ग़ज़ल
कहने को तो वो मुझे अपनी निशानी दे गया
मुझसे लेकर मुझको ही मेरी कहानी दे गया
जिसको अपना मान कर रोयें कोई पहलू नहीं
वैसे तो सारा जहाँ दामन ज़ुबानी दे गया
घर में मेरे उस ज़ईफ़ के लिये कमरा नहीं
वो जो इस घर के लिये सारी जवानी दे गया
आदमी को आदमी से जब भी लड़ना था कभी
वो ख़ुदा के नाम का क़िस्सा बयानी दे गया
उस के जाने पर भला रोयें कभी क्यों जो मुझे
ज़िन्दगी भर के लिये यादें सुहानी दे गया
जावेद अख़्तर साहब की लिखी गयी ग़ज़ल की ज़मीन को चुना है मैंने अपनी इस ग़ज़ल को कहने के लिये।
जावेद साहब की ग़ज़ल का मत्ला कुछ यूँ है:
" जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया
उम्र भर दोहराउंगा ऐसी कहानी दे गया"
मुझसे लेकर मुझको ही मेरी कहानी दे गया
जिसको अपना मान कर रोयें कोई पहलू नहीं
वैसे तो सारा जहाँ दामन ज़ुबानी दे गया
घर में मेरे उस ज़ईफ़ के लिये कमरा नहीं
वो जो इस घर के लिये सारी जवानी दे गया
आदमी को आदमी से जब भी लड़ना था कभी
वो ख़ुदा के नाम का क़िस्सा बयानी दे गया
उस के जाने पर भला रोयें कभी क्यों जो मुझे
ज़िन्दगी भर के लिये यादें सुहानी दे गया
जावेद अख़्तर साहब की लिखी गयी ग़ज़ल की ज़मीन को चुना है मैंने अपनी इस ग़ज़ल को कहने के लिये।
जावेद साहब की ग़ज़ल का मत्ला कुछ यूँ है:
" जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया
उम्र भर दोहराउंगा ऐसी कहानी दे गया"
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