मानसी

कुछ दिल से...

Wednesday, May 24, 2006

ग़ज़ल

कहने को तो वो मुझे अपनी निशानी दे गया
मुझसे लेकर मुझको ही मेरी कहानी दे गया

जिसको अपना मान कर रोयें कोई पहलू नहीं

वैसे तो सारा जहाँ दामन ज़ुबानी दे गया

घर में मेरे उस ज़ईफ़ के लिये कमरा नहीं

वो जो इस घर के लिये सारी जवानी दे गया

आदमी को आदमी से जब भी लड़ना था कभी

वो ख़ुदा के नाम का क़िस्सा बयानी दे गया

उस के जाने पर भला रोयें कभी क्यों जो मुझे

ज़िन्दगी भर के लिये यादें सुहानी दे गया


जावेद अख़्तर साहब की लिखी गयी ग़ज़ल की ज़मीन को चुना है मैंने अपनी इस ग़ज़ल को कहने के लिये।

जावेद साहब की ग़ज़ल का मत्ला कुछ यूँ है:

" जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया
उम्र भर दोहराउंगा ऐसी कहानी दे गया"

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Wednesday, May 17, 2006

फ़र्क

ज़मीन आसमान का फ़र्क

टोरांटो का सी.एन. टावर (553 मीटर की ऊँचाई)

टोरांटो का सी.एन. टावर( टावर के अंदर, शीशे के फ़र्श से दिखती धरती)
समय समय का फ़र्क़

ठंड में खींची थी ये तस्वीर (बर्फ़ से ढकी सूखी टहनियों का जाल)बसंत में नये कोपलों के साथ उन्हीं टहनियों का रूप

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Tuesday, May 09, 2006

कुछ अपने मन की

अब घर पर रहने की आदत होने लगी है। जब शुरु में नया नया घर पर रहना शुरु हुआ था, तब सारा दिन खिड़की से बादलों और पहाड़ों को निहारते हुये गुज़र जाता था। जन्मों की इच्छा कि घर पर आराम करूँ पूरी हो रही थी। फिर कुछ महीनों बाद बड़ी बोरियत होने लगी। कम्प्यूटर और टी.वी. के सामने बैठना भी समय बर्बाद ही लगने लगा। तो यहाँ नौकरी की कोशिश करनी शुरु की। मगर सिर्फ़ पार्ट टाइम ही कुछ मिल पाया। मैंने इन लोगों को माफ़ कर दिया ये सोच कर कि इन्हें नहीं पता मुझे नौकरी न देकर यहाँ, इन्होंने क्या खोया है। मेरे पास आंटेरियो में पढाने का लाइसेंस है, यहाँ का नहीं, तो उसे हासिल करने में कुछ महीनों से एक साल भी लग सकते हैं। अजीब प्रथा है इस देश की, हर प्रदेश में पढ़ाने का अलग से लाइसेंस लेना पड़ता है। तो अब तो आदत पड़ने लगी है घर में रहने की। पहले सप्ताहांतों का इंतज़ार घर पर रह कर आराम करने के लिये रहता था, अब बाहर घूमने जाने के लिये रहता है। पिछले शनिवार को ज़ाकिर हुसैन का प्रोग्राम देखने गयी। बहुत सालों बाद संगीत में सचमुच खो जाना हुआ। उस्ताद सुल्तान खां की सारंगी और साथ उ. ज़ाकिर हुसैन का तबला। बाद में निलाद्री कुमार का सितार मन को किसी और ही दुनिया में ले गया। अभी यहाँ प. जसराज के शिष्य, हेमंग मेहता आये हुये हैं। सोचा इसी बहाने कुछ संगीत साधना की जाये। वो एक महीने यहाँ रहेंगे और हर सप्ताह संगीत की क्लास लेंगे। देखते हैं। जाने की इच्छा तो बहुत है उनके क्लास में। ९ महीने होने को आये इस शहर में। प्राकृतिक दृश्यों ने मन मोह रखा है। आजकल सड़क से गुज़रती हर गाड़ी फूलों से सजी शादी की गाड़ी लगती है। सड़क के किनारे खड़ी हर गाड़ी पर फूलों की पँखुड़ियाँ गिरी होती हैं। मगर उस पुराने शहर के लिये अभी भी मन उदास हो जाता है कभी कभी। कोई एक महीने पहले वहाँ भी हो कर आये। हर उस जगह जहाँ हम जाया करते थे, घूम कर आये। वो फ़ूड कोर्ट, वो दुकानें, वो सड़कें...सब इतनी अपनी लगीं। ख़ैर..यही ज़िन्दगी है, जो रुकती नहीं और हम पुरानी खुशनुमा यादों को कभी कभी याद कर लेते हैं और आगे चलते जाते हैं। आगे की मंज़िल कहाँ होगी कौन जाने...

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Wednesday, May 03, 2006

कुछ यूँ ही

आज अचानक, एक ग्यारहवीं के छात्र को पढ़ाते हुए अपनी पुरानी किताब निकालनी पड़ी। उस किताब के पन्नों पर कहीं स्याही से तो कहीं पेन्सिल से लिखे हुये 'रेफ़र पेज १०१' या 'उदाहरणार्थ आदि आदि' देख कर पुराने दिन याद आ गये। क्या मैंने ही की थी वो सारी पढ़ाई? मेरी एक सहेली की कोशिश रहती थी कि उसकी किताबें नई जैसी ही रहें। और आज भी उसका कहना है कि उसने अपनी किताबें इतनी अच्छी तरह से रखी हैं कि वो उन किताबों को नया कह कर फिर से दुकानों में बेच सकती है। मुझे हैरानी होती है। हाँ, स्याही से लिखना शायद अच्छा नहीं मगर पेन्सिल से नोट्स लिखना किताबों पर क्या ग़लत है?। आज कुछ अलग से पन्ने भी क्लिप किये हुये मिले उस किताब में जहाँ कुछ डेरिवेशन आदि किये हुये थे। कभी-कभी दिल चाहता है विद्यार्थी जीवन में लौट जायें। जबकि उस वक्त ज्योतिष की किताबें उन मोटी पुस्तकों के पीछे रख कर पढ़ती थी। मेरे ख़याल से इंसान का स्वभाव होता है, जिस काम को ज़बरदस्ती करवाया जाये (स्कूल में पढाई ज़बरदस्ती लगती थी कई बार) इंसान उससे और मुँह मोड़ता है। ये उदाहरण यहाँ सही नहीं बैठेगा शायद पर ख़्यालों के इस बहाव में ये याद आ गया कि साउदी अरब में बहुत सख़्त नियम हैं मगर लोगों के उन नियमों का उल्लंघन करने के नये नये तरीक़ों को सुन कर लगता था कि ज़्यादा बंधन से इंसान और दु:स्साहसी बनता है और दबी हुई इच्छाओं को करने की प्रवृत्ति और ज़ोर पकड़ती है। मगर १६-१७ साल की कच्ची उम्र में समझ उतनी नहीं होती (ज़्यादातर बच्चों को) कि सपनों और यथार्थ में फ़र्क कर सकें। खेल और पढ़ाई में खेल ही ज़्यादा भाता है। भारतीय मां-बाप अपने बच्चों पर पढ़ाई के लिये ज़ोर देते हैं (कई बार अति कर जाते हैं ये मांबाप, जो पता नहीं कितना सही है) और आगे चल कर वो काम आता है। विदेशों में एक बड़ी संख्या में बच्चे हाईस्कूल के बाद ही किसी दुकान पर काम करने लग जाते हैं और हमेशा के लिये पढ़ाई से छुट्टी। और ज़बरदस्ती करने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता है। जबकि कुछ ही बच्चे अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर, अपने मनानुसार किसी विषय में आगे की पढ़ाई कर बहुत आगे भी निकल जाते हैं। आज उस बच्चे को पढ़ाते समय यही लगा कि जाने ये बच्चा कितनी दूर जायेगा, और आज मैं भारतीय मां-बाप, भारतीय संस्कारों के बीच न पली होती तो क्या कर रही होती? शायद यही जो आज हूँ या शायद...क्या पता...