Friday, June 26, 2009

कुछ यूँ ही


पूरी छाँव किसे मिलती थी। आधी-आधी बाँट कर, कभी उँगली के सिरे से बाँध कर, कभी उछाल कर, लपक कर, खेलते थे उस छाँव से हम तीनों। कभी तो किसी के हिस्से आती ही थी धूप और कभी जो भूले से भी मुझे मिल जाती धूप, तो बढ़ आते थे उनके हिस्से के टुकड़े-टुकड़े छाँव, मेरे हिस्से की धूप को अपनाने । मैं इतराती, मुँह चिढ़ाती धूप को और फिर खुद धूप बन थिरकती। ऐसे ही धूप-छाँव के खेल में एक दिन अपना हिस्सा संग ले मैं चली आई थी बादलों की नगरी में। बादलों के शहज़ादे ने मुझे दी थी एक बड़ी सी छाँव। धूप की तो हिम्मत भी नहीं थी कि आ कर मेरे छाँव में छेद कर के झाँके। मगर फिर भी वो धूप-छाँव के खेल मुझे बहुत अज़ीज़ थे, अज़ीज़ हैं। बस कुछ दिन और...धूप बन थिरकूँगी फिर एक बार...

(मेरे अज़ीज़ भाइयों के लिये- एक अर्से बाद जिनसे फिर मुलाक़ात होगी)

7 comments:

AlbelaKhatri.com said...

all the best !

अनिल कान्त : said...

अच्छा लगा पढ़कर

JHAROKHA said...

मानोशी जी,
परिवार के सभी लोगों से मिलने की आपके मन में कितनी उत्सुकता होगी ,ये बात मैं अच्छी तरह से समझ सकती हूँ .और फिर प्यारे भाईयों की तो बात ही निराली होती है ....हम लोग भी लखनऊ में आपकी प्रतीक्षा करेंगे .शुभकामनाओं के साथ .
पूनम

ओम आर्य said...

BADHIYA

दिगम्बर नासवा said...

वाह जाने कौन से यादों को कुरेद कर लिखा है आपने................... मन खोता हवा सा लग रहा है............ बहूत खूब

Babli said...

आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत बढ़िया लिखा है आपने! अब तो मैं आपका फोल्लोवर बन गई हूँ इसलिए आपके ब्लॉग पर आती रहूंगी!
मेरे दूसरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है!

गौतम राजरिशी said...

हम्म्म्म्म...तो भारत आने की तैयारी जोरों पर है।