Tuesday, November 29, 2005

मौसम का पहला बर्फ़

वैंक्यूवर में बर्फ़ बहुत कम गिरती है, और नवंबर में तो बिल्कुल भी नहीं। मगर विश्व भर में बदलते मौसम के साथ ही वैंक्यूवर में भी कल रात अनअपेक्षित रूप से काफ़ी बर्फ़ गिरी। सुबह सूरज भी नहीं निकल पाया था, तब एक तस्वीर ली मैंने।
पहली तस्वीर अक्टूबर महीने की है जब पेड अपने को ठंड से जूझने के लिये तैयार कर रहे थे यानि की पतझड।
और दूसरी आज सुबह बर्फ़ के साथ...( घर के सामने)


Friday, November 18, 2005

आखिरकार भक्तों की गुहार सुनी गयी

इस कथा के सभी पात्र, घटना , स्थान काल्पनिक हैं. इस घटनाक्रम का किसी भी जीवित व्यक्ति से कोई सरोकार नहीं है...वगैरह वगैरह

त्रस्त चिकग नारद पर बिगडे नज़र आये, देवी प्रति पर भी ज़रा-ज़रा खफ़ा......इधर शुकुल देव अति प्रसन्न। शुकुल देव अमरीश पुरी अंदाज़ में बोले,"हा हा हा, फ़ुर आज खुश हुआ" और फिर प्रेम चोपडा स्टाइल में" मेरा नाम शुकुल है, मेरा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता"। त्रस्त चिट्ठाकार गणों ने मीटिंग बुलाई, किया क्या जाये। और कई घंटों की मीटिंग में सभी विषयों पर बात की गयी। आखिर शुकुल देव इतना अच्छा कैसे लिखते हैं? और तो और हर चिटठे पर टिप्पणी भी ज़ोरदार। लिखते तो हम सभी अच्छा हैं पर हमारे साथ ऐसा क्या है कि हम वो नहीं कर पाते जो शुकुल देव कर जाते है। काफ़ी विचार विमर्श के बाद शुकुल देव के भक्त जीत देव जो ज़रा गुस्से में लग रहे थे, ( क्योंकि उन्हीं को सबसे ज़्यादा सताया था शुकुल देव ने) ने कहा,"हम तो बहुत लिखते हैं मगर थोडी ज़्यादा देर पी.सी पर रहें तो पास से आवाज़ आती है-खाना खाने आ जाओ, ठंडा हो जायेगा। अभी आपका पी.सी. आफ़ कर दूं क्या?-और हमें सब छोड, खाने की मेज़ पर होना पडता है। बस इसी लिये शुकुल देव राज कर रहे हैं। वरना हम भी आदमी थे काम के..." और मीटिंग में चिकग ने निर्णय लिया कि एक बार और प्रभु के पास जाया जाये, और उन्हें बात खुल कर समझाई जाये।

चिकग पहुंचे प्रभु के पास," प्रभूऊऊऊऊऊऊऊऊ....हमारे याचना पत्र को एक बार फिर अपने फ़ाइल से निकालिये प्रभु...और कुछ कीजिये प्रभु..." प्रभु नहीं पसीजे मगर ऐसे में देवी अनकही (जो अपने नामानुसार कह तो कुछ नहीं पायी) के आंखों से दो आंसू ढुलक पडे...बस, प्रभु गये पसीज, एक टिशू पेपर निकाला और अपने आंसू पोछने लगे ( परेश रावल स्टाइल) और कहा, "देवी, रोइये नहीं, कहें क्या करना है। आप सब की व्यथा को हम अब तनिक तनिक समझ रहे हैं।" और कह दिया ,"तथास्तु, आप सब घर में अब आराम कीजिये, आप लोगों का काम हो जायेगा। "

प्रभु ने भक्तों का काम कर दिया था...

सोमवार की शाम...शुकुल देव अभी देव-स्वामि की खिचाई का रफ़ ड्राफ़्ट तैयार ही कर रहे थे शुकुल देव की पत्नी की आवाज़ आई, "आते हो खाना खाने कि लैप टाप उठा के फेंक दूं?" शुकुल देव की पत्नी जो मानव सेवा केलिये धरती पर पोस्टेड थीं अब शुकुल देव के साथ जन्म-जन्मांतर के लिये उनके कुंज में रहने को आ गयीं थीं। शुकुल देव का लैप टाप फूला नहीं समा रहा था और बेहाल कुंजीपट मन ही मन बहुत बहुत खुश ज़रा सुस्ताने की सोचने लगा...

( वैसे अनूप को बधाई सुमन भाभी के ट्रांसफ़र पर...)

Wednesday, November 09, 2005

दूर के ढोल सुहाने...२

पिछली बार जब लिखा कि कनाडा अगर इमिग्रेट कर के आना है तो भली भांति सोच लें, तो बाद में कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि मैं कहीं उन्हें डरा तो नहीं रही। और आगे इस बात का खुलासा भी करने को कहा। तो उन्हीं लोगों से बातचीत के बाद का नतीजा है ये दूसरा भाग।

कनाडा इमिग्रेशन की अनुमति के लिये आपको कुछ पोइंट्स चाहिये होते हैं जो आपकी शैक्षणिक योग्यता और कुछ अन्य चीज़ों पर निर्भर करते हैं। तो अगर आप वो पाइंट्स हासिल कर लेते हैं तो आपको इन्टर्व्यूह के लिये बुलाया जाता है और कुछ महीनों में मेडिकल और कुछ और महीनों में वीसा आ जाता है।

जब आप कनाडा आते हैं तो बहुत कम लोग नसीबवाले होते हैं जो पहले से ही नौकरी के साथ आते हैं। ज़्यादातर लोग बिना नौकरी के, ग्रीन कार्ड (पी.आर.सी.) ले कर आते हैं। तो शुरु होती है नौकरी की तलाश। कनाडा सरकार ने कई नौकरी उपलब्ध कराने में सहायता करने वाले नि:शुल्क सहायता केन्द्र खोल रखे हैं। आपको वहां कंप्यूटर, फ़ैक्स, फोटोकापियर और समाचार पत्र उपलब्ध कराये जाते हैं। आपको यहां किस तरह अपना रेस्यूमे या बायो-डाटा बनाना चहिये, कैसे इन्टर्व्यूह के लिये तैयार होना चाहिये आदि पर जानकरी भी दी जाती है जो पता नहीं भारतीयों को कितना मदद करती है क्योंकि भारतीय पहले से ही काफ़ी जानकारी रखते हैं और तैयारी के साथ ही आते हैं।

अब आप नौकरी के लिये अपनी योग्यता अनुसार कंपनियों में अपना रेस्यूमे भेजते हैं तो आपको कोई जवाब नहीं देता। तो आप कम्पनी में फ़ोन करते हैं और जवाब आता है, "आप को Canadian experience नहीं है। हम आपका रेस्यूमे फ़ाइल में रख रहे हैं, जैसे ही कोई उपयुक्त जगह होगी, आपको संपर्क किया जायेगा।" इस तरह आप चालीस-पचास जगह आवेदन पत्र भेज चुके होते हैं मगर हर जगह से यही जवाब आता है। (ये कोई अतिशयोक्ति नहीं है) आपकी पत्नी तब तक कोई मामूली कारखाने में काम पर लग चुकी होती है और आप भी निराश हो कर यहां आने के निर्णय को कोसते रहते हैं।
अब इस सूरत में मेरी राय यही है कि निराश न हों। कोई भी 'औड जाब' लेने से पहले हज़ार बार सोचें, एक बार इस चक्रव्युह में फ़ंस गये तो निकलना मुश्किल होगा। ९९% सफल इमिग्रेंट्स ने धैर्य से काम लिया तभी आज वो सफल हैं। एक बार कहीं से आपके अपने फ़ील्ड में नौकरी लग गयी तो किसी भी दर पर उसे ले लें क्योंकि वो अनुभव आपको कुछ ही महीनों में दूर तक ले जायेगा। आप अगर डाक्टर हैं तो १ करोड बार यहां आने से पहले सोचें।

कुछ सच्चाई-

१)टोरोंटॊ में मैने जितने भी टैक्सी ड्राइवर देखे हैं सब या तो इन्जीनियर, डाक्टर या टीचर देखे हैं।

२)मेरे दो ड्राइविंग इन्स्ट्रक्टर रह चुके हैं। एक डाक्टर और दूसरे पी.एच.डी इकोनोमिक्स में, पाकिस्तान से

३)हमारे एक डाक्टर दोस्त, जो लगभग ४८-५० साल के हैं, और बहुत ही भाग्यशाली रहे, २ साल में पूरी तरह घर में बैठ कर मेडिकल के सारी परीक्षायें एक बार में पास कर अब पूरी तरह से डाक्टरी कर रहे हैं। उनकी पत्नी को एक महीने में ही बहुत अच्छी नौकरी मिल गयी थी इसलिये वो ये कर सके। ये बहुत ही असाधारण सी बात है।

४)मेरे एक कलीग टीच्रर जो दुबई में किसी बहुत बडे स्कूल में पढाते थे को ९ महीने तक कोई नौकरी नहीं मिली और वो लौट गये।
५) कई इन्जीनियर, डाक्टर अब रीअल एस्टेट एजेंट्स हैं, कुछ बैंक में काम करते हैं।

ये सारे काम अच्छे हैं मगर क्या आपको अपना कार्यक्षेत्र बदलना मंज़ूर है? इसलिये अगर आप मेरे इस लेख के पहले भाग में पूछे प्रश्न के उत्तर हां में दे सकते हैं तो आपका स्वागत है इस देश में।

Friday, November 04, 2005

एक चुटकुला यहां भी...

रस्तोगी जी का ब्लाग पढ रही थी। एक चुटकुला मुझे भी याद आ गया। सोचा, "दूर के ढोल >>>मानसी" के अलावा भी कुछ आ जायेगा नारद में आखिरकार । तो चुटकुला कुछ यूं है...

संता सिंह जी पंजाब में एक बच्चों के एक स्कूल में टीचर हैं। थोडे दिन पहले की बात है। स्कूल में इन्स्पेक्शन था। इन्स्पेक्टर संता सिंह जी की कक्षा के सामने से गुज़रे। संता सिंह जी बच्चों को अंग्रेज़ी पढा रहे थे--"बच्चों, बोलो गधा" और बच्चे दोहरा रहे थे "गधाआआआ", संता सिंह जी ने कहा,"गधे के पीछे गधा" और बच्चे बोले, "गधे के पीछे गधाआआआ", "उसके पीछे मैं" ..."उसके पीछे मैं~~~", "मेरे पीछे सारा देश"..."मेरे पीछे सारा देश"। ये सिलसिला चलता रहा थोडी देर तक और इन्स्पेक्टर से रहा न गया। उन्होने जा कर शिकायत कर दी स्कूल के प्रधानाचार्य से, "आपके विद्यालय में ये कैसे शिक्षक हैं, अंग्रेज़ी की कक्षा में ये क्या पढा रहे हैं, हमें सफ़ाई चाहिये वरना संता सिंह जी को बरखास्त कर दिया जायेगा।"

तो संता सिंह जी को बुलाया गया और सफ़ाई मींगी गयी कि वो क्या पढा रहे थे। संता सिंह जी ने बडी ही सादगी से जवाब दिया "मैं बच्चों को assassination की spelling सिखा रहा था।" (ass ass I nation)

क्या गडबड है?

मेरा ब्लाग अजीब सा व्यवहार कर रहा है। मैने जो लेख लिखा था," दूर के ढोल सुहाने होते हैं..." अब नदारद है मेरे ब्लाग से। पहले तो, ब्लाग पर ये लेख पाठकों को दिखता था मगर मेरे डैशबोर्ड पर नहीं था और न ही कोई टिप्पणी कर सकता था। आज तो पूरी तरह ब्लाग से ही गायब है। ब्लाग दिग्गजों से मदद चाहूंगी। आखिर माजरा क्या है? क्या आप इस पर टिप्पणी कर सकते हैं? पोस्ट करने के बाद मैं देखूंगी कि ये मेरे डैशबोर्ड पर उपलब्ध है या नहीं। अगर आप टिप्प्णी नहीं कर सकते तो कृपया मेरे निजी ई-मेल पर मुझे मेल करें कि इसे कैसे सुधारूं।आखिर हुआ क्या है? और ब्लाग पर पासवर्ड भी नहीं बदला जा सकता है...

khallopapa@yahoo.com