Wednesday, April 17, 2013

संध्या



सजधज सुंदर संध्या आई
मादक सा हो उठा पवन,
बाँहों में भर लिया क्षितिज ने
लाल हो गया नील गगन

दीवारों से परछाईं भी
शरमा कर के दूर हुई,
चूमा तितली ने फूलों को
और नशे में चूर हुई।

धूप ओढ़ती काली चादर,
चंदा मुख से गिरता आँचल,
पर इक चंचल बादल ने आ
लगा दिया आंखों में काजल।

फिर इक तारे ने जो खेली
आँगन में यूँ आँखमिचौली,
उसे ढूँढने निकल पडी तब
पीछे से तारों की टोली।

ज्यों धीरे से गोटे जड़ती
छाने लगी शाम की चूनर,
नई नवेली दुल्हन को भी
लगा याद आने निज पीहर।

चली मुदित हो संध्या रानी
बाबुल के घर क्षितिज पार कर,
और चाँद ने दिया बिछौना
झर-झर चाँदी की फुहार कर।

आँखों में कुछ सपने लेकर
रात रुपहली रंग छाँव में,
झींगुर के गुनगुन के पीछे
निशा आ बसी उधर गाँव में।

काले पेडों की परछाईं
और कोहरा बहुत बड़ा था,
निंदिया की बाँहों में आकर
फिर सपनों का जगत खड़ा था।

--मानोशी 

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