Thursday, October 08, 2015

क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन



अनगिन तारो में इक तारा ढूँढ रहा है,

क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन।

छोटा सा सुख मुट्ठी से गिर

फिसल गया,
खुशियों का दल
हाथ हिलाता निकल गया
भागे गिरते-पड़ते पीछे,
मगर हाथ में 
आया जो सपना वो फिर से
बदल गया,
सबसे अच्छा चुनने में उलझा ये जीवन।
क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन।


सबकी देखा-देखी में 
मैं भी इतराया,
मिला नहीं कुछ मगर ह्रदय
क्षण को भरमाया,
आसमान को छू लेने के पागलपन में,
अपनी मिट्टी का टुकड़ा 
बेकार गँवाया,
सीधा सादा जीवन रस्ते कांकर बोये,
फूलों के मधुरस में भी 
पाया कड़वापन।
क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन।


--Manoshi

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (10-10-2015) को "चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज" (चर्चा अंक-2125) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रतिभा सक्सेना said...

मन होता ही ऐसा है मानोशी जी ,
तभी तो कबीर कह गये 'मन के मते न चालिये '.