Thursday, October 13, 2005

आवारा बदरी
















"घर से निकली छुप कर एक बदरी
इक आवारा हवा ने कलाई पकडी
भोली अल्हड कुछ यूँ मचली
हाथ थाम कर संग उसके चली
किसी अनजाने नशे में चूर
दूर बहुत दूर....

प्यासी धरती मिली राह में
भीगने की उसकी चाह में
संग रोयी उसके हल्के हल्के
बस एक दो मोती छलका के
खिंची चली ज्यों संग एक डोर
दूर बहुत दूर...

रुपहली चांदनी हौले से मुस्कायी
कहा मेरे संग न इक रात बितायी
एक क्षण मुझसे आँख मिचौली
खेली फिर हुई तुम परायी
हल्के से मुस्का कर बदली चली उड़
दूर बहुत दूर...

आस्मां में मुस्काते धनुष के
एक रंग ने कहा ताव में आ के
पास न आना मेरे प्रीतम के
सुन्दर-सलौने हैं मेरे मीत मन के
कलूटी तू ने उनका रंग लूटा
तू आवारा तेरा प्यार भी झूठा
बरस गयी तब काली बदरी
रंग छोड कर ज्यों हुई बिरही
और चली उदास घर की ओर
दूर बहुत दूर....

2 comments:

अनूप शुक्ला said...

आस्मां में मुस्काते धनुष के
एक रंग ने कहा ताव में आ के
पास न आना मेरे प्रीतम के
सुन्दर-सलौने हैं मेरे मीत मन के

'ताव में आके' खालिश कनपुरिया लहजा है। मुझे तो बहुत अच्छी लगी ये कविता-पूरी की पूरी। मजा आ गया कविता पढ़ कर। बधाई।

sarika saxena said...

बहुत सुन्दर अल्हड़ सी कविता है।
शुभकामनायें!!