Monday, October 13, 2008

तुम्हारे जाने से पहले...


मैंने बातों से बातें कातीं
कई सफ़ेद कपास की बातें
और एक रेशम का धागा जोड़ा
नीला समंदर कातने
छोटी छोटी लहर काढ़ने
और आकाश में उड़ाने पंछी
सूत में रेशमी धागा
कई हज़ार सितारों से जड़ा
महीन मोतियों से गढ़ा
बातें तो सादी थीं
रेशम से उलझ कर
सिरा खो गया कहीं
जो सिरा मिल जाता
पूरा तन ढक जाता
मन छुप जाता
और बातें कात लेतीं
बातों से मन को
पूरा विश्व समा जाता
एक आकृति बन जाती
तुम्हारे जाने से पहले...

4 comments:

रंजना said...

वाह...क्या कहूँ,अद्भुद शब्द शिल्प है......बहुत सुंदर मनमोहक रचना.

neeshoo said...

मानसी जी अतिसुन्दर रचना । बढिया कल्पनाशीलता है । अच्छा लगा

रौशन said...

आज चिटठा चर्चा के माध्यम से आपके ब्लॉग पर आने का मौका मिला तो पाया कि चिटठा चर्चा पर की गई तारीफ़ कम ही होगी
अद्भुत शब्द विन्यास और भाव प्रस्तुति

संगीता पुरी said...

बहुत अच्छा...अद्भुत....बधाई।