इस सप्ताहांत में 'द नेमसेक' देखी। तबू और इरफ़ान ख़ान का मंजा हुआ अभिनय और कहानी को बिल्कुल उपन्यास से लेकर ज्यों का त्यों दर्शकों को परोस देना ही शायद इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत है। प्रवासी भारतीयों के जीवन पर आधारित ये कहानी, वास्तविकता के बहुत क़रीब है और हर प्रवासी भारतीय कहीं इस सिनेमा मे अपनी छवि देख सकता है।
अशीमा (तबू) का विवाह होता है अमेरिका मे बसे युवा प्रोफ़ेसर अशोक (इरफ़ान) के साथ। अशीमा के लिये अपने लोगों को छोड़, विदेश में पति के साथ अकेले इतनी दूर अमेरिका आ कर ज़िन्दगी शुरु करना आसान नहीं। मगर धीरे धीरे अमेरिका की ज़िंदगी में खुद को ढाल लेती है अशीमा। बेटे के जन्म के बाद अशोक अस्पताल में अपने बेटे का नाम दर्ज कराते हैं महान रूसी लेखक निकोलाई गोगोल के नाम पर, गोगोल। बेटा गोगोल (काल पेन) और बेटी सोनिया के जन्म के साथ ही और भी रंग जुड़ने लगते हैं अशीमा और अशोक की ज़िंदगी में। बच्चे अमेरीकी परिवेश में बड़े होने लगते हैं और यहीं के तौर-तरीक़े अपनाने लगते हैं। बड़े होते गोगोल को अपना नाम पसंद नहीं। सभी दोस्त उसे उसके नाम का अर्थ पूछते हैं और कुछ अजीब से इस नाम का मज़ाक भी उड़ाते हैं। दुनिया में हज़ारों अन्य सुंदर भारतीय नामों के होते हुये अशोक ने आख़िर अपने बेटे का नाम गोगोल क्यों रखा? क्या गोगोल अपना नाम बदल लेगा? अशीमा की ज़िंदगी में आगे क्या होगा?
अशोक, अशीमा, और गोगोल के इर्द-गिर्द घूमती इस कहानी की लेखिका हैं पुलित्ज़र पुरस्कार की विजेता सुश्री झुमपा लाहिड़ी और इस सिनेमा का निर्देशन किया है मानसून वेडिंग व सलाम बांबे की निर्देशिका मीरा नायर ने। एक बहुत अच्छी फ़िल्म जिसको कलाकारों के सशक्त अभिनय ने चार चाँद लगा दिये हैं, यक़ीनन आपका भी मन छू लेगी।
टेक कर घुटने, झुका सिर, प्रेम का जो दान माँगे,
हो किसी का प्यार लेकिन , प्यार वो मेरा नहीं है।
रख नहीं पाया मान निज जो, प्यार वो कैसे करेगा?
हीनता से ग्रस्त है जो, दीनता ही दे सकेगा।
द्वार पर तेरे खड़ा हूँ, स्नेह का लेकर निमंत्रण,
एक चुटकी भीख को यह दीन का फेरा नहीं है।
हो किसी का प्यार लेकिन, प्यार वो मेरा नहीं है।
है विदित, होती रही है प्यार की उद्दाम धारा,
बँध सके जो बंधनों से और ना निज कूल से।
राह में अवरोध कोई सर उठाये,
यह बहा दे, तोड़ दे, ढाये उखाड़े मूल से।
है अगर यह प्यार तो आश्वस्त हूँ मैं
इस प्रभंजन ने प्रबल, यह मन मेरा घेरा नहीं है|
हो किसी का प्यार लेकिन प्यार वो मेरा नहीं है।
प्यार है ले बहे जो, मन्द मन्धर गति निरंतर,
जी उठे स्पर्श पाकर हाँफ़ती मरुभूमि बंजर।
मान रखता, मान देता, मधुर मंगल रूप कोमल,
प्यार का जो स्वप्न मेरा क्या वही तेरा नहीं है?
टेक कर घुटने, झुका सिर, प्रेम का जो दान माँगे,
हो किसी का प्यार लेकिन , प्यार वो मेरा नहीं है।
--अचला दीप्ति कुमार
(मैं अचला जी के अनुमति के साथ उनकी इस कविता को यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ। ये मेरी प्रिय कविताओं में से एक है। )
" बेटे 'कारीडर' में भागना मना है स्कूल में। वापस जाओ और चल कर आओ।" टीचर की बात सुन बच्चे ने अपनी गति पर रोक लगाई और बड़े अनमने तरीक़े से वापस नलके तक चल कर गया और वापस आया...चल कर।
मैंने कभी भी किसी बच्चे को अपनी मर्ज़ी से चलते हुये नहीं देखा है। किसी गली में अगर बच्चा अकेला कहीं जा रहा होगा तो दौड़ कर। कभी किसी भी जगह ज़रा सा ध्यान दीजिये, बच्चों की प्रवृत्ति होती है भागने की। सिर्फ़ यही नहीं, कहीं रास्ते में कोई टापूनुमा उबड़खाबड़ स्थान हो तो, बच्चा उसी पर से चढ़ कर जायेगा।
बच्चों का मनोविज्ञान बहुत अचंभित करता है मुझे। एक बच्चा है मेरे स्कूल में। सभी टीचरों की नाक में दम कर रखा है। सातवीं में पढ़ता है। उसकी क्लास-टीचर भारतीय है और बहुत ही कड़ा अनुशासन है उनका। उस दिन मैं उनके क्लास में थी। अचानक बच्चा पूरी तरह झूल गया अपने चेयर पर इस तरह कि सर और पैर ज़मीं पर और पेट चेयर के ऊपर। अजीब स्थिति। टीचर ने कहा" बच्चे, ठीक से बैठो।" बच्चे ने बात मानी, और एक स्लाइड की तरह झूल गया इस बार। मेरी हँसी रुक नहीं रही थी। पर मैं तो हँस नहीं सकती। टीचर ने कहा," ऐसा करते हैं तुम ज़रा देर कक्षा के बाहर जो चेयर है वहाँ ठीक तरीक़े से बैठने की प्रैक्टिस कर के आओ।" बच्चा कक्षा से बाहर चला गया, कुछ इस भाव से कि उसने तो कुछ किया ही नहीं।
क्या आप जानते हैं कि एक बच्चे का ऐटेन्शन स्पैन यानि 'एकाग्रता अवधि' क्या है?- आठ मिनट। और हम बडों का १८ मिनट। इसलिये एकाग्र रूप से अगर बिना किसी हलचल के हमें कोई भाषण सुनना पड़े तो अट्ठारह मिनट से ज़्यादा हमारे लिये सज़ा ही होगी।
उस दिन मेरी कक्षा में एक बच्चा बार बार उठ रहा था, बात कर रहा था। उसे वैसे भी ध्यान देने और एकाग्र बने रहने में दिक्कत होती है। उसे मैंने एक चिट्ठी दी और कहा,"बेटे क्या ये चिट्ठी कक्षा सातवीं के मिस. डेविड (टीचर) के पास ले जाओगे? वो तुम्हें एक और चिट्ठी देंगी, उसे ले आना।" उस चिट्ठी में मैंने लिखा था, "कृपया इसे हस्ताक्षर कर बच्चे को वापस कर दें।" वो टीचर भी जानती है कि ये एक तरीक़ा है बच्चे को 'ब्रेक' देने का।
हमारे समय में तो हमें पढ़ाई में मन न लगे या ज़्यादा उछलकूद करने पर मार पड़ती थी। अब बच्चे के मनोविज्ञान और उसके अहं को ध्यान में रख कर सब काम करने पड़ते हैं जो शायद कारगर भी होते हैं ( वैसे मार भी बड़ा कारगर अस्त्र हुआ करता था)।
तो आइये, हम भी परंपरागत तरीक़े छोड़ कुछ आधुनिक और परखे हुये तरीक़े अपनायें।
अगर आपके बच्चा भी बहुत ही 'हाईपर' है या एकाग्र नहीं रह पाता तो शायद ये कुछ उपाय जो आपकी सहायता कर सकें-
१) उसे किसी दूसरे काम पर जाने दीजिये। जैसे, "बेटे ज़रा पानी पी कर आओ।" या "ज़रा देख कर आओ समय क्या हो रहा है? आते वक्त मेरे लिये पानी लेकर आना।"
२) ये दूसरा उपाय बहुत ही कारगर है। एक स्क्विशी बाल (यानि एक ऐसा नरम गेंद जो हाथ से दबाया जा सके) बच्चे के हाथ में दे दें। बच्चा शांत हो जायेगा और थोड़ी देर बाद वो गेंद उस से ले लें और वो काम पर लग जायेगा।
३) बच्चे का कोई मनपसंद काम उसे दे दें जैसे पेन्सिल की नोक बनाना , या थोड़ी देर उसे उसका मनपसांद चित्र बनाने देना।
४) एक घड़ी पर हर ५ मिनट पर अलार्म लगा दें । और हर पाँच मिनट में वो अपना काम कर ले तो उसे एक ब्रेक दें जो ३-४ मिनट से ज़्यादा न हो। उससे बात करें कि उसके स्कूल मॆं उसने क्या किया? उसके दोस्तों के बारे में आदि।
अगर ये सारे उपाय काम न आयें तो...? मुझे बतायें कौन सा तरीक़ा आपने अपनाया जो काम आया...