कुछ साल पहले, जब मैं एक स्कूल विशेष में पढा रही थी, वहाँ के नियमानुसार बच्चों के माता-पिता से मुलाकात (पेरेंट-टीचर मीटिंग) से पहले हमेशा स्टाफ़ की एक मीटिंग बुलायी जाती थी। वहाँ हमारे से कहा जाता था, कि बच्चों की शिकायत करनी हो माता-पिता से तो 'लैदर बिफ़ोर यू शेव' का सिद्धांत अपनाया जाये। अर्थात अगर बच्चे की कोई विशेष खराब बात माता-पिता को बतानी हो, जिसे हमारे लिये उन्हें बताना ज़रूरी है, (चाहे वो कोई व्यवहारिक समस्या हो या पढ़ाई लिखाई से संबंधित) तो उसे बताने से पहले बच्चे के अच्छे गुणों की तारीफ़ करें। इस बात का बहुत सही फल मिलता था हमेशा। मगर वहीं कुछ अध्यापकों को ये भी कहते सुना था कि जो है सो है, माता-पिता को इतना समझदार तो होना ही चाहिये,कि अपने बच्चों में सही और गलत की पहचान कर सकें। कई बार बहुत से माता-पिता को शिक्षकों से नाराज़ हो कर जाते भी देखा है, और बवाल खडे होते भी। इस सब में चाहे स्प्ष्टव्क्ता भले ही कह लें कि सच तो सच रहता है, उसे कैसे भी कहा जाये, मुझे लगता है कि बात कहने के कई तरीके हो सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि किसी बुरी बात को उतने ही बुरे तरीके से कहा जाये, मगर वहीं सच को छुपाया भी न जाये। एक किताब पढी थी बहुत पहले,( जो बिल्कुल पसंद नहीं आयी थी), डेल कारनेगी की " हाउ टू विन फ़्रेंड्स ऐंड इन्फ़्लुएंस पीपल" जिसमें हर बात पर हमेशा लोगों की पसंद का खयाल रखने की बात कही गयी थी, जो ऐसे अभी सुनने में सही लग रही होगी मगर उस किताब को पढ़ कर मैंने उस वक्त निष्कर्ष निकाला था -मक्खनबाज़ी करने से सब खुश रहेंगे। मगर एक बात जो बहुत सही लगी थी उस किताब की, अब तक याद है- अगर आप बास हैं तो अपने सबार्डिनेट को सब के सामने अपनी इज़्ज़त बचाने का मौका दीजिये। अलग से डाँटिये, मगर सबके सामने कभी नहीं।
सबको तो खैर कभी भी खुश नहीं किया जा सकता मगर शायद इन छोटी छोटी बातों पर ध्यान दे कर लोगों का दिल दुखाने से बचा जा सकता है।
Tuesday, March 28, 2006
Tuesday, March 14, 2006
बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद
बिल्कुल बचपन में बच्चों की एक पत्रिका खूब पढ़ी -चंपक। कुछ कहानियाँ तो ऐसे दिल को छूती हैं कि ज़िन्दगी भर याद रहती हैं। उसी में छपी एक कहानी 'मालपूऒं की गंध' अब तक याद है। अमरचित्र कथा भी खूब पढ़ी। अब पता नही प्रकाशन होता है या नहीं उनका। फिर वेताल (फ़ैंटम) आदि तो थे ही। जिसने भी वेताल इंद्रजाल की कामिक्स पढी होंगी उन्हें 'प्रेत का विवाह' तो याद ही होगा। अभी कल किसी से बात होते होते बीच में मुहावरा आया, "बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद"। तभी चंपक में पढी इस कहानी की भी याद आ गयी जो इस मुहावरे के पीछे बताई गयी थी। अब याद कर के लगा...(आजकल के बच्चों की ज़ुबान में)- "वाऒ! कूल"
एक बंदर था। जंगल में रहता था। एक बार जंगल में एक पार्टी थी। वहाँ सभी जानवर आये हुये थे। पार्टी सियार के घर थी। सब ने छक कर खाना खाया। बंदर ने भी खाया। खाने-पीने के बाद सियार ने सबको सौंफ़ के बदले अदरक के छोटे छोटे टुकडे काट कर, उसमें नींबू और नमक लगा कर सबको दिया। सब ने एक-एक टुकडा उठाया और सब की देखा देखी बंदर ने भी। उसने पहले कभी अदरक खाया नहीं था। उसे बहुत पसंद आया अदरक का स्वाद। मगर और ले नहीं सकता था क्योंकि किसी ने भी एक-दो टुकडों से ज़्यादा लिया नहीं था । अदरक का स्वाद मुँह में लिये बंदर जी घर आये और आते समय बाज़ार से ढेरों अदरक ले आये। अदरक को ठीक उसी तरह छोटे छोटे टुकडों में काटा और नींबू और नमक लगाया। मगर इस बार उन्होंने जी भर के मुट्ठी पर मुट्ठी अदरक मुँह में डाल दिया। और बस फिर जो गत बनी बंदर मियाँ की वो आप सब समझ सकते हैं। तब से बंदर जी ने तौबा कर ली कि वो अदरक नहीं खायेंगे और सब से जंगल में कहते फिरे कि अदरक बडा बेस्वाद है और जंगल में अन्य जानवर एक दूसरे से " बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद" ।
एक बंदर था। जंगल में रहता था। एक बार जंगल में एक पार्टी थी। वहाँ सभी जानवर आये हुये थे। पार्टी सियार के घर थी। सब ने छक कर खाना खाया। बंदर ने भी खाया। खाने-पीने के बाद सियार ने सबको सौंफ़ के बदले अदरक के छोटे छोटे टुकडे काट कर, उसमें नींबू और नमक लगा कर सबको दिया। सब ने एक-एक टुकडा उठाया और सब की देखा देखी बंदर ने भी। उसने पहले कभी अदरक खाया नहीं था। उसे बहुत पसंद आया अदरक का स्वाद। मगर और ले नहीं सकता था क्योंकि किसी ने भी एक-दो टुकडों से ज़्यादा लिया नहीं था । अदरक का स्वाद मुँह में लिये बंदर जी घर आये और आते समय बाज़ार से ढेरों अदरक ले आये। अदरक को ठीक उसी तरह छोटे छोटे टुकडों में काटा और नींबू और नमक लगाया। मगर इस बार उन्होंने जी भर के मुट्ठी पर मुट्ठी अदरक मुँह में डाल दिया। और बस फिर जो गत बनी बंदर मियाँ की वो आप सब समझ सकते हैं। तब से बंदर जी ने तौबा कर ली कि वो अदरक नहीं खायेंगे और सब से जंगल में कहते फिरे कि अदरक बडा बेस्वाद है और जंगल में अन्य जानवर एक दूसरे से " बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद" ।
Subscribe to:
Posts (Atom)