Tuesday, January 10, 2017

माँ सुनो...


माँ सुनो,
आँखों में अब परी नहीं आती,
तुम्हारी थपकी नींद से कोसों दूर है,
आज भूख भी कैसी अनमनी सी है
तुम्हारी पुकार की आशा में,
"मुनिया...खाना खा ले"
माँ सुनो,
मैं बड़ी नहीं होना चाहती थी,
तुम्हारी छोटी उंगली से लिपटी
रहना चाहती थी,
छोटी बन कर ।
याद है माँ?
मैं माँ बनना चाहती थी?
'तुम' बनना चाहती थी?
बालों में तौलिया लगा कर?
बड़ी बिंदी में आईने से कितनी बातें की थीं...
सुनो माँ,
एक और बचपन उधार दोगी ?
बड़े जतन से
धो-पोंछ कर रखूँगी,
और जब बड़ी हो जाऊंगी,
बचपन-बचपन खेलूंगी
मैं, तुम बन कर..
माँ, 'तुम' ही तो हूँ न मैं?
तुम नहीं हो तो क्या...
मानोशी

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (12-01-2017) को "अफ़साने और भी हैं" (चर्चा अंक-2579) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रतिभा सक्सेना said...

माँ, 'तुम' ही तो हूँ मैं ,और जो मैं, वह मेरी बेटी .