Wednesday, November 19, 2008

Me To We - ’मैं से हम तक’

राष्ट्रीय उजाला पर ये लेख पढ़ कर कुछ महीने पहले शुरु हुये मेरे स्कूल में एक अभियान की चर्चा करने का मन हुआ। बस इसीलिये ये पोस्ट-

सबसे ज़्यादा ताक़त होती है आज की युवा पीढ़ी में। दुनिया भर के करोडों बच्चे जिन्हें उनका प्राप्य अधिकार नहीं मिल पा रहा है, उन बच्चों को मुक्ति दिलाने के इस संघर्ष में मैं भी साथ हूँ। अपने स्कूल में इस अभियान को हम कुछ टीचर्स और बच्चों ने मिल कर शुरु किया है और अब ये ज़ोर पकड़ रहा है। ’मी टु वी’ (मैं से हम तक) हमारा एक छोटा सा ग्रूप है, सितंबर से ही शुरु हुआ है स्कूल में, कोई ८-१० बच्चे, और ४ टीचर का ग्रूप। पूरा स्कूल हमारे साथ है। हम हिस्सा हैं, उस ’मी टु वी’ के बड़े अभियान का जो कि बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छा खाना, और बाल-मजदूरी से मुक्ति दिलाने में हर देश के बच्चों को वैश्विक रूप से मदद करता है। ’मी टु वी’ का चैरिटी पार्टनर है ’फ़्री द चिल्रेन’। इस संस्था ने ५०० स्कूलों का निर्माण किया है और ग़रीब देशों में स्वच्छ पीने के पानी की व्यवस्था आदि की है। हमारा देश भारत भी उन देशों मॆं से एक है जहाँ ये संस्था अपना योगदान दे रही है।

प्रश्न उठता है- हम अकेले कर क्या सकते हैं? हम अकेले दुनिया बदल सकते हैं। छोटी छोटी बातों से ही तो शुरु होता है ये ’मैं से हम’ तक का सफ़र। छोटी सी बात- राह चलते हुये एक आदमी का कोई सामान गिर गया हो तो उस से अनुमति ले कर उसे उठा कर वो चीज़ें दे देना...इतने से ही हो सकती है शुरुआत। भिखारी को भीख देने के पक्ष में नहीं, मगर उसे सही रास्ते तक ले जाना...काम का कोई जुगाड़ कर देना...कहना आसान है, करना उतना नहीं, समझती हूँ मगर जैसा कहा, छोटी चीज़ों से ही शुरुआत होती है। हम अकेले क्या सिस्टम बदल सकते हैं? बरसों से चला आ रहा सिस्टम? नहीं। पर अपने आसपास को तो बदल सकते हैं। आसपास से ही दुनिया शुरु होती है।

हमारे इस ग्रूप ने इस बार एक त्यौहार के मौक़े पर एक ’फ़ूड ड्राइव’ आयोजित किया। न ख़राब होने वाले डब्बे बंद खाने का एक डिब्बा, हर बच्चे को लाना था। ये डिब्बा यहाँ ७० सेन्ट्स में मिलता है, और ज़्यादा से ज़्यादा १ डालर। जब सब डब्बे जमा हो गये, हमने उन्हें ग़रीबों और भूखों तक पहुँचा दिया। (यहाँ की सुविधा अच्छी है, फ़ायर स्टेशन पर जा कर ये सारा खाना पहुँचा आना था और वो यथोचित जगहों पर पहुँच गया)। इस तरह कुछ भूखे बच्चों की कुछ मदद तो हम कर ही पाये।

हमारा स्कूल चाहता है कि हम इतना पैसा साल के आख़िरी तक जमा कर लें कि किसी एक देश में जहाँ बच्चों को पढ़ने के लिये किताबें नहीं मिलतीं, या स्कूल बनाये जाने चाहिये, उस में कुछ मदद कर सकें। ५ देशों में से एक देश को हमारा स्कूल चुनेगा। कैसे? ये ५ देश हैं- भारत, अरीज़ोना-मेक्सिको, चीन, एक्यूएडोर, कीन्या। सारे बच्चे किसी एक देश के लिये वोट करेंगे। किस देश को मदद की ज़्यादा ज़रूरत है वो निर्णय लेंगे बच्चे, ’मी टु वी’ द्वारा बनाये गये पोस्टर, जानकारी, प्रेसेन्टेशन आदि से। यहाँ तक कि माता-पिता को भी वोट देने का अधिकार होगा। ये माता पिता पेरेंट-टीचर नाइट के दिन वोट डालेंगे। फिर हम नाना तरीकों से पैसा इकट्ठा करेंगे। पूरी कम्यूनिटी को प्रोत्साहित करेंगे कि वो अपना योगदान दें। और इस पैसे को चुने गये देश में किसी स्कूल के निर्माण या कोई भी और मदद के लिये उपयोग में लाया जायेगा। थोड़ा ही सही, मगर बूँद बूँद से ही सागर बनता है।

मैं बहुत उत्साहित हूँ, इस ग्रूप का हिस्सा बन कर। बच्चों में कुछ करने का जोश और उनके जोशीले ख़याल, सुझाव, अचंभित करते हैं मुझे। उन्हें मार्गदर्शन करते हुये दरअसल मैं ही ज़्यादा सीखती हूँ इनसे। कहने की बात नहीं, कि ज़िंदगी है, घर-संसार छोड़ कर कुछ कर पाने की हिम्मत नहीं है, न ही हौसला। मगर इस तरह से जुड़ कर भी अगर कुछ भी बदल सकें हम, थोड़ा भी योगदान दे सकें तो भी कम नहीं शायद।
’मी टु वी’ पर ज़्यादा जानकारी के लिये और आप क्या कर सकते हैं- यहाँ जाइये


(आप के पास अगर कोई सुझाव है, किसी तरह का योगदान करना चाह्ते हैं आप, कैसे, आपका स्वागत है।)

3 comments:

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा। अच्छा लगा यह जानकर कि कुछ लोग तमाम दूसरों के बारे में सोचते हैं। पहले भी इसके बारे में सुना था। इस पोस्ट से जानकारी और हुई। मेरी तमाम शुभकामनायें इस अभियान के लिये। घर-परिवार में रहते हुये ही हम बहुत कुछ कर सकते हैं बहुत लोगों के लिये।

www.creativekona.blogspot.com said...

Manoshiji,
Man se ham tak ka safar padh kar achcha laaga.Ap duniyan bhar ke bachchon ke liye itna kuch kar rahee han,meree shubhkamnayen.
Vaise ap money cllection ke liye cmmunity moblisation,charrity shows vagarah ke sath hee kuchh aur tareeke bhee apna saktee han.Apapne skool ke bachchon se ,teachers se kahen ki vo jyada naheen sirf ek din ka poket money donate kar den.Jin bachchon ke pas puranee kitaben hon ya aglee class men jane ke bad vo apnee kitaben gareeb desh ke bachhon ke liye donate kar den.Mujhe yad ha univarsity men padhate samay ham log campous men mele ka ayojan karte the aur us mele kee pooree income badh peediton ya gareeb logon ke liye donate kar dete the.
Apke bachchon ke liye chlaye ja rahe abhiyan men man bharat men rah kar kase jud sakta hoo?
Meree dheron shubhkamnaen.
Hemant Kumar

Akshaya-mann said...

bahut accha blog hai......
keep it up.......