गर्मी की छुट्टियाँ शुरु हुईं और खत्म भी होने लगीं। दो महीने की छुट्टी में एक मही्ना तो कोर्स करने में चला गया। अगस्त में यूरोप के कुछ देशों की सैर को निकल पड़े हम। एस.ओ.टी.सी., जो कि एक भारतीय टूर कंपनी है, विदेश में रह रहे भारतीयों के लिये भी सैर का प्रबंध करती है। सैर या टूर शुरु हो रहा था लंडन से पर हम ने उसे ब्रसल्स से लिया। यानि कि हमारा पहला पड़ाव था ब्रसल्स, बेल्जियम की राजधानी। यूरोप में अपनी चीज़ें सम्हाल के रखने की लोगों की हिदायतें हमें कंठस्थ हो चुकी थीं। ज़रा सा चूके नहीं कि सामान ग़ायब। जैसा सुना था वैसा बुरा अनुभव रहा नहीं वैसे।
ब्रसल्स, एक सुंदर छोटा सा यूरोपीय शहर। मेरे सास-ससुर हमें आकर यहीं मिले और हम ने एक साथ अपनी यात्रा शुरु की। ब्रसल्स में लोगों का व्यवहार कुछ रूखा ही लगा। यहाँ (कनाडा में) रास्ते में चलते हुये भी लोगों को देख कर मुस्कराने की जैसे आदत सी हो गयी है, मगर ब्रसल्स में हमारा अनुभव कुछ बहुत अच्छा नहीं रहा। ख़ैर, टूर के पहुँचने के एक दिन पहले ही हम पहुँच गये थे तो ब्रसल्स को अपनी तरह से एक्सप्लोर करने का मौक़ा हमें मिला। ब्रसल्स बेल्जियम की राजधानी है और यहाँ फ़्रेन्च और फ़्लेमिश बोली जाती है। यहाँ हर जगह से लोग आ कर बसे है और इसलिये आपको रास्ते में हर तरह के लोग दिखेंगे। पुराना शहर है ब्रसल्स। यहाँ घूमने आ रहे लोगों को अगर फ़्रेंच न आती हो तो काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। यहाँ अंग्रेज़ी बहुत कम समझते हैं लोग।
कुछ तस्वीरें यहाँ के दर्शनीय स्थानों की-

यहाँ का प्रसिद्ध ग्रैंड प्लेस, ब्रसल्स के मध्यकाल का मार्केट स्क्वैर में स्थित, सिटी हाल के सामने।
ऐटोमियम- हेसेल पार्क में बनाया गया १९५८ के विश्व मेले के दौरान लोहे के अणु को १५० करोड़ बार बड़ा कर के दिखाया गया है। इसमें आप अंदर जा कर सबसे ऊपर की मंज़िल (गोलाकार) पर जा सकते हैं और पूरा ब्रसल्स शहर देख सकते हैं।
अगला पड़ाव- अम्सटर्डाम
मुझे याद है, पिछले साल जब मैंने वैक्यूवर से अपनी बेरोज़गारी के आलम में शिकायत की थी, कि मैं सारे दिन सिर्फ़ खिड़की से बादलों को देख कर बोर चुकी हूँ, पता नहीं नौकरी कब लगेगी और मैं कब फिर बिज़ी हो पाऊँगी, तो कई बलागरों कहा था कि बाद में नौकरी मिलने पर जब वक्त नहीं मिलेगा आराम के लिये, तब मैं पछताऊँगी कि वो ज़माना कितना सुंदर था। पिछले सप्ताह मेरा कोर्स ख़त्म हुआ। उसके एक महीने पहले मेरी स्कूल की छुट्टियाँ तो शुरु हो चुकी थीं मगर अगले ही दिन ये कोर्स शुरु हो गया था। एक घंटे की रोज़ सुबह की ड्राइव ही थका देती थी। और फिर घर आते आते ३-३:३० हो ही जाते थे। तो एक महीने बाद आख़िरकार ये कोर्स खत्म हुआ और शुरु हुई मेरी असली छुट्टियाँ। बिल्कुल बचपन में जैसे गर्मी की छुट्टियाँ आने पर ख़ुशी होती थी, वही फिर महसूस हो रहा था। मुझे लगता है, किसी साइकोलोजी के चलते, पढ़ाई के खत्म होने की छुट्टियाँ ज़्यादा मीठी होती हैं, किसी भी और छुट्टी से। तीन दिन से घर पर आराम हो रहा है, पूरा आराम। दो दिन बाद घूमने जा रही हूँ, १५ दिन के लिये, जो घर में बैठने जैसा छुट्टी का मज़ा नहीं दे सकता। मेरी कलीग कहती है कि वो गर्मी की छुट्टियों में कहीं नहीं जाती, सिर्फ़ घर में अपने परिवार के साथ वक्त बिताती है। इसी में उसे असली छुट्टी का मज़ा मिलता है। पर एक बात कह सकती हूँ मैं, कि छुट्टी का अलग मज़ा है, बेशक़, मगर जब लंबे समय के लिये एक अन्सर्टेन ख़ाली वक्त से गुज़रना पड़ता है तो वो मज़ा नहीं देता। वो कहानी कितनी सच लगती है जिसमें एक मज़दूर सुख की नींद सोता है मगर धनाढ्य को सब होते हुये भी नींद न आने की बीमारी होती है। सच है, अंधेरे से जो न गुज़रा हो उसे रोशनी के महत्व का क्या पता।