Monday, August 17, 2009

यादें- क्या बात थी कि जो भी सुना अनसुना हुआ

पुरानी कई यादों को संजो कर ले आई हूँ इस बार भारत से। १८-१९ साल की उम्र में आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित मेरी गाई ग़ज़लें पापा के पुराने टेप-रिकार्डर में मिली। साथ ही मिला एक पुराना पीला अख़बार। पापा ने कितने जतन से ये सब संभाल के रखा है।

उन ग़ज़लों में से एक ग़ज़ल यहाँ सहेज रही हूँ।



और साथ ही वो अखबार की क्लिप।

17 comments:

ओम आर्य said...

बहुत ही सुन्दर .......मज़ा आ गया....

अमित said...

अच्छा लगा! तानपूरा वाली लड़की के बाल बहुत अच्छे लग रहे हैं लेकिन वो कैमरे की तरफ़ नहीं देख रही है। समाचार स्पष्ट नहीं है लेकिन हेड लाइन से पता चलता है कि युवा महोत्सव के उद्घाटन में गति अवरोधक और यातायात पुलिस तैनात करना जरूरी है।

हिमांशु । Himanshu said...

खूबसूरत है । बड़े जतन से रखा है आपके पापा ने इसे ।

संजीव गौतम said...

बडे दिन बाद आपके दर्शन हुए. ये तो लग रहा था कि अपने साथ जो लायेंगीं उसी में से कुछ मिलेगा लेकिन उम्मीद से ज्यादा अच्छा मिला है. वाकई पुरानी यादों में घूमना कितना अच्छा लगता है. ग़ज़ल और फोटो दोनों शानदार है.

दिगम्बर नासवा said...

क्या बात है ........... बहुत ही जोरदार मज़ा आ गया आपकी aawaaz madhur है

गौतम राजरिशी said...

सुस्वागतम मनोशी...वो रिकार्डिंग सुन नहीं पा रहा। मेरे नेट की गति इजाजत नहीं देता। संभव हो तो मेल में भेजिये।

पुरानी तस्वीर अच्छी लगी और पिताजी का इन्हें सहेज कर रखना...

अजित वडनेरकर said...

बहुत सुंदर मानसी जी,
आनंददायक अनुभूति थी इस ग़ज़ल को सुनना...
आपका रियाज़ जारी है या नहीं ?

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर! गाना सुन्दर, मानसी सुन्दर! मानसी का लौट के आना अति सुन्दर! जय हो!

श्रद्धा जैन said...

wahhhhhhhhh sunder ati sunder
kya baat hai
itni sunder aawaz ke saath itni sunder gazal
aur aapka ye roop
bhai kayal ho gaye aapke

अर्शिया said...

अति सुंदर।
( Treasurer-S. T. )

जसबीर कालरवि - हिन्दी राइटर्स गिल्ड said...

mansi
bhut hee accha
kya aur gazals bhi hame sunne ko mil sakti hai
yaadgari rahega

jasbir kalravi

Udan Tashtari said...

बहुत आनन्द आया सुनकर. :) और भी सुनवाओ. भारत यात्रा कैसी रही?

Shardula said...

सखि, लीजिये आप घर जमाने में मसरूफ हैं तो हम ही आपके दर पे आ गए:) आपकी गाई हुई ख़ूबसूरत ग़ज़ल सुनी और तस्वीर भी देखी. अब ज़रा रसगुल्ले भिजवाईये या खुद ही खा किये हैं सारे :) ? सस्नेह शार्दुला

सुशीला पुरी said...

bahut sundar.........

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Beautiful silky voice , full of feelings ..
So glad aapke Pujy Papa ji ne
ees GAZAL ko Sahej ker rakha hai

Aapki purani tasveer bhee Bus Zamane ki yaad karva rahee hai ..

Behtareen ...Geet Gayan jaari rakho

Sa sneh ashish ,
- Lavanya

मानसी said...

सभी का बहुत शुक्रिया।

अजीत जी, घर-गृहस्थी और काम का रियाज़ संगीत के रियाज़ से ज़्यादा हो जाता है :-)

शार्दुला, ज़रा सी देर हो गई आपके आने में। मैंने बचा के रखे थे रसगुल्ले, पर आप आईं ही नहीं, सो मन मार कर खा लिये।

हां समीर, जसबीर जी, कुछ और गज़लें समय से अपलोड करूँगी।

अंतर्मन | Inner Voice said...

Kyaa baat hai!Apni kala ko qaayam rakhiye.