Thursday, October 23, 2008

मगर हमारी टीचर तो ऐसे नहीं पढ़ातीं...

आज के दिन सुबह से ही मूड अच्छा होता है मेरा, आज मेरी छुट्टी सुबह १०:३० बजे ही हो जाती है। इसीलिये, जल्दी घर भी आना होता है, फिर यूँ ही इधर-उधर, घर का कुछ काम, दोस्तों से बातचीत आदि। तो आज मैं जल्दी आ गई। घर पहुँची ही थी कि मेरे मोबाइल की घंटी बजी। स्कूल से फ़ोन था कि मिस. वी की अचानक तबीयत ख़राब हो गई है, क्या मैं उनकी दोपहर की क्लास आज सम्हाल सकती हूँ? मैंने हामी भरी। एक घंटे में फिर स्कूल पहुँची। ये किन्डर गार्ट्न के बच्चों की क्लास थी। मैंने हमेशा बड़े बच्चों को पढ़ाया है, इस साल पहली बार कक्षा तीसरी और चौथी को पढ़ा रही हूँ, मगर किन्डर्गार्टन...मैं बहुत नर्वस थी। बहुत प्यारे होते हैं ये छोटे छोटे बच्चे पर सच मानिये ये इतने बौसी (bossy) होते हैं। पहले तो मैं इनकी रोज़ की टीचर नहीं, फिर दोपहर के बाद की क्लास, वैसे ही थके होते हैं बच्चे। तो ख़ैर, मैं कक्षा में गई, बच्चे बाहर थे उस वक्त, उनका रीसेस था। मैंने डेस्क पर देखा, मिस. वी अपना लेसन प्लान छोड़ कर गई थी, लिखा था- बच्चों को अंदर लाइये, वो कार्पेट पर बैठें तो हाज़िरी लीजिये, फिर उनका गणित है, बच्चे बिंगो खेलेंगे आदि। बच्चे मुझे वैसे पहचानते हैं, रोज़ ही स्कूल में देखते हैं मगर उनकी कक्षा में तो नहीं। बड़ी ही शंका भरी निगाहों से बच्चों ने मुझे देखा और अंदर आये। आते ही एक बच्ची ने पूछा, हमारी टीचर कहाँ है। मैंने उन सब को प्यार से कहा, " हुआ यूँ कि तुम्हारी टीचर की तबीयत ठीक नहीं, तो उन्होंने मुझसे कहा है कि तुम लोगों के साथ खेलूँ, पढूँ, इसलिये मैं यहाँ हूँ"। सबने सुना, हामी भरी, कुछ अनिच्छा से ही और कार्पेट पर बैठे। मैंने सब बच्चों के नाम ले कर उनकी हाज़िरी लगाई। " तनुजा" और सब बच्चे खी खी कर हँसने लगे। एक बच्चे ने कहा, "इट्स नाट तनुजा, इट्स टनूजा"। मैंने कहा,"ह्म्म्म, लेट्स आस्क तनुजा। सो तनुजा, डज़ योर माम काल यू द वे आई काल यू? इज़ इट ओके इफ़ आई काल यू तनुजा?" तनुजा ने अपना सिर हिलाया। " गुड" कह कर मैं आगे बढ़ी। आगे बढ़ने से पहले बात साफ़ कर लेना ठीक समझा," बच्चों, मैं सब के नाम ठीक से नहीं जानती, इसलिये हो सकता है कि नाम लेने में उच्चारण ठीक न हो, उसके लिये मैं पहले से ही माफ़ी माँगती हूँ, और अगर मैं ग़लत उच्चारण करूँ, तो मुझे बता देना"। मैंने किताब उठाई। कहानी पढ़ कर सुनाने का वक्त था। किताब ले कर कहानी बच्चों को दिखा कर पढ़ना शुरु ही कर रही थी, कि एक बच्चा बोल उठा, " बट मिस. वी यूज़ेज़ द रेड पाइंटर व्हेन शी रीड्स टु अस"। ह्म्म्म्म... क्या कहूँ," ओ,के. सो लेट्स यूज़ दैट देन" । कहानी पढ़ने के बाद उनके बिंगो खेलने का वक़्त था। नंबर बिंगो। " मिस. वी गिव्स अ स्टिकर टु द विनर" ओके..." तो मैं भी दूँगी, तुम लोगों के हाथों पर" " नहीं मिस वी. तो हमारे गाल पर लगाती हैं।" ह्म्म, ठीक है। बच्चे मेरे बास (boss) बन चुके थे और मैं उनके कहे पर चल रही थी। किसी कारण वश आज मुझे कक्षा के अंदर भी ज़रा ठंड लग रही थी, मैंने अपना जैकेट पहना और बच्चों के साथ खेलने लगी। एक बच्ची ने मुझसे पूछा, " आप कहीं बाहर जा रही हैं?" मैंने कहा, " नहीं, क्यों?" " सो वाए आर यू वेयरिंग योर जैकेट?" मैं उसे समझाने लगी, " वेल, दो इट इस नाट दैट कोल्ड, आई ऐम फ़ीलिंग काइंड अफ़ कोल्ड, ऐंड आई...." मुझे वो बीच में ही काट कर बोली," बिकज़ यू वान्ट टू?" " मैंने कहा, " या, बिकज़ आई वांट टू"। अब इससे अच्छा क्या जवाब हो सकता था इसका। इसी बीच एक बच्चे ने रिपोर्ट की, " ऐंडी हैस अन ’अक्सीडेंट’" । ह्म्म्म...अब बस यही बाक़ी था। सारे कपड़े गीले हो चुके थे बच्चे के। अब क्या करते हैं, कोई अंदाज़ा नहीं था। तो मैंने अपने पड़ोसी कक्षा की टीचर से पूछा। उसने बताया कि अगर उसके बस्ते में सूखे कपड़ों का एक सेट नहीं है तो आफ़िस को पेज कर के उसके मां बाप को कुछ सूखे कपड़े लाने की हिदायत दो। तो मैंने वैसा ही किया और उस बच्चे को आफ़िस भेज दिया जहाँ वो अपने कपड़ों का इंतज़ार कर रहा था। दो घंटे की क्लास थी। उसी ने मुझे काफ़ी अनुभव दे दिया था। मैं नतमस्तक थी उनकी रोज़ की टीचर के धैर्य के आगे। अगर अगले साल मुझे किडर गार्टन की कक्षा अध्यापिका बनाने की ज़िम्मेदारी दे दी गई, तो मुझे सारी गर्मी की छुट्टी तैयारी करनी पड़ेगी, यक़ीनन। ख़ैर, अभी तीसरी और चौथी के बच्चों को सम्हालना सीख रही हूँ। हर रोज़ एक नया अनुभव...

3 comments:

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लिखा। स्कूल के अनुभव के बड़े अच्छे लेख लिख रही हैं मानसी। बच्चे bossy होते हैं यह पढ़कर ही अन्दाजा हुआ कि उनकी टीचर इत्ती bossy कैसे है। संगत का असर है!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बच्चे बड़ों को बहुत कुछ सिखा देते हैं और उस के लिए उन्हें कोई तैयारी नहीं करनी होती।

सागर नाहर said...

रोचक अनुभव रहा।
छोटे छोटे बच्चे इतने प्रश्न पूछते हैं कि बस...उनके प्रश्न सुन कर मुकुराहट आ जाती है।