कुछ दिनों पहले एक हिन्दी सिनेमा देखा- डोर। सउदी अरब के कठिन क़ानून का ज़िक्र है उस फ़िल्म में। सउदी अरब दिखाया होगा क्या सोच रही थी मैं। इंतज़ार में ही बैठी रही मगर सिर्फ़ रेगिस्तान ही दिखाया गया है उस फ़िल्मे में सउदी के नाम से। मैं खुद रह चुकी हूँ सउदी में। शादी होने के बाद कोई चार साल वहीं रही, पति के साथ। शादी हो जाने के बाद कई रिश्तेदार ऐसे थे जिन्होंने मेरे पिताजी से कहा कि ऐसी जगह कैसे भेज रहे हैं वो लड़की को, बड़ी ही ख़तरनाक जगह है। मालूम नहीं था क्यों खतरनाक कहा होगा उन्होंने। मैं शादी के बाद तीन महीने तक भारत में ही रही, तब फ़ोन पर पतिदेव से बातें होती तो याद नहीं कि कभी पूछा हो कि क्या खतरनाक जगह है साउदी? शादी के बाद, सउदी पहुँची। बेहद गर्मी थी उस दिन, जुलाई का महीना। पतिदेव ने बताया कि यहाँ हर महिला को अभया (बुरखा) पहनना पड़ता है। चेहरा ढकने की ज़रूरत नहीं होगी मुझे क्योंकि मैं मुसलिम नहीं। पर अभया तो पहनना ही होगा। तो मेरी साउदी की पहली शापिंग थी एक अभया। मैंने एक अभया की दुकान से अपना अभया खरीदा, कढ़ाई से सज्जित। पूर्वी प्रांत का छोटा सा शहर - अलखोबर के एक अपार्ट्मेंट में रहते थे हम। बहुत सुंदर शहर। मुझे याद है सड़कों के बीच बगीचे बने थे जहाँ उस भीषण गर्मी में भी फूल खिले होते थे और जापानी हरी घास लगी होती थी। ऐसा सुना था कि बाँग्लादेश से मिट्टी ला कर बाग़बानी की जाती है वहाँ। धीरे धीरे सउदी के नियमों से वाक़िफ़ होने लगी मैं। औरतें गाड़ी नहीं चला सकतीं, पति या पिता की साथ ही कहीं जा सकती हैं (अब बदलाव आ गया है सुना है), औरतें अगर डाक्टर/नर्स या टीचर ना हों तो काम भी नहीं कर सकतीं। मगर मेरी ख़ुशक़िस्मती कि मैं टीचर थी। पर मुझे किसी चीज़ की कमी कभी खली नहीं। गाड़ी चलाने की ख़ास ज़रूरत नहीं पड़ी कभी। सुबह स्कूल बस घर के सामने आ कर मुझे स्कूल ले जाती, दोपहर को छोड़ जाती। कहीं बाहर जाना होता तो पति के साथ निकलती और वो ही गाड़ी चलाते थे। कभी कभी वहाँ महिलाओं के लिये बने ख़ास माल में जाती। सउदी महिलायें वहाँ बिना बुरखे के शापिंग करती हुई दिखती। उन माल के क्या कहने। उस देश की संपन्नता हर गली कूचे में झलकती है। यहाँ क्रिसमस के वक्त जिस तरह माल और रास्ते सजाये जाते हैं, सउदी में बारह महीने ही शहर ऐसे सजे होते हैं। सुना था कि वहाँ एक मर्द को चार बीवियाँ रखने का अधिकार है, तो वैसा देखा भी। मगर जैसा सब जानते हैं कि हर कोई चार शादी करता है, ये सच नहीं है। मैंने एक से ज़्यादा शादी वाले परिवार बहुत कम देखे। संभ्रांत परिवारों में एक ही शादी करने की प्रथा है। वहाँ क़ानून इतने कड़े हैं वहाँ कि कोई चोरी या ग़ैरकानूनी काम करने से पहले हज़ार बार सोचे। पर फिर भी ग़ैरक़ानूनी काम होते हैं वहाँ। बहुत ज़्यादा कड़े नियमों के बीच रहे इंसान तो बाग़ी हो जाता है। हर प्रवासी को कुछ बातों का ख़याल करना होता है वहाँ। कुछ ऐसे क़ानून लागु हैं वहाँ जिस का कोई भी धर्मनिरपेक्ष समाज समर्थन नहीं करेगा। आपको अपने धर्म का प्रचार करने या खुलेआम प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं है। ऐसे व्यक्ति को देशनिकाला हो सकता है। इस्लाम के ख़िलाफ़ किसी को बात करते पाया गया तो उसे बहुत कड़ी सज़ा हो सकती है...आदि। सुना है कि पहले अपने घर में भी अपने धर्म का निर्वाह करने की मनाही थी, मगर अब ऐसा नहीं है। मद्यपान, सूअर का माँस आदि निषेध है वहाँ। सिर्फ़ यही नहीं आपको वहाँ कोई सिनेमाहाल नहीं मिलेगा। डी.वी.डी और वी.डी.ओ की दुकानें मिल जायेंगी। यानि सिनेमा देखिये पर सिनेमा हाल में नहीं। अलखोबर से ४० कि.मी. दूर , पुल के पार, बस आधे घंटे की दूरी पर है बाहरेन जहाँ ऐसा कुछ भी निषेध नहीं। साउदी महिलायें पुल के उस पार उतरते ही पति से गाड़ी ले लेती हैं और पति पीछे की सीट पर बैठ जाते हैं। साउदी में रह रहे हिन्दू, बाहरेन के मंदिरों में जाते हैं। दूसरे देशों जैसी स्वतंत्रता तो नहीं है इस देश में मगर भारतीयों का अपना समाज है वहाँ जो अपने में मस्त रहते हैं। किसी भी अन्य गल्फ़ देश की तरह यहाँ भी तनख़्वाह बिना किसी शुल्क के दी जाती है। सबसे अच्छी बात (महिलाओं के लिये) कि लोग सोना आलू-प्याज़ की तरह ख़रीदते हैं (ह्म्म...अतिशयोक्ति है शायद पर सच, हर किसी मौक़े पर सोना ही ख़रीदा जाता है चाहे ख़ुद के लिये या किसी को देने के लिये)। इतने बंधनों के बावजूद मुझे सउदी की यादें बड़ी ख़ूबसूरत दुनिया में ले जाती हैं। अब सोचती हूँ अगर आज फिर मौक़ा मिले मुझे वहां जा कर रहने का, तो क्या मैं रहूँगी? शायद अब उन बंधनों में बँध कर न रह पाऊँ। या क्या पता....3 Comments:
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11:04 PM,
अनूप शुक्ला said…
ये अनुभव पड़ना बड़ा अच्छा लगा! फोटो लगाना तो सीख चुकी हो तुम! उस अभया का अपना फोटो लगाऒ न! लेख की सहजता और ईमानदारी से अनुभव बयानी खास बात लगी और अच्छी भी!
At
7:38 AM,
संजय बेंगाणी said…
ऐसी जगह के लिए आप कहाँ रही है,"मालूम नहीं था क्यों खतरनाक कहा होगा उन्होंने" !!!
At
2:17 PM,
उडन तश्तरी said…
अच्छी अनुभव यात्रा करवाई. धन्यवाद. :)
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