाने की ख़बर लगी हो अभी अभी और सभी उसे ढूँढने चल पडे हों। टोरोंटो की भीषण सर्दी और भीषण गर्मी के बाद वैन्क्यूवर की सदाबहार बारिश के बारे में सुन कर कहीं एक राहत सी भी महसूस हुई थी कि बारिश को शवल नहीं करना पडता । वैंक्यूवर-बहुत ही सुन्दर शहर। चारों तरफ़ हरियाली । हर गली, हर मोड , हर सडक से हरे पहाड और समुद्र का मिलन होता दिखता है जैसे। संयमित भीड और उसे अपनी पीठ पर लादे चल रही हैं काली ऊँची-नीची पहाडी सडकें, बिना थके निरन्तर चलता आदमियों का हुजूम और सबको खुश रखने की कोशिश करत सुन्दर हल्का मौसम। बारिश तो खैर अभी भी नहीं दिखी है मगर सुना है एक बार शुरु होती है ये बारिश तो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। पता नहीं आने वाले समय में इस शहर से भी उतना ही प्यार हो पायेगा या नहीं जितना उस भीड भाड, कभी न सोने वाले शहर से हो गया था मगर वैन्क्यूवर के प्राकृतिक सौन्दर्य ने बहुत प्रभावित किया है। कुछ हाइकु लिखे हैं इस शहर पर और कुछ उस शहर को छोड आने की टीस में :

नई सुबह
अधजगी सी आंखें
दिशा ढूँढती

मन रो रहा
लौट चल वापस
अपने देस

रोये पर्बत
चूम कर मनाने
झुके बदरा

आंखें ढूँढती
विस्तॄत सागर में
खो जाने को

हल्की फुहार
रिमझिम के गीत
रुके न झडी

लदी भीड से
बलखाती चलती
काली नागिन

क्षितिज पार
घूमने चल पडा
वो हन्स झुंड

जगमग रात
सब तमाशबीन
मेला ये जग

--मानोशी

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