Sunday, March 20, 2016

तब और आज


तुम्हारा खिलखिलाना
हँसते रहना,
बात-बात पर
मेरी बातों का
भँवर सा जवाब देकर 
शरारत से यूँ देखना कि
मैं उस भँवर में डूब जाता,
एक मिनट की गंभीर चुप्पी
के बाद खुद ही को टटोल कर
हँस पड़ता,
और तुम्हारी आँखों की शरारत
दुगुनी हो जाती,
जैसे कुछ पा लिया हो तुमने
और मेरी इच्छा होती,
कि खींच लूँ तुम्हें ,
एक हल्की चपत लगा दूँ गालों पर
और प्यार से भर लूँ बाँहों में
पर कर नहीं पाया कभी,
...
आज तुम चुप हो
आज मैं तोड़ नहीं पा रहा तुम्हारी चुप्पी
आज भी मन है
कि भर लूँ तुम्हें बाँहों में
खींच लूँ अपने पास,
पर कर नहीं पाता
फर्क बस इतना है कि
तब तुम मेरे पास थी बहुत
आज, बहुत दूर हो कहीं...
----मानोशी

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-03-2016) को "शिकवे-गिले मिटायें होली में" (चर्चा अंक - 2289) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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रंगों के महापर्व होली की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Vaanbhatt said...

सुंदर रचना...