Sunday, March 25, 2012

बदले नयन




बदले
नयन स्वप्न बहुतेरे
मगर प्यार का रंग न बदला

हूक प्रेम की शूल वेदना
अंतर बेधी मौन चेतना
रोम-रोम में रमी बसी छवि
हर कण अश्रु सिक्त हो निखरा
आड़ी-तिरछी रेखाओं का
धूमिल-धुंधला अंग न बदला

बदले
नयन स्वप्न बहुतेरे
मगर प्यार का रंग न बदला

मिथ्या छल के इंद्रधनुष में
बंध के रेशा-रेशा पागल
क्षितिज मिलन की आस में जोगी
आशाओं का प्यासा सागर
दुनिया छोड़ी लाज भुलाई
युग-युग से ये ढंग न बदला

बदले
नयन स्वप्न बहुतेरे
मगर प्यार का रंग न बदला


10 comments:

M VERMA said...

मगर प्यार का रंग न बदला

प्यार का तो सार्वभौमिक रंग होता है ...

प्रवीण पाण्डेय said...

प्यार के रंगों को स्पष्ट रूप से छिटकाती उत्कृष्ट रचना।

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही लयात्मक ... प्रभावी रचना ...

Padm Singh said...

सुन्दर रचना ...

singhSDM said...

बहुत सुन्दर पठनीय कविता
मिथ्या छल के इंद्रधनुष में
बंध के रेशा-रेशा पागल
क्षितिज मिलन की आस में जोगी
आशाओं का प्यासा सागर
दुनिया छोड़ी लाज भुलाई
युग-युग से ये ढंग न बदला.............
बेहतरीन भावनात्मक प्रस्तुति.....!!!!

क्या कहूँ.....! said...

बदले
नयन स्वप्न बहुतेरे
मगर प्यार का रंग न बदला

प्रेम का शाश्वत और सत्य रूप यही तो है मानोशी जी! बहुत सुन्दर कोमल भावों को समेटता हुआ गीत है।

abcd said...

शूल,वेदना,बेधी,धूमिल-धुंधला,मिथ्या, छल,पागल,प्यासा /
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इतने कडवे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए ,
बखूबी "प्रेम" को स्थापित किया गया /

मानसी said...

धन्यवाद सभी को। आदरणीय abcd- आपका पूर्ण परिचय मिलेगा तो खुशी होगी। आप साहित्य प्रेमी मालूम होते हैं, आपकी भी रचनायें पढ़ने का सौभाग्य मिले।

abcd said...

kanupriya-by Dr.Dhrmaveer Bharti is my all time favorite for many reasons.
And ur writings give me a feel of his style .This is the reason for my visit to ur blog.

yes i am fond of literature but its been a long time since i stopped writing,and whatever written is on the 'papers'.Anyways,"Technology" is the word for me nowadys !

I try to comment 'sensibly' but it hurts 'sensitivity' sometimes,forgive me for that,if it has ever happened.

Introduction--What is in the name?
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मानसी said...

You are most welcome to visit my blog. It is just that I personally do not like anonymity if there is no particular reason. My writings are nowhere near Bharti ji's writings but thanks for this huge compliment. And...I always welcome constructive criticism.