Tuesday, August 26, 2008

कुछ हँसते लम्हे

चल, तुझे लेने आती हूँ और कुछ ही दिन तो हैं बाकी, एक साथ लंच पर चलेंगे, यहीं पास वाले माल में। एक घंटॆ में पहुँचती हूँ।

ग्रीक सुवालाकी अच्छा है पर मुझे तो मेरा इंडियन फ़ूड ही चाहिये।

उफ़! तू पूरी मेरी पति जैसी है, भगवान ने तुम दोनों को एक ही मिट्टी से गढ़ा है।

आज कल जाने लगी हूँ कवि सम्मेलनों में उनके बगैर, पता? पहले ज़रा अजीब लगता था पर अब ठीक है। कभी कभी वो आ जाते हैं।

अरे! ये फ़ाइनन्शियल अड्वाइज़र भी, अपना ही फ़ायदा देखते हैं। हमें हमारे दोस्त ने बताया कि कभी भी उधार लेकर इन्वेस्ट न करो, और ये तो वही कहते हैं।

मेरी बहन स्विट्ज़र्लैंड जा रही है पति के साथ, पर बच्चे का वीसा नहीं हुआ है अभी।

सोचती हूँ साइंटिस्ट का करीयर ही बदल डालूँ, कुछ नया करूँ।

पागल है? इतनी अच्छी नौकरी कोई छोड़ता है?

अरे! उस मेले से आने के बाद जो लड़ाई हुई है मेरी उनसे, मुझे वो चाइनीज़ पेंटिंग पसंद थी, मुझे खरीदने ही नहीं दी। तू कब जा रही है मेले में? इसी सप्ताह खत्म हो रहा है।

रुक मोबाइल देख लूँ , कहीं उनका फ़ोन न आया हो, वरना कहेंगे कि मोबाइल का क्या फ़ायदा, तुम तो उठाती ही नहीं हो।

हाँ, मेरे भी फ़ोन की बैटरी हमेशा डाउन रहती है। मैं भी देख लूँ वरना शाम को वो भी यही कहेंगे...

तेरी तो लव मैरिज है यार, मेरी भले ही अरेन्ज्ड पर आखिर में बात वहीं आ कर ठहरती है, दोनों मोबाइल चेक कर रहे हैं, बार बार...हा हा

हा हा...चल तुझे बास्किन राबिन्स खिलाती हूँ।

(स्कूल खुलने के एक सप्ताह बाकी हैं, बचपन की एक दोस्त से हुई कल की मुलाकात)

साफ़ चमकते फ़र्श और खाली दीवारें। पहचाने कारीडार। जानी पहचानी ज़िंदगी फिर दस्तक दे रही है। बस कुछ दिन और, फिर शुरु होगी वही दौड़, वही सुबह से शाम तक का सफ़र, वही खिलखिलाती हँसी और कई बार प्यार तो कई बार हुँकार की आवाज़। खाली दीवारें सज उठेंगी, कुर्सी मेज़ उनके घसीटे जाने पर कराह उठेंगे, ज़मीं खुद पर फुदकते बच्चों की किलकारियों से चहचहा उठेगी। बस बाक़ी हैं और कुछ दिन सपनों के, देर से उठने के और वो सब कुछ लिख डालने के जो हुआ।

5 comments:

अनुराग said...

दिलचस्प रही......

महेंद्र मिश्रा said...

rochak....likhate rahe . dhanyawad.

अनूप शुक्ल said...

अलग अंदाज की पोस्ट।

पहले तो मैं समझा कि ये किसी नये छंद की कविता है। पढ़ा तो बहुत अच्छा लगा।

कुछ वाक्य पढ़कर मजा बहुत मजा आया।

१.उफ़! तू पूरी मेरी पति जैसी है, भगवान ने तुम दोनों को एक ही मिट्टी से गढ़ा है।
२.तेरी तो लव मैरिज है यार, मेरी भले ही अरेन्ज्ड पर आखिर में बात वहीं आ कर ठहरती है, दोनों मोबाइल चेक कर रहे हैं, बार बार...हा हा।
स्कूल खुलने के दिन आ रहे हैं। हर दिन लगता होगा कि ये दिन लम्बा हो जाये। लेकिन स्कूल के अनुभव भी मजेदार होंगे। उनके बारे में भी लिखना।

३.

RC Mishra said...

लव मैरिज और साइन्टिस्ट..क्या काम्बिनेशन है, अच्छा है कि साइन्टिस्ट कभी भी कैरियर बदल सकता है :)।

Tarun said...

Dilchasp rahi ye MUKKALAAT