Saturday, May 09, 2009

रवीन्द्र जयंती पर- भालोबाशा भालोबाशा

आज रवीन्द्र जयंती पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का ये गीत प्रस्तुत है। (इसके भावार्थ की मैंने हिन्दी में अनुवाद की चेष्टा की है)।



यू-ट्यूब से मुझे एक विडियो भी मिला इस गाने का। फ़िल्म श्रीमान पृथ्वीराज-


हिन्दी में अनुवाद

सखी चिंता (भावना) किसे कहते हैं
सखी यातना किसे कहते हैं
तुम जो कहते हो दिन रात
प्रेम...प्रेम...
प्रेम क्या है
क्या ये सिर्फ़ पीड़ादायी है?
वो क्या केवल ही आँखों का पानी है
क्या वो केवल दुख का है श्वास
तब क्यों लोग सुख छोड़ कर
करते हैं ऐसे दुख की आस ?

मेरे आँखों में तो सभी सुंदर है
सभी नूतन है, सभी विमल
सुनील आकाश, श्यामल कानन
विशद ज्योत्सना, कुसुम कोमल
ये सभी मेरे जैसे केवल हँसते हैं
हँस खेल के मरने की इच्छा रखते हैं
न मैं वेदना जानती हूँ न ही रोना
न ही शौक़ की यातना कोई
फूल जैसे हँसते हँसते झर जाते हैं
जैसे ज्योत्सना भी हँस कर मिल जाती है
हँसते हँसते ही तारे भी आकाश से गिर जाते हैं

मेरे जैसा सुखी कौन है
आओ सखी आओ मेरे पास
मेरे सुखी हृदय के सुख गान सुन कर
तुम्हारे हृदय खिल उठेंगे
जो प्रतिदिन तुम रोती हो
एक दिन आओ और हँसो
एक दिन सब विषाद भुला कर आओ
सब मिल कर हम गायें
सखी....

बंग्ला में-
सखी भावना काहारे बौले
सखी यातना काहारे बौले
तोमरा जे बौलो दिबोशो रजनी
भालोबाशा भालोबाशा
सखी भालोबाशा कारे कहे
शे की केबल-ई जातनामय
लोके कोरे कि सुखेरि तोरे
अमोनो दुखेरो आस
आमारी चोखे तो सकल ही शोभोन
सकल ही नवीन
सकल ही बिमल
सुनील आकाश श्यामल कानन
विषद जोछोना कुसुम कोमोल
सकलई आमारी मोतो तारा केबली हाशे केबली हाये
हाशिया खेलिया मोरिते चाये
नाजानी बेदोन न जानी रोदन न जानी शादेर यातना जोतो
फूल से हाशिते हाशिते झोरे
जोछोना हाशिया मिलाये जाये
हाशिते हाशिते आलोक सागरे आकाशेर तारा तियाघिकाए
आमार मोतो सुखि के आछे आये सखी आये तोरा आमार काछे
सुखी हृदयेर सुखेर गान सुनिया तोदेर जोड़ाबे प्रान
प्रोतिदीन जोदि काँदीबी केबोल एक दिन आये हाशीबी तोरा
एक दिन आये बिषादो भूलिया
सोकोले मीलिया गाहिबो मोरा
भाबोना काहारे बोले सखि यातना काहारे बौले

9 comments:

मैथिली गुप्त said...

सुन्दरतम प्रस्तुति, मुझे ये वीडियो और गीत बहुत ही प्यारा लगा

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गीत बहुत प्यारा बढ़िया लगा. प्रस्तुति के लिए आभार

creativekona said...

मानोशी जी ,
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जी के गीत का अनुवाद सहित पढ़वाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .यह साहित्य तो हमेशा हमेशा के लिए लिखा गया है .इसकी सार्थकता तो हमेशा रहेगी .
हेमंत

संगीता पुरी said...

आज रवीन्‍द्र जयंति पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गीत का सुंदर प्रस्‍तुतिकरण अच्‍छा रहा।

दिगम्बर नासवा said...

सुन्दर प्रस्तुति.............
रविन्द्र जी के गीत...........प्रकृति की मंनोहक छठा को निहारते हुवे लगते हैं .........

गौतम राजरिशी said...

रविन्द्र कम ही पढ़ा....सिर्फ गीतांजली ...
"सखी भावना काहरे बौले" के लिये शुक्रिया मानोशी

महावीर said...

तुम्हारे ब्लाग पर आने के लिए देर हो गई। गुरुदेव रवीन्द्रना टैगोर जी का गीत
बहुत ही सुंदर है। और हिन्दी का अनुवाद भी बहुत अच्छा लगा। विडियो पर
गीत सुनने में तो सोने पर सुहागे वाली बात हो गई। बधाई।
महावीर शर्मा

प्रकाश गोविन्द said...

रवीन्द्रनाथ टैगोर जी के गीत का अनुवाद सहित प्रस्तुत करने के आभार व्यक्त करता हूँ ! अगर सिर्फ बंग्ला में-में ही पढता तो शायद सिक्सटी परसेंटेज ही समझ पाता !

शुभकामनाएं

somadri said...

में इस गीत को khoj रही थी, thanx