Saturday, February 06, 2016

जीवन कथा

नए भवन में
नई गृहस्थी,
डाल-डाल पर तितली तितली.

कली-हृदय कुछ अस्फुट सा है,
स्वप्न,  नींद में अंकुर सा है,
लगता जग सुन्दर निष्पापी
https://ssl.gstatic.com/ui/v1/icons/mail/images/cleardot.gifहृदय बड़ा सागर जैसा है,

चंचल मन में
कितने सपने,  
जीवन खट्टी मीठी इमली.

आँगन में चन्दा उतरेगा,
हँसकर मेरी गोद छुपेगा,
तारो की लोरी सुनकर मन
धीरे-धीरे झूम उठेगा,

नाचेगा जीवन
नन्हें हाथो की डोरी
बन कठपुतली.

खुशियों के ज्यों कलरव उठते
नीड़ चहकते सुबह सवेरे,
जीवन की आपाधापी फिर  
कम हो जाती धीरे-धीरे,

रह जाता खाली आँगन,  ज्यों
छुप जाती
बादल में बिजली.


---मानोशी 

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (08-02-2016) को "आयेंगे ऋतुराज बसंत" (चर्चा अंक-2246) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'