Sunday, December 07, 2008

रीडिंग स्ट्रैटिजी (पढ़ने के उपाय)- भाग २


इस शुक्रवार एक रीडिंग वर्कशाप में जाना हुआ। अर्से बाद किसी ऐसे अच्छे प्रोफ़ेशनल डेवेलप्मेन्टल वर्क्शाप में जाना हुआ और बहुत कुछ सीखने मिला। आज उसी वर्क्शाप में बताई गई एक रीडिंग स्ट्रैटिजी का उल्लेख कर रही हूँ। (ये वैसे तो कक्षा में बच्चों को पढ़ाने के लिये एक कारगर उपाय है, मगर थोड़ी फेर-बदल कर, मां-बाप बच्चों के साथ इसे घर पर भी कर सकते हैं)

पिछले लेख में मैंने comprehension skills को बढ़ाने के लिये कुछ उपायों की बात की थी। आज हम बात करते हैं रीडर्स थीएटर (पता नहीं हिन्दी में क्या कहेंगे) की। ये एक बहुत ही आसान मगर कारगर तरीक़ा है बच्चों को समझाने का और पढ़ने और पढ़ कर समझने की क्षमता को बढ़ाने का।

किसी भी किताब को (किसी भी भाषा में) जो कि बच्चा पढ़ रहा है ज़रा सी मेहनत से स्क्रिप्ट का रूप दे दें। या कोई बना बनाया स्क्रिप्ट रूपी किताब ले लें। एक एक रोल हर बच्चे में बाँट दें और उस स्क्रिप्ट को बच्चों को अपने रोल को पढ़ने बोलें।

इसे कैसे करें?


मोडेलिंग अर्थात पढ़ाना- बच्चों को पहले हर एक पात्र की एक लाइन पढ़ कर ख़ुद दिखाइये। बच्चों से ही पूछिये कि उन्हें क्या लगता है कि फ़लां पात्र की अवाज़ कैसी होगी (मान लीजिये किसी चुड़ैल की आवाज़ है तो तीखी सी, किसी राजा की : धीर-गंभीर, सूत्रधार की: बुलंद मगर सौम्य आदि)। फिर उन्हें पढ़ कर दिखाइये।

बहुत बहुत ज़रूरी है कि कक्षा का माहौल comfortable हो। अगर मुझे किसी ऐसी स्थिति में डाल दिया जाये, जहाँ मैं अगर अच्छा न बोल पाऊँ और लोग हँसें तो मैं तो कभी भी ऐसी चीज़ों का हिस्सा न बनूँ। इसलिये पहले ही बात साफ़ हो कि कोई बच्चा किसी बच्चे के बुरा पढ़ने पर हँसे नहीं, बल्कि हर कोई हर किसी से इज़्ज़त से पेश आये।

बच्चों की बारी-
अब बच्चों से सिर्फ़ पहले पृष्ठ में अपने अपने रोल को पढ़ने बोलें। कोई बच्चा अगर ज़्यादा संकोची है तब उसे कहिये कि " ह्म्म, मेरे ख़याल से ये राजा के बोलने वाली लाइन छोटी सी है, तुम इसे पढ़ लो।"

पहले ही पृष्ठ को ४-५ बार बच्चों से पढ़वाइये, इस से उनका संकोच जाता रहेगा और वो अगले प्रृष्ट के लिये तैयार रहेंगे। अब पूरी कहानी बच्चों से पढ़वा डालिये।

आखि़र में- आखिर में बच्चों से प्रश्न पूछिये कि हर पात्र के रोल के बारे में सबके क्या विचार हैं और फ़लां बच्चा क्या करता तो और अच्छा पढ़ सकता था। सबका feedback लेना ज़रूरी है। फिर बच्चों से कहानी संबंधित सवाल पूछिये, इससे पता चलेगा कि बच्चों ने उस कहानी को कितना समझा।
( टिप: "तुम उस पात्र की जगह होते तो क्या करते" जैसे सवाल बच्चों की चिंतन शक्ति को बढ़ाने में मदद करते हैं, न कि उस राजा का क्या नाम था जैसे सवाल)

इस तरह आप टेक्स्ट बुक या किसी भी किताब से एक पीरियड बच्चों के साथ इस तरह का लेसन दे सकते हैं और ये न सिर्फ़ मज़ेदार होगा बल्कि बच्चे बहुत जल्द समझ भी जायेंगे।

4 comments:

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

अच्छी चर्चा!!!

बच्चों में पाठन क्षमता का विकास जितनी जल्दी ही सकेगा , वह स्वयं करके सीखने की प्रक्रिया में आगे बढेगे !!!


कृपया ब्लॉग जगत में इस तरह की चर्चाओं को जारी रखें!!!


कुछ प्रयास मैंने भी किया है!!!!

चाहे तो पुरालेखागार से देखने का प्रयास करें!!!

गौतम राजरिशी said...

ह्म्म्म...पढ़ा तो ऐसा था कभी क्रियान्वय नहीं कर पाया...कोशिश करता हूं

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

whaa.. bahut sundara vichar

creativekona said...

Manoshi jee ,
Reading strategies par apka bahut achchha lekh hai.Eductional T.V.se jude hone ke nate main apke is lekh se kafee khush hua.Ham logon ne is vishay par kai programme bhee banaye hain.
Actually sirf bachchon men hee naheen badon men bhee aj kal padhne kee adat bahut kam hoti ja rahee hai.Shayad aisa Electronic meediya ke badhte dabav ke karan ho raha hai.
National book trust INdIA is disha men kafee kuchh kar raha hai.Apne Readers theater kee jo bat kahee hai..vah darasal Pathak Manch hai.NBT ki ek patrika hee hai Pathak Manch Bulletin.
Bahrhal manoshiji bachchon ke sath hee ap abhibhavkon,adhyapkon ke liye bhee bahut kuchh kar rahee hai apne blog par.Meree shubhkamnaen.
Main chahta hoon ki bachchon kee behtaree ke liye mai jo koshish apne blog par kar raha hoon, usmen ap bhee hissedar banen.
Hemant Kumar