Thursday, May 14, 2009

उम्र बन के रह गई है - ग़ज़ल


आपकी आँखों में मुझ को मिल गई है ज़िंदगी
सहरा-ए-दिल में कोई बाक़ी रही ना तश्नगी

रात के बोसे का शम्मे पर असर कुछ यूँ हुआ
उम्र भर पीती रही रो-रो के उस की तीरगी

उससे मिलके एक तुम ही बस नहीं हैरां कोई
है गली-कूचा परेशां देख ऐसी सादगी

आजकल दिखने लगा है मुझको अपना अक़्स भी
आजकल क्या आइना भी कर रहा है दिल्लगी

झुक गया हूँ जब से उसके सजदे में ऐ ’दोस्त’ मैं
उम्र बन के रह गई है बस उसी की बंदगी
फ़ाइलातुन x3 फ़ाइलुन
(बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़)

13 comments:

venus kesari said...

मानसी जी आपने गजल में रदीफ़ नहीं रहा है फिर भी गजल बहुत खूबसूरत बनी है
ये शेर ख़ास पसंद आया
झुक गया हूँ जब से उसके सजदे में ऐ ’दोस्त’ मैं
उम्र बन के रह गई है बस उसी की बंदगी


आपका वीनस केसरी

अल्पना वर्मा said...

रात के बोसे का शम्मे पर असर कुछ यूँ हुआ
उम्र भर पीती रही रो-रो के उस की तीरगी
-यह शेर तो बहुत ही सुन्दर लिखा है मानसी जी.

-खूब कही है यह ग़ज़ल!

JHAROKHA said...

मानोशी जी,
बहुत सुन्दर गजल ..मन को छूने वाली ...
पूनम

संजीव गौतम said...

झुक गया हूँ जब से उसके सजदे में ऐ ’दोस्त’ मैं
उम्र बन के रह गई है बस उसी की बंदगी
लाजवाब है. यूं ही कहती रहें.
संजीव गौतम

Udan Tashtari said...

आजकल दिखने लगा है मुझको अपना अक़्स भी
आजकल क्या आइना भी कर रहा है दिल्लगी


-अच्छा जी ये इस तरह ख्याल..बढ़िया है बेरदीफ़ उम्दा गज़ल..असर जानकार जानें मगर हमें भाई!! तो बधाई.

"अर्श" said...

MANASI JI IS BE-RADIF GAZAL KE KYA KAHANE KHAASA PASAND AAYEE YE GAZAL.. BAHOT HI KHUBSURATI SE LIKHAA HAI AAPNE... DHERO BADHAYEE


ARSH

woyaadein said...

बहुत खूब....उम्दा अंदाज-ए-बयाँ...

साभार
हमसफ़र यादों का.......

दिगम्बर नासवा said...

आजकल दिखने लगा है मुझको अपना अक़्स भी
आजकल क्या आइना भी कर रहा है दिल्लगी

यूँ तो पूरी ग़ज़ल दमदार है.........पर इस शेर ने सीधे असर किया है..........लाजवाब मानसी जी

गौतम राजरिशी said...

"रात के बोसे का शम्मे पर असर कुछ यूँ हुआ/उम्र भर पीती रही रो-रो के उस की तीरगी"

...ये शेर तो जैसे लगता है खुद आसमान से उतर कर आया है।

लाजवाब है मानोशी

जसबीर कालरवि - हिन्दी राइटर्स गिल्ड said...

ITS A BEAUTIFUL BUT IT MAY BE GOOD GAZAL
TRY THIS WAY MANSI

AAPKI AANKHO ME MUJHKO ZINDGI AATI NAZAR
SEHRA-E-DIL ME TO AB NA TISNAGE AATI NAZAR

मानसी said...

सभी का शुक्रिया ग़ज़ल को पसंद करने का।

जसबीर जी, आपका इशारा रदीफ़ की तरफ़ है। मगर इस तरह की ग़ज़ल जिस में रदीफ़ न हो, उसे ग़ैर-मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं और उसे लिखना भी जायज़ है।

somadri said...

बहुत खुबसूरत है तेरी बातें.
तेरे अश्क में दिखती है कई रातें

Vijay Kumar Sappatti said...

namaskar maansi ,

aapne bahut sundar gazal kahi hai .. haalanki mujhe gazal ki technicalities jyada samjhti nahi hai ,... phir bhi padhne me bahut accha laga.. bhaavo ki sahi abhivyakti hai .. is gazal ke liye badhia sweekar karen..


meri nayi kavita " tera chale jaana " aapke pyaar aur aashirwad bhare comment ki raah dekh rahi hai .. aapse nivedan hai ki padhkar mera hausala badhayen..

http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html


aapka

vijay