Monday, April 13, 2009

मूसलाधार बारिश


कल की शाम बड़ी भारी थी
मूसलाधार बारिश में
कहीं बहुत कुछ भीग रहा था
हर पंखुडी़ पर जमा थी कई
पुराने उधडे़ लम्हों की दास्तां
एक छोटा सा लम्हा टपक पड़ा
किसी पंखुड़ी के कोने से
बडा सहेज कर रखा था
मैने उस लम्हें को
छितर गयी वो बूंद आज
कि उस बूंद के पीछे
बूंदों का सिलसिला जो चल पडा
एक रुका हुआ सैलाब
बाँध तोड कर टूट पडा
कि बहुत दिनो बाद बारिश हुई थी
मूसलाधार बारिश.... 


सुनिये- सावन बीतो जाये पिहरवा, मन मोरा घबराये...





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13 comments:

mehek said...

छितर गयी वो बूंद आज
कि उस बूंद के पीछे
बूंदों का सिलसिला जो चल पडा
एक रुका हुआ सैलाब
बाँध तोड कर टूट पडा
badi hi khubsurati se boondo ke sailab ka varnan kiya hai,badhai.

नीरज गोस्वामी said...

बेहतरीन रचना...और साथ में अभूतपूर्व गीत...सोने में सुहागा...वाह...बहुत बहुत आभार आपका...
नीरज

दिगम्बर नासवा said...

कितनी खूबसूरत शुरुआत.........बारिश की बूँद से रची हुयी लाजवाब रचना

संगीता पुरी said...

अच्‍छी लगी आपकी यह रचना ... आभार।

गौतम राजरिशी said...

मूसलाधार बारिश की इस अनोखी भूमिका ने चकित कर दिया...
नेट की गति इतनी मद्धिम है कि आडियो क्लिप चल ही नहीं रहा...
इन पुराने उधडे़ लम्हों की दास्तां में डूबता जाता मन...

creativekona said...

भारतवर्ष में अप्रैल की गर्मी और लू के थपेडों की शुरुआत हो चुकी है ..ऐसे में बारिश की कविता पढना बहुत सुखद लगा .
हेमंत

Reality Bytes said...

बूंदों का सिलसिला जो चल पडा
एक रुका हुआ सैलाब
बाँध तोड कर टूट पडा
कि बहुत दिनो बाद बारिश हुई थी
मूसलाधार बारिश....

JHAROKHA said...

बूंदों का सिलसिला जो चल पडा
एक रुका हुआ सैलाब
बाँध तोड कर टूट पडा
कि बहुत दिनो बाद बारिश हुई थी
मूसलाधार बारिश....

बहुत सुन्दर कविता ...मानसी जी ...भावः भी अच्छे ..
पूनम

neha shefali said...

आंटी,
आपकी कविता पढी ,बहुत अच्छी लगी,.....मैंने अपनी एक नई कहानी झरोखा पर पोस्ट करी है.....आप पढ़ के देखियेगा ...आपकी सजेशन्स की प्रतीक्षा में ..

नेहा शेफाली

abhivyakti said...

मानसी जी,'रेत का तकिया' पर आपकी टिप्पणी का शुक्रिया..आशा करता हूँ कि आप द्वारा की गई हौसला आफजाई हिम्मत बढाएगी...आपने कहानी को पूरे मन से पढ़ा इसलिए भी आभारी हूँ..कहानी के सच अथवा कल्पना होने का निर्णय मैंने पाठक के विवेक पर छोड़ दिया था..पर यह घटना जिस माँ से कई बरस पहले सुनी थी,तब से एक फांस सी मन में चुभ रही थी, कन्या शिशु वध की वीभत्स परम्परा के बारे में तथ्य टुकडो में एकत्र किये गए थे.जिन इलाको में यह आज भी प्रचलित है,उनमे कई गावों में सौ सालो से किसी बेटी की डोली नहीं उठी है..कोई बारात नहीं आई है.आज भी पश्चिमी भारत के कई गावों में दुधमुहे बच्चो के अलग कब्रिस्तान है जिन्हें शम्शानिया,मसानिया,दभालिया या दुध्नाडिया कहते है.... आपकी सुन्दर रचनाओं पर टिप्पणी फिर कभी करूंगा........पी एस

गौतम राजरिशी said...

ब्लौग का नया कलेवर....आहहा

बहुत खूब

ajit.irs62 said...

sunder rachana, prikriti ke karib.

raj said...

Raj

Shabdo me bahut khubsurti se barish ki bundo ko aapne piroya hai.