Thursday, May 17, 2012

मैं "मैं" हूँ

  इस साल बच्चों को पढ़ाते हुये, कई अनुभवों से गुज़रते हुए एक बड़ी सीख मिली- प्रोत्साहन में बला की शक्ति होती है। बच्चे को अगर कुछ समझ नहीं आ रहा तो वह उसकी गलती नहीं है। उसे क्यों डाँटा जाये, मेरी समझ से बाहर है। भारत में (अब शायद स्थित बदल गई हो )बच्चे के नंबर कम आने पर, या फ़ेल होने पर कभी उस तरह ध्यान नहीं दिया जाता था कि हो सकता है कि बच्चे में कोई कमी हो जैसे लर्निंग डिसबिलिटी या कुछ और। डाँट डपट कर, मार-मार कर पढ़ा कर उस बच्चे के दिमाग़ में ज्ञान भरने की कोशिश की जाती थी। बच्चे का मनोबल और गिरता था और बच्चे में जितनी भी काबिलियत होती थी, वह भी किसी काम नहीं आती थी।

   मेरे क्लास में ७-८ साल की एक बच्ची है जो शर्मीली प्रकृति की है।  बात कम करती है शर्मीली होने की वजह से कुछ समझ न आये तो खुद सवाल करने से भी हिचकिचाती है।  उसके माता-पिता से बात करके भी यही समझ आया कि वह घर में भी कम बात करती है और बहुत धीरे बोलती है आदि।  उसे कक्षा में कई बार समझाया कि वह सवाल किया करे, बिना झिझक पूछा करे आदि।

   कुछ दिनों से मैंने गौर किया कि वह बच्ची सवाल पूछ रही है या कोई भी बात कर रही है तो कुछ चिल्ला कर। उसकी अपनी आवाज़ नहीं है यह उसकी, जैसे ज़बरदस्ती चिल्ला कर, गले पर बहुत ज़ोर डाल कर बात कर रही है।  आज उसे स्कूल के बाद थोड़ी देर अकेले पढ़ाते समय मैंने उसके कंधे पर हाथ रख कर उससे पूछा, " बेटा, क्या बात है कि आज कल देख रही हूँ तुम कुछ चिल्ला कर, गले पर ज़ोर डाल कर बात कर रही हो। हो सकता है मैं गलत हूँ, या बताओ अगर मैं सही हूँ तो।" बच्ची ने पहले तो कुछ नहीं कहा। फिर हामी भरी। कहा - घर में सब कहते हैं कि मुझे ज़ोर से बोलना चाहिये। मैंने उससे पूछा, "तो क्या तुम ऐसा कर के खुश हो? क्या तुम्हें कम्फ़र्टेबल लग रहा है?" उसका जवाब था, "दरअसल नहीं"। मैने उसे समझाया, ":जिस चीज़ से तुम अपनी पहचान खो दो वह मत करो। अगर तुम धीरे बात करती हो तो ठीक है। यह कोई गलत नहीं। हाँ कक्षा में कोई प्रेसेन्टेशन है तो अलग बात है, मगर बात करने के लिये तुम्हें ज़ोर लगा कर, चिल्ला कर बात करने की ज़रूरत नहीं।  मान लो मुझे कोई कहे कि आपके चलने का ढंग मुझे पसंद नहीं, बदल दीजिये, तो क्या मुझे बदल देना चाहिये?" बच्ची ने जवाब दिया, " नहीं" मैंने उससे पूछा, "क्यों? तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?" उसका जवाब था, "क्योंकि आप उससे आप नहीं रहेंगी और खुश भी नहीं रहेंगी।"  "बस यही बात है। अगर घर में कोई कहे तो कह देना मेरी टीचर ने कहा है कि मुझे "मैं" रहना है। मुझे इस तरह बात करना अच्छा नहीं लगता।"

बच्ची के चेहरे पर एक खुशी की आभा थी। बच्चों को समझाना तो आसान होता है पर हम बड़े भी क्या ऐसा कर पाते हैं? सबको खुश करने के लिये अपने को कई बार न चाहते हुये भी तो बदलने की कोशिश करते हैं हम।  हमारी पहचान ही तो हम हैं। फिर लोगों की इतनी परवाह क्यों होती है हमें। क्या इस सवाल का कोई उत्तर है?

9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

किसी और को जीवन में उतार कर अपनी पहचान खो देना तो उचित नहीं होगा बच्चों के लिये, उन्हें अपने अनुसार जीने दिया जाये।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सही कहा है ॥सबकी अपनी पहचान होती है ...

Rajesh Kumari said...

आपका आलेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा ,आपने तो अपने द्रष्टिकोण से उस बच्चे की समस्या को समझा उसका निराकरण का प्रयास भी किया पर घर में बाहर और यहाँ तक के धीरे से बोलने पर कई टीचर भी डांट देते हैं जो बहुत गलत है बच्चे के मन में हीन भावना घर कर जाती है वो अपना आत्मविश्वास खो बैठता है यह बात सभी को समझनी चाहिए बहुत बहुत आभार इस सन्दर्भ में लिखने के लिए

lokendra singh rajput said...

बेवजह क्यों अपनी पहचान को गुमाएं... उस लड़की को अपने एकदम सही सलाह दी...

Dr. Shailja Saksena said...

bahut hi accha aalekh hai Mansi..sochne ko majboor karta..

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

सटीक आलेख...बहुत बहुत बधाई...

RC Mishra said...

और बच्चे तो बच्चे ही हैं और रहेंगे

abcd said...

kaash itni acchi teacher sabko mile .