लौट चल मन
लौट चल मन
दुविधा छोड सब
लौट चल अब
सीमायें तज भटक भटक
थक कर चूर
घर से दूर
श्रांत मन हो शांत
लौट चल अब
मधुर अमृत की लालसा में
चाह कर विष किया पान
प्रीत भँवर में उलझ कर
मिथ्या आनंद से किया स्नान
ग्लानिसिक्त रुदन छोड
अब झूठे बंधन तोड
सब अश्रु संचय कर
अंजुरि में भर
लौट चल मन
विहगवृंद संग क्षितिज के पार
स्वर्ण रेखा स्पर्श करने
घुलमिल कर जोड श्वेत पर
चला मन तू किसे हरने
झूठ बांध झोली में
नश्वर तारों की टोली में
मिथ्या वेष धर
सुख-स्वप्न आलिंगन कर
मिलेगा क्या ऐ मन
अब लौट चल...
दुविधा छोड सब
लौट चल अब
सीमायें तज भटक भटक
थक कर चूर
घर से दूर
श्रांत मन हो शांत
लौट चल अब
मधुर अमृत की लालसा में
चाह कर विष किया पान
प्रीत भँवर में उलझ कर
मिथ्या आनंद से किया स्नान
ग्लानिसिक्त रुदन छोड
अब झूठे बंधन तोड
सब अश्रु संचय कर
अंजुरि में भर
लौट चल मन
विहगवृंद संग क्षितिज के पार
स्वर्ण रेखा स्पर्श करने
घुलमिल कर जोड श्वेत पर
चला मन तू किसे हरने
झूठ बांध झोली में
नश्वर तारों की टोली में
मिथ्या वेष धर
सुख-स्वप्न आलिंगन कर
मिलेगा क्या ऐ मन
अब लौट चल...
Labels: poetry
