Tuesday, August 29, 2006

'नहीं' के आगे...

मेरे 'नहीं' के आगे लिखने से पहले बहुत लोगों ने बहुत कुछ लिखा। विदेश में रहने वाले प्रवासी भारतीयों को मेरी बात सही लगी होगी। 'नहीं' क्यों कहा मैंने। क्या सच चमक-दमक नहीं है यहाँ? है तो..पर क्या ये 'चमक-दमक' ही रोक कर रख लेती है हमें ? देश के प्रति गद्दारी का दोष लगाने वाले भारत में रह रहे भारतीय, प्रवासी भारतीयों को कहीं एक अलग नज़र से देखते हैं। जहाँ अजीब मानसिकता के चलते भारत में रह रहे भारतीय का अपने किसी संबंधी के विदेश में रहने से मान ऊँचा होता है वहीं दूसरे लोगों का शायद ईर्ष्या का कारण। और इसकी एक वजह शायद ये सोच कि विदेश में डालर या पैसा ज़्यादा कमाया जाता है। सच भी है, अगर तुलना की जाये तो यहाँ से भारत का उपार्जन कम लगता है, मगर यहाँ के खर्चे और हर चीज़ का मूल्य आदि की तुलना की जाये तो बात वही हो जाती है, हाँ, मगर यहाँ बेहतर होता है जीवन...जीवन नहीं, जीवन जीने के लिये जो कठिन राह पर से हो कर हम यहाँ चलते हैं, कहीं जा कर लगता है कि सफ़ल हो गया वो परिश्रम। जिस तरह हर अंधेरी सुरंग के अंत में प्रकाश होता है, ठीक वैसे ही।

सुविधायें...सिर्फ़ सुविधायें कह देने से ऐसा लगता है जैसे किसी ने मुफ़्त में, दया कर के हमें भीख दे दी हो और हम उस भीख के आदी हो गये हैं। मगर अजीब बात ये है कि ये ही सुविधायें क्या भारत में उपलब्ध नहीं हो सकतीं? मुझे आबादी और सड़क की भीड़ से कोई परेशानी नहीं है, ए.सी. न हो तो पंखे से काम आसानी से चल जाता है, उसी तरह तो बड़े हुये हैं साहब। खाना पीना तो भारत में ज़्यादा अच्छा मिलता है, फिर ?

कुछ उदाहरण देना चाहूँगी। दो साल पहले एक दुर्घटना में मेरा घुटना बुरी तरह टूट गया था। शल्य-क्रिया के बाद एक महीने तक काम पर नहीं जा पायी। नौकरी छोड़ना नहीं चाहती थी इसलिये बैसाखियों के साथ ही काम पर गई। मगर काम पर ले कौन जाये? पति की अपनी नौकरी थी। यहाँ के ट्रांसपोर्ट कंपनी को फ़ोन किया। पता चला कि वो आम बस टिकट के भाड़े पर ही टैक्सी भेजेंगे और वो टैक्सी मुझे घर से काम, काम से घर यहाँ तक कि अस्पताल फ़ीज़िओथेरापी के लिये भी ले जाया करेगा। इस तरह मैंने‍ छ: महीने ट्रांस-व्हील (ऐसी सरविस का यही नाम है यहाँ) की मदद ली। हमारी पूरी चिकित्सा, शल्य-क्रिया आदि के लिये एक पैसा भी नहीं लगा, ये देश की 'सुविधा' ने ही उपलब्ध कराया। हाँ, ये और बात है कि देश होता तो शायद मैं ज़्यादा दिन की छुट्टी ले पाती, घर में नौकर चाकर होते तो कोई काम खु़द नहीं करना पड़ता आदि आदि...मगर क्योंकि यहाँ ऐसा हो पाना मुश्किल है तो हमें ये 'सुविधा' उपलब्ध कराई जाती है। जब मैं घर से निकल नहीं पाती थी तब भी सारा काम सिर्फ़ एक फ़ोन काल की दूरी पर था। चाहे बिल भरना हो या बैक का कोई काम हो...ये सब चीज़ें अब शायद भारत में भी होने लगी हों और अगर नहीं तो होनी चाहिये। देश में ऐसी क्या कमी है कि ये सब 'सुविधायें' वहाँ नहीं उपलब्ध करायीं जा सकतीं?

चलिये ट्रैफ़िक की बाते करें। क़तारों मॆं अपनी लेन में चलती गाडियों को देख कर अपने देश की ट्रैफ़िक की याद आती है। इस बार जा कर देखा कि कलकत्ता में नई सड़कें बनी हैं। कुछ चीज़ें ऐसी देखीं जो कभी नहीं देखीं थी। हर सड़क को लेनों में बाँटती हुई सफ़ेद लकीर पर लगे हुये थे जलती बुझती लाल बत्तियाँ। वाह! लगा देश ने सच तरक्की की है और फिर देखा तीन लेन की सड़क पर गाड़ियों की चार क़तारें। कोई भी गाड़ी कहीं से भी जा रही है और ट्रैफ़िक के नियमों का कोई पालन नहीं। ये अनुशासनहीनता क्यों? क्या करना चाहिये कि ये अनुशासन लागु हो पाये? क्यों नहीं हो पाते नियमों के होते हुये भी ये नियम लागु? कहाँ है कमी? इतने पुराने ढर्रे को बदलना मुश्किल है...मगर कहीं तो कुछ हो बदलाव। सुंदर 'माल' बने हैं देश में। साफ़ और चमकीले। मुझे आशा है कि ये नये 'माल' पुराने होने पर भी यूँही बने रहेंगे। सरकारी दफ़्तर की शिकायत नहीं करना चाहती। वैसे शिकायत ही किये जा रही हूँ। घंटों लाइन में खड़े रह कर भी, कोई जान-पहचान वाला आगे जाकर अपना काम करवा जाता है। हम रह जाते हैं पीछे और फिर काउंटर पर उन अधिकारियों के विरक्त चेहरे से निपटना।

चलिये, अगर इन सब चीज़ों को नज़र अंदाज़ कर दिया जाये, क्योंकि जहाँ रहते हैं वहाँ के सिस्टम की आदत हो ही जाती है तो फिर क्या ज़रूरी वजह है वो कि हम नहीं लौट पाते अपने देश? हम यहाँ आ कर बड़ी मेहनत से, कठिन राह पर से हो कर गुज़रते हैं। उस राह पर चलते हुये कुछ सपने देखने लगते है। एक तरह से बडे़ होते हैं हम यहाँ फिर से, और फिर जब वो सपने पूरे होने लगते हैं तो हम उन्हें छोड़ कर कहाँ जायें, ये एक नया बसेरा होता है हमारे लिये। अपने बच्चों की दुनिया यही हो जाती है और फिर उसे उजाड़ना भी संभव नहीं होता। हाँ, अपने देश के लिये करने की चाह को जो ईमानदारी से चाहे वो ज़रूर पूरा कर सकता है। भारत में ज़रूरतमंदों को, किसी स्कूल को या किसी संस्था को डोनेशन दिया जा सकता है और दिया जाता है। सुनामी या किसी और विपदा के समय या यूँ भी, एन.आर.आई. बड़ी संख्या में सहायता करने की कोशिश करते हैं। क्या इस से इंकार है किसी को? हाँ अगर ये कहा जाये कि विदेश में रह कर हम भारत के लिये शारीरिक रूप से वो नहीं कर पाते जो हम वहाँ रह कर कर पाते तो क्या वहाँ रह रहे हमारे भाई कुछ कर पा रहे हैं? जो शहर आ गये वो अपने गाँव को भूल गये। जिनमें ताक़त है वो और पैसे बनाने में लगे हैं। कालेज के दिनों में माइग्रेशन सर्टिफ़िकेट के लिये ५० रुपये का घूस क्यों नहीं भूलता मुझे आज भी? नहीं देती ५० रुपये तो ऐड्मिशन रुक जाता, और किस से करें इस बात की शिकायत? कैसे बदलें हम व्यवस्था वहाँ की?

ये सब कहने के बाद भी देश के लिये प्यार कब कम होता है? जैसा कि कहते हैं, दिल है हिन्दुस्तानी। देश हमारा है, अगर कोई तीसरा कुछ कहता है तो फिर प्रतिवाद करने से भी नहीं चूकते हम। पता नहीं, हम एन.आर.आई की यही अजीब स्थिति होती है, न यहाँ के हो पाते हैं दिल से पूरे न शरीर से वहाँ के...वैसे आज जो ये विचार हैं मेरे क्या समय के साथ ऐसे ही रहेंगे? आज ही अनूपदा ने इस विषय पर बात करते हुये मुझसे कहा कि समय के साथ हमारी सोच बदल जाती है। आज हम जिसे सही समझते हैं वो शायद कल सही न लगे...क्या पता...चलिये आज यहीं खत्म करती हूँ। अगली बार किसी और विषय पर..

Thursday, August 17, 2006

एक और मंज़िल

आज लगभग दो सप्ताह हो गये इस शहर में आये हुए। बड़े शहर की आपाधापी, सड़कों पर कतारों में चलती गाड़ियाँ और लोगों का हुजूम, जाने किस मंज़िल की तलाश में…टोरोंटॊ…सपनों का शहर…

जिस तरह भारत के मुंबई शहर में लोग सपने पूरे करने आते हैं, कनाडा के इस शहर में भी जाने कितनी दूर दूर से, कितने ही देशों से लोग अपने सपने पूरे करने की चाह लिये आते हैं। उनमें से कई लौट जाते हैं वापस अपने देश और कई बस जाते हैं, हो कर रह जाते हैं इस देश के, इस शहर के। हम भी अब शायद हो कर रह गये हैं इस शहर के।

अपना देश छोड़ते वक्त उतना दुख नहीं होता जितना वहाँ अपने लोगों से मिलने जा कर, वापस आने के वक्त होता है, मगर एक पराया देश भी अपना बन जाता है, कैसे समझ ही नहीं आता। “होम स्वीट होम” अब यही लगने लगता है। बेहद मेहन्त की कमाई से मार्टगेज पर ‘अपना’ घर खरीदने का आनंद, ‘होम ओनर’ कहलाने की खुशी यहाँ जैसे कुछ नयी सी ही लगती है।

धनाड्य तोंदधारी, सिल्क रोब पहने हुए, बगीचे में अपने कुतों को घुमाते हुये सिर्फ़ सिनेमाओं में ही दिखते हैं। रोज़ सुबह की भीड़ के साथ ‘सबवे’ में सफ़र बिल्कुल मुंबई के लोकल ट्रेन जैसे ही, उसी एक उद्देश्य के साथ, पैसा कमाने और कुछ सपने पूरे करने की चाह में…फ़र्क़ कहाँ है? रोज़ आठ या उससे ज़्यादा घंटों की कड़ी मेहनत, किसी भी वक्त ज़रा सी भूल चूक से या काम की कमी की वजह से नौकरी जाने का भय, और दिन के आखिर में बैंक में पैसे कितने जमा हुये, सारे महीने में दो लोगों की कमाई से कितना बचाया जा सकता है का हिसाब…जब सब कुछ एक जैसा ही है, या शायद कहीं उससे ज़्यादा, वही दौड़-धूप, वही उद्देश्य तो हम लौट क्यों नहीं जाते अपने देश? क्यों बन जाता है ये पराया देश ज़्यादा अपना?

हमारे दिल में अपने देश, अपने लोगों के लिये प्यार, अपनी मिट्टी की सोंधी खुश्बू अभी भी उतनी ही ताज़ा होती है। टी.वी. पर ऊलजलूल हिन्दी गाने भी बस इसलिये ‘आन’ छोड़ देना कि हिन्दी सुन पा रहे हैं, अपने बच्चों को हर रविवार हिन्दी सीखने हिन्दी की क्लास में भेजना, भारतीय स्वतंत्रता दिवस के दिन अपने घर के आगे या गाड़ी में अपने देश का झंडा लहरा कर घूमना, किसी ‘माल’ में किसी साड़ी पहने हुए वयस्का महिला को देख कर अपनी मां की याद आ जाना, कब बदला है। इतना सब होते हुये भी, देश से इतना लगाव होते हुये भी, क्यों नहीं लौट जाते हम अपने देश? क्या दिया है इस पराये देश ने हमें कि हम यहाँ रह जाते हैं। क्या तथाकथित ‘चमक-दमक’ ही रोक कर रख लेती है हमें यहाँ?

नहीं…

इस ‘नहीं’ पर ही इस पोस्ट को समाप्त कर रही हूँ। अगली बार ‘नहीं’ के आगे…

(आपके इस विषय पर राय का खुले दिल से स्वागत है)