Thursday, July 19, 2012

दो कवितायें


डिवोर्स

सपनों का घरौंदा
चांद, तारे, शबनम, कुहरा...
सब का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा
जोड़ कर
बनता है
एक पूरा आसमां
और कभी
किसी रात के सन्नाटे में
बिखर जाता है चाँद,
टूटता हैं चूरा-चूरा तारा
टपकती है कोरों से शबनम
कट जाती है कुहरे की झीनी चूनर
और गिर जाता है पर्दा...
मगर कोई नहीं जान पाता
पर्दे के पीछे रोती है दीवार।
एक कहानी खत्म होती है...
कहीं नई सुबह की शुरुआत
और कहीं शाम का अंत!

यादें


रेत पर बने निशान...
कुरेदने पर मिलती है
नीचे एक कहानी,
पुरानी चिपचिपी सी
जो छोड़ती नहीं है साथ,
तार-तार रेशा
अंग-अंग लिपटा रहता है
हर वक़्त...
कुछ यादें क्यों होती हैं
इतनी गाढ़ी?




11 comments:

वाणी गीत said...

कहीं नई सुबह की शुरुआत , कहीं शाम का अंत ! किसी के जीवन में सबेरा , किसी का हुआ अँधेरा
गाढ़ी यादें छोड़े नहीं छूटती !
बहुत बेहतरीन !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दोनों रचनाएँ बहुत बढ़िया ... कुछ यादें होती हैं जो चिपकी ही रह जाती हैं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (21-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

मानसी said...

Arvind Mishra has left a new comment on your post "दो कवितायें":

विरह राग

मानसी said...

प्रवीण पाण्डेय has left a new comment on your post "दो कवितायें":

बनाने के श्रम से टूटने की पीड़ा अधिक सालती है..

expression said...

बहुत बहुत सुन्दर मानसी जी.....
कोमल भाव जो दिल को छू रहे हैं....

अनु

शिवनाथ कुमार said...

सही में कुछ यादें बहुत गाढ़ी होती है
दोनों कविताएँ सुंदर ....
सही कहा अपने कहीं अंत तो कहीं शुरुआत ....
लेकिन कभी कभी अंत दुखदायी भी होता है ...

सुशील said...

सुंदर रचनाऎं !!

दिगम्बर नासवा said...

दोनों बहुत ही लाजवाब अपना असर छोड़ जाती हैं ...

संगीता पुरी said...

कहीं नई सुबह की शुरुआत
और कहीं शाम का अंत!

कहीं धूप कही छावं ..

दोनो रचनाएं सुंदर ..

Raja Pundalik said...

Manasee-ji, aap kaha hai? Aapka doosara bhi blog hai aur hum udhar bhi kuchh apeksha rakhate hain...! Aasha hain aap niraash nahin karengi...