Monday, December 08, 2008

ज्योतिष और रिश्ते


आज कल ज्योतिष के बारे में कई ब्लाग लिखे जा रहे हैं। मैंने ज्योतिष पर कुछ लेख लिखे हैं पहले, पर बहुत ज़्यादा नहीं। (labels में astrology पर क्लिक करने पर आपको वो लेख मिल जायेंगे)। ये लेख कृष्ना अष्टकवर्ग सिद्धांतों के अनुसार, किसी कुंडली में जातक के शादी/प्रेम संबंधों पर रोशनी डालती हुई। मेरे अपने अनुभव से ये सिद्धांत अत्यंत कारगर हैं, और व्यक्ति विशेष के बारे में या उसके संबंधों के बारे में जानकारी दे देते हैं, यहाँ तक कि किसी को बहुत ज़्यादा गहरे ज्योतिष आने की भी ज़रूरत नहीं है।

आइये देखें इन कुछ नियमों को-


१) जातक की कुंडली में सूर्य और शुक्र की दूरी देखें। ४१ डिग्री से ज़्यादा या ३ डिग्री से कम हो ये दूरी तो रिश्तों में तनाव होने की संभावना, रिश्ते टूटना और कई रिश्ते रखने की इच्छा- मल्टिपल रिलेशन्स। (एक बहुत सशक्त सिद्धांत)

२) जातक का शुक्र अगर मूला, कृतिका या आर्द्रा नक्षत्र में हो तो फिर वही उपरोक्त बातें। एक रिश्ता होना मुश्किल है। (एक और सशक्त सिद्धांत)

३) जातक का मंगल और शुक्र एक स्थान पर हो या शुक्र मंगल के अधीन नक्षत्र में (राशि या नवमांश में) और ऊपर से शनि की भी दृष्टि हो उस पर तो बस...फिर वही उपरोक्त बात।

ऊपरोक्त ऐसे योग तो हों मगर बृहस्पति की भी दृष्टि हो साथ तो उसके मल्टिपल-रिश्ते छुपे रहते हैं। किसी को भनक नहीं पड़ती।

४) बृहस्पति का तुला राशि में स्थित होना रिश्तों में तनाव या रिश्तों से कुछ तो दु:ख दर्शाता है।

५) उपरोक्त बातें किसी की कुंडली में न दिखाई दें तो जातक को रिश्तों से सुख मिलता है, वो रिश्तों को सच्चे मन से निभाता है।

और भी काफ़ी बारीक़ी से देखना तो होता है हर कुंडली को, पर ये कुछ सिद्धांत देख कर आप पहली नज़र में ही व्यक्ति के संबंधों/स्वभाव के बारे में बता सकते हैं।

आख़िर में - किसी भी रेमिडी या उपाय का कोई अर्थ नहीं होता मेरे अपने विचार और अनुभव से। कवच, जेम स्टोन, यज्ञ, ...सब बेकार है। सिर्फ़ कर्म, और इच्छा शक्ति ही भाग्य को बदल सकते हैं...और हाँ, साइंस और टेक्नोलाजी का भी हाथ होता है आपके जीवन को दिशा देने में। ऐसा सोचिये कि भाग्य या बुरा समय अगर एक नदी है और हम उसके साथ बिना कर्म किये बहते जाय़ें तो वो तो हमें सागर में ही ले जा कर डुबोयेगा। मगर अगर हम धारा के विरुद्ध तैरने की कोशिश करें तो कठिनाई तो ज़रूर होगी पर हम डूबेंगे नहीं। देर से सही पर अपनी मंज़िल तक पहुँचेंगे। भाग्य नामक कुछ है ही नहीं, ये नहीं मानती पर भाग्य ही सबकुछ है और हमारे हाथ में कुछ नहीं, ये भी नहीं मानती।

disclaimer- यहाँ दिये सारे views मेरे अपने हैं । इस पोस्ट में कृष्ना अष्टकवर्ग के सिद्धांतों को बताया गया है। इनका उपयोग अपने विचारशक्ति से करें।

(कृष्ना जी को धन्यवाद के साथ, जिन्होंने मुझे ज्योतिष सिखाई) http://krushna.sageasita.com/

6 comments:

हिमांशु said...

हमें ज्योतिष तो आती नहीं . हम क्या करें .
हम इतना भी नहीं जान सकते कि कुण्डली में सूर्य और शुक्र की दूरी कितनी है .?
राम करें यह दूरी ४१ डिग्री से ज्यादा या ३ डिग्री से कम न हो .

परमजीत बाली said...

ज्योतिष कम ही जानता हूँ फिर भी आपने जो जानकारी दी वह सचमुच बहुत उपयोगी है।आभार।

गौतम राजरिशी said...

उत्सुकता वश पढ़ तो पूरा गया,किन्तु पल्ले कुछ नहीं पड़ा...

ये जू दूरी का जिक्र किया है आपने,ये क्या कुंडलियॊं में दर्शित होता है?

Manoshi said...

हाँ गौतम, कुंडली जिसे देखनी आती है उसे ये दूरी दिख जायेगी, और आज अकल तो साफ़्ट वेयर से बिल्कुल सही कुंडलियाँ बन जाती हैं जो ये दूरी आदि सब बता देती हैं।

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

जो मेरे भाग्य मे नही है,
वो दुनियॉ की
कोई भी शक्ति, मुझे नही दे
सकती और जो मेरे भाग्य मे है
उसे दुनियॉ की कोई भी शक्ति
छीन नही सकती,
ईश्वरीय शक्ति असम्भव को
सम्भव बना सकती है।
अतः कर्म ही "कामधेनु" एवम
प्रार्थना ही पारसमणी" है।

आपके कथन से मै सहमत हु। आपने बहुत ही अच्छा लिखा।

Amit said...

और यदि मंगल और शुक्र परिवर्तन योग में हो आमने सामने ,मतलब वृषभ का मंगल और वृशिक का शुक्र ,तो ?