Monday, February 28, 2011

काश!

काश! रात ये लम्बी होती,
सुबह नही यूँ जल्दी होती।

सोमवार को सूरज भी गर 
उठता, लेकिन आँख मीच कर,
अंगडाई लेता, सो जाता,
मुँह पर चादर और खींच कर।

किरणे भी झट बांह समेटे,
दुबक रजाई भीतर जातीं,
फिर से रजनी सपनों का तब
एक नया संसार सजाती।

एक अंचभित चिड़िया का,
नन्हा बच्चा ले कर पंखड़ाई,
कहता मम्मी आज सवेरे
से ही देखो बदली छाई।

रवि उठना जो भूल ही जाता, 
तो किस्मत क्या अपनी होती...
काश रात ये लंबी होती,
सुबह नही यूं जल्दी होती।

14 comments:

अनूप शुक्ल said...

वाह! बड़ी मासूम इच्छायें हैं। काश सब पूरी हो जातीं।

प्रवीण पाण्डेय said...

सोना बहुत सुहाता है,
पर सूरज नित आता है।

नीरज गोस्वामी said...

काश ऐसा होता...दुनिया कितनी खुशगवार होती...कोई भाग दौड़ नहीं होती...सुकून और आराम होता...आपने बहुत सरल शब्दों में हम सब की कामना व्यक्त की है...बधाई...

नीरज

अमित said...

बहुत कोमल कल्पनायें हैं।
किरणे भी झट बांह समेटे,
दुबक रजाई भीतर जातीं,
फिर से रजनी सपनों का तब
एक नया संसार सजाती।

बधाई!
सादर

सुमन'मीत' said...

masumiyat se bhari rachna....

Kailash C Sharma said...

काश! रात ये लम्बी होती,
सुबह नही यूँ जल्दी होती।

काश ऐसा होता..बहुत सुन्दर रचना..

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

मासूम प्यारी सी कविता ..... बहुत सुंदर

चैतन्य शर्मा said...

सुंदर ... मजेदार कविता .....आपको महाशिवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएं

abcd said...

पंखड़ाई --शब्द सचमुच होता है ??!!
या आप्का derive किया हुआ है-अन्गड़ाई से ??!!
-----------------------------------------
यदि ये derivation है ,तो अद्भुत है !!

मानसी said...

आप सभी का इस कविता को पसंद करने का शुक्रिया।
@ abcd- आपने सही समझा, पंखड़ाई अंगड़ाई से ही derive कर लिया मैंने। आपको अच्छा लगा, धन्यवाद।

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा...शुभकामनाएँ.


महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें

Patali-The-Village said...

बहुत सुंदर प्यारी सी कविता| धन्यवाद|

कंचन सिंह चौहान said...

म्म्म्म् ... काश !:)

JHAROKHA said...

mansi ji
bahut hi achhi rachna
रवि उठना जो भूल ही जाता,
तो किस्मत क्या अपनी होती...
काश रात ये लंबी होती,
सुबह नही यूं जल्दी होती।
chahte to sabhi hain ki subah jaldi na ho aur sundar salone sano ke saath thoda aur so lein .
par yadi suban jaldi nahi hogi to jara sochiye ,aapke saare kaam vilab se honge.eir yah to prakriti ka niyam hai .har mousam ke saath din raat bade -chote hote rahte hain.hamare sochne se kuchh bhi nahi hone wala.
par han! aapki kavita me bachho si chachalta hai jo bahut hi pyari lagi.
bahut hi sundar
poonam