Thursday, April 17, 2008

आज मैंने हाइवे पर गाड़ी चलाई-2

पिछले पोस्ट से आगे-
पुराने शहर वापस आने के बाद फिर गाड़ी को हाथ लगाने की सोची। ५ घंटे के लेसन फिर लिये और पति के साथ बार बार गाड़ी चलाने निकली। अब मुझे समझ आया कि मेरी सभी सहेलियाँ ये नसीहत क्यों देती थीं कि कभी भी पति के साथ गाड़ी चलाने मत जाना। सिर्फ़ बहस होगी, गाड़ी सीखना तो खैर क्या होगा जो कुछ आता होगा वो भी भूल जाओगी तो खैर, मेरी नई नौकरी की मांग ऐसी थी कि मुझे गाड़ी चलाना आना ज़रूरी था। मगर अभी तक एक दिन भी मैंने आत्मविश्वास के साथ अकेले गाड़ी नहीं चलाई थी। एक दिन बस ठान ही ली।

उस दिन जब वो आफ़िस गये, मैंने अपनी दो पुरानी कलीग को फ़ोन किया। उनसे कहा कि मैं आज पहली बार गाड़ी अकेले ले कर निकलूँगी, क्या वो मेरे साथ आने को तैयार हैं? हम किसी माल में जा कर लंच करेंगे। दोनों मान गईं। कहा, " साथ जीयेंगे, साथ मरेंगे, चल।" मैंने गाड़ी निकाली, उन्हें उनके घरों से पिक-अप किया और घूम घाम कर सही सलामत घर वापस आ गई। बस वो दिन था और आने वाले दिन थे। उसके बाद शहर के अंदर हमेशा ही किसी काम से या स्कूल जाने के लिये गाड़ी चलानी ही पड़ती है।

आज मैंने हाइवे पर गाड़ी चलाई। इसी खुशी का एलान करने को तो ये ब्लाग लिखा गया। दो दिन पहले मेरे स्कूल के प्रिंसिपल ने मुझे बुला कर कहा कि मुझे किसी वर्क्शाप में भेज रहे हैं जो कि न्यू मार्केट में है। न्यू मार्केट कोई ३० माइल दूर तो होगा ही। अब तक तो मैंने हाइवे पर गाड़ी नहीं चलाई थी कभी। तो वीकेंड पर पति से कहा कि मुझे हाइवे प्रैक्टीस करायें। हाथ भींच कर, तन कर बैठे हुये, किसी भी इमर्जन्सी में ब्रेक लगाने को तैयार
मेरे पति के साथ (ब्रेक जब कि मेरे पैर के पास था) मैं हाइवे प्रैक्टीस के लिये निकली कोई ६-७ बार सिर्फ़ किस तरह मर्ज करते हैं और एक्ज़िट करते हैं कि प्रैक्टीस करवाई गई। तब उन्होंने कहा, "ठीक तो चला रही हो यार...गुड।" मगर मुझे एक बात जमी नहीं। कायदे से १०० कि.मी. से ज़्यादा की स्पीड नहीं होनी चाहिये हाइवे पर, मगर १२०-१३० में क्या मज़ा आ रहा था पति के बार बार टोकने की वजह से मज़ा किरकिरा होता रहा। और फिर अगले दिन मैंने अकेले हाइवे पर ड्राइव किया। और अकेले १२० पर गाड़ी चला कर घर सही सलामत वापस आ गई। घर आकर
अतिउत्साहित हो कर अपने चाचाजी को फ़ोन किया जो कि पास ही रह्ते हैं। उनको अपनी इस अचीवमेंट की दास्तां सुनाई। उन्होंने कहा," बेटे, शाबाश मगर ४०४ हाईवे कोई हाईवे है? ४०१ पर चलाती तो समझता कि हां अब अच्छा चला लेती है मुनिया।" चाचाजी पर खूब चिल्लाई मैं, कहा चाची को फ़ोन दो, आपसे बात ही नहीं करनी...वगैरह। अब फिर चैलेंज है। अगली मंज़िल है, हाइवे ४०१...फिर किसी मजबूरी में ही शायद ये मुकाम भी तय हो जाये।

7 comments:

उन्मुक्त said...

१२० किलोमीटर प्रति घन्टे पर गाड़ी चलाई - काश मैं भी चला पाता।

Raviratlami said...

काश हमारे आसपास ऐसी सड़कें होतीं... हमारे शहर से गुजरता महू नीमच हाइवे है जिसमें प्रतिवर्गुफुट की दर से औसतन तीन गड्ढे हैं. 40 किमी का सफर दो घंटे से कम में करने वाला रेकॉर्ड बना सकता है... :(

munish said...

MANOSHI KEEP IT UP !! WHEN U COME TO INDIA U CAN HAVE A SIMILAR EXPERIENCE ON HIGHWAY NO. 8 (DELHI-BOMBAY), DELHI-AGRA AND DELHI-CHANDIGARH ROADS TOO. PLS. VISIT WWW.MAYKHAANA.BLOGSPOT.COM

neelima sukhija arora said...

कुछ दिनों पहले मैंने भी हाइवे पर गाड़ी चलाई थी, शहर में तो दो एक साल से चला ही रही हूं, जयपुर से अजमेर जाने वाले एक्सप्रेस हाई वे पर। लेकिन गाड़ी का मजा तो 120 पर चलाने में ही आता है

अतुल said...

सब जगह ऐसी सड़कें कहा. वैसे आपकी मूल पोस्ट का फ़ाट नही दीख रहा.

अनूप भार्गव said...

अरे ये हाइवे ४०१ भी कोई हाइवे है ! इरादे बुलन्द ही रखने हैं तो चाँदनी चौक में चला के दिखाओ ?

:-)

गौतम राजरिशी said...

हा हा हा
रोचक दास्तां