Sunday, February 17, 2008
भविष्य
स्टैट्काउंटर बताता है कि मेरे ब्लाग पर सबसे ज़्यादा हिट्स पड़ते हैं गूगल पर 'कुंडली' या 'राशि' सर्च करते हुये। कई बार हँसी आती है कि लोग क्यों इतना जानना चाहते हैं कि क्या होगा भविष्य में उनके। वैसे मेरा सबसे प्रिय विषय है ज्योतिष। एक वक्त था जब ज्योतिष में रमा हुआ था मन। हैरत होती थी जब काफ़ी सारी भविष्यवाणियाँ सही आती थीं। तब लगता, वाह ये तो ग़ज़ब का शास्त्र है। और कई बार कोई कुंडली बिल्कुल भी समझ नहीं आती थी, तो कृष्ना जी (जो हमें सिखाया करते थे) कहते थे, जो तुम्हारे बस का नहीं उसे समझने के लिये अभी और जीवन पड़ा है। मेरा दिमाग़ वैज्ञानिक तर्क़ देता है, क्या ज्योतिष सचमुच काम करता है? मगर हैरत होती है क्रुष्ना जी को भविष्यवाणियाँ करते देख। वो खुद मेकैनिकल इंजीनियर हैं, अपनी कम्पनी है, ज्योतिष शौकिया करते हैं। हज़ारों कैल्कुलेशन करने होते हैं। अपने खाली वक्त में वो ज्योतिष करते हैं और सिखाते हैं। खैर, अब मुझे तो कोई साल भर हो गया, ज्योतिष नहीं करते हुये। मगर फिर भी क्या भूल सकी हूँ मै इसे? हाँ किसी की शादी कब होगी की तारीख निकालने के जो नियम हैं उन्हें प्रैक्टीस के बगैर काफ़ी भूल चुकी हूँ शायद, पता नहीं। इस विषय का रिश्ता रसायन शास्त्र जैसा है मेरे साथ। मेरा रसायन शास्त्र से बरसों का नाता नहीं मगर फिर भी बेन्ज़ीन या कोई भी केमिकल का नाम लेने पर पहले उसका स्ट्रक्चर ध्यान आता है। या फिर पीरियोडिक टेबल कैसे भूल सकती हूँ मैं। बस वैसे ही कोई अगर कह दे कि उसकी नौकरी में समस्या चल रही है या शादी, या कुछ और...दिल करता है उसकी कुंडली देखूँ, देखूँ तो आखिर माजरा क्या है? क्या उसकी कुंडली देख कर ये पता चल सकेगा? मगर फिर लगता है अगर जीवन इसी पर निर्भर है और हमारे हाथ में कुछ नहीं तो फिर पहले से जान कर भी क्या होगा। और अपने हाथ में कुछ नहीं, ऐसा तो मानने को भी दिल पूरी तरह इंकार करता है। ज्योतिष अभी बंद है। कुछ डर सा गया था मन कि पूरी तरह निर्भर तो नहीं हो जायेगा ये इस पर? आजकल कृष्ना जी से सिर्फ़ इधर उधर की बातें होती हैं, ज्योतिष नहीं। उनका इस विषय पर एक बड़ा वर्कशाप है पूना में अगले सप्ताह। सीखने का अच्छा मौका था। शायद कभी फ़ुर्सत में इसे फिर शुरु करूँ...
Friday, February 08, 2008
बर्फ़ बर्फ़ बर्फ़-फ़ील्ड ट्रिप
बच्चों को सुबह फ़ील्ड ट्रिप पर ले कर जाना था। वैसे तो बर्फ़ में बाहर निकलना कोई अच्छा नहीं लगता पर आज बेहद ही खूबसूरत दिन था। सूरज निकला हुआ था और हवा भी नहीं थी। सबसे अच्छे लग रहे थे चहकते हुये बच्चे। हम एक पार्क में गये जहाँ सिर्फ़ बर्फ़, बर्फ़ और बर्फ़ थी और बच्चों ने नाना तरह की गतिविधियों में भाग लिया। उनमें से एक था, बर्फ़ के घर बनाना (इगलू नहीं, क्विन्ज़ी कहते हैं उन्हें)। ये बर्फ़ के घर कुछ ऐसे ही बनते हैं जैसे हम बचपन में रेत की गुफ़ायें बनाया करते थे। पहले ज़मीन पर पडे बर्फ़ को साफ़ कर के उस पर फिर बर्फ़ डाल दिया जाता है। हमें बताया गया कि इस तरह ज़मीन की गरमाहट से नर्म झुरझुरी बर्फ़ सख्त हो जाती है और क्विन्ज़ी बनाना आसान होता है। फिर उसके दक्षिण दिशा में बर्फ़ को खोद कर अंदर जाने के लिये जगह बनाई जाती है। कहते हैं कि दक्षिण दिशा में दरवाज़ा हो तो घर को सूरज की गर्माहट मिलती है। इस बर्फ़ की गुफ़ा के अंदर का तापमान बाहर के तापमान से ५० डिग्री फ़रहन्हाइट ज़्यादा होता है। अक्सर, बर्फ़ीले तूफ़ानों में फँसे लोग ऐसी गुफ़ायें बना कर अपनी जान बचाते हैं। लीजिये इस फ़ील्ड ट्रिप से कुछ तस्वीरें-
Thursday, February 07, 2008
बर्फ़ बर्फ़ बर्फ़
" एन्वायरमेंट कनाडा का कहना है कि शुक्रवार को ३० से.मी. बर्फ़ गिरेगी, बर्फ़ खतरा जारी किया गया है" आदि आदि। दो दिन से यही खबर आ रही थी रेडियो पर, टी. वी पर हर जगह। और सब तो ठीक है बस मुश्किल ये है कि उस दिन शुक्रवार है, अर्थात स्कूल खुले होंगे। हाँ, उस दिन बच्चों के लिये स्कूल बंद है, 'प्रोफ़ेशनल डेवलपमेन्ट डे' है| अर्थात टीचरों की हाज़िरी ज़रूरी है। एक दिन पहले स्कूल में नोटिस ज़ारी हुआ था कि रेडियो टी.वी. ध्यान से सुनें। अगर स्कूल बंद होने की खबर हो तो स्कूल न आये कोई। बस हम सब ने प्रार्थनायें की कि स्कूल बंद हो जायें। इस बर्फ़ में न जाना पड़े। भगवान अपने ज़िद पर अड़े रहे, किसी की न सुनी और सुबह उठ कर एक घंटे टीवी के सामने बैठ कर आशाओं पर हर मिनट बाल्टी भर भर कर पानी फिरता देखा। पता चला कि बर्फ़ तो गिरेगी मगर स्कूल बंद नहीं होने वाले। मैं स्कूल जाने की तैयारी करने लगी। पति ने कहा," आज टैक्सी ले लेना, इस बर्फ़ में गाड़ी मत ले जाना"। टैक्सी कंपनी को फ़ोन किया तो पता चला कि किसी वक्त का वादा नहीं कर सकती आज टैक्सी कंपनियाँ। जब भी मैं तैयार हो जाऊँ, तब ही फोन करूँ। खैर, पति के आदेश का उल्लंघन करने की ठानी, और तैयार होने लगी। पति आफ़िस के लिये रवाना हो चुके थे। उनके लिये आसान है, बस से, ट्रेन से इस मौसम में जाना उतना मुश्किल नहीं होता। मैं निकलने ही वाली थी कि दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। कुछ दिनों से मेरी मुँहबोली बहन मेरे घर पर ही रह रही थी। यहीं से अपने काम पर आ-जा रही थी (वही, बर्फ़ आदि के चलते...उसका आफ़िस मेरे घर से पास है, उसके खुद के घर से)। वो अंदर आई और कहा," मेरे पीछे से किसी ने मेरी कार को क्रैश किया, कार डैमेज नहीं हुई है ज़्यादा, पर मैं वापस आ गई, इट इज़ नाट वर्थ गोइंग टु वर्क टुडे"। मैंने अपने मनोबल को संभाला और कहा, " ह्म्म्म, मैं निकलती हूँ।" उसने कहा,"दीदी मेरी बात सुनो, मत जाओ आज, इट इज़ नाट वर्थ" । दो चार बार ये कहने पर मैंने आखिर फ़ोन कर ही दिया स्कूल। आज बर्फ़ के चलते नहीं आ पाउंगी। स्कूल से बताया गया, नियमानुसार ऐसी हालत में मुझे सबसे पास के स्कूल में हाज़िरी देनी होगी, वरना तन्ख़्वाह कटेगी। सोचा कई बार, कि सबसे पास के स्कूल के लिये निकलूँगी तो अपने ही स्कूल न चली जाउँगी। तो खैर, मैने दिल पर पत्थर रख कर कहा, मैं नहीं आ पाउँगी। घर में बैठ कर पकौड़े खाये, टीवी देखी और अफ़सोस भी करती रही, कि चली जाती स्कूल तो भी शायद उतना बुरा नहीं था, आज ज़रूरी मीटिंग भी थी। बाद में पता चल
ा कि स्कूल की आधी छुट्टी कर दी गयी थी और स्कूल बोर्ड ने बुरे मौसम के चलते तनख़्वाह काटने की नीति को नहीं अपनाया।अगले दिन सब साफ़ था और मैंने राहत की साँस ली कि चलो, अब कुछ दिन तो बर्फ़ नहीं गिरनी चाहिये, १५ दिन का आराम शायद। रविवार रात को फिर टी.वी. पर १० से.मी. बर्फ़ की खबर थी। बस??? १० से.मी. ओह, कुछ भी नहीं। और बुधवार को फिर ३०-४० से.मी. बर्फ़ की खबर, इस बार भी कोई हल्ला नहीं, हम सभी काम पर गये, बर्फ़ में गाडियाँ भी चलीं और किसी ने कोई शिकायत भी नहीं की। मौसम के शुरु में काम के दिन पहली भारी बर्फ़ पर बड़े बड़े किस्से बने, मगर बाद के बदतर मौसम में भी सब सामन्य थे। इंसान की फ़ितरत ही ऐसी होती है। हर चीज़ की आदत हो जाती है। आज फिर भारी बर्फ़ गिरी है। कल बच्चों को लेकर टोबागनिंग, स्कींग आदि के लिये फ़ील्ड ट्रिप ले जा रही हूँ। बर्फ़ न हो तो मज़ा किरकिरा हो जायेगा। सब खुश हैं कि आज जम कर बर्फ़ गिरी है।
दूसरी छवि: सौजन्य: www.570news.com/shows/jeffallan.jsp
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