मानसी

कुछ दिल से...

Friday, September 29, 2006

हज़ार क़िस्से सुना रहे हो...

हज़ार क़िस्से सुना रहे हो
कहो भी अब जो छुपा रहे हो


ये आज किस से मिल आये हो तुम
जो नाज़ मेरे उठा रहे हो


जो दिल ने चाहा वो कब हुआ है
फ़ज़ूल सपने सजा रहे हो


सयाना अब हो गया है बेटा
उमीद किस से लगा रहे हो


तुम्हारे संग जो लिपट के रोया
उसी से अब जी चुरा रहे हो

मेरी लकीरें बदल गई हैं
ये हाथ किस से मिला रहे हो


ज़रूर कुछ ग़म है आज तुम को
खु़दा के घर से जो आ रहे हो

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