Wednesday, April 16, 2008

मैंने आज हाइवे पर गाड़ी चलाई

"दीदी मैं आपको २ दिन बाद लेने आ रही हूँ, लाइसेंस के रिटन टेस्ट के लिये, तैयार रहना"। मेरी मुँहबोली बहन ने हुक्म जारी कर दिया। "पर मुझे नहीं चलानी है गाड़ी भई, तेरे जीजाजी ले जाते हैं न मुझे जहाँ कहीं भी हो। और फिर यहाँ की बस सेवा इतनी अच्छी है" । मेरे टाल मटोल से कुछ भी काम नहीं बना। २ दिन बाद सचमुच हाज़िर थी वो मेरे दरवाज़े पर। "चलो, पढ़ाई ठीक से की है कि नहीं? २० में से १६ ही तो लाने हैं पास होने के लिये। ४ गलतियों की जगह तो है।"

इस तरह मुझे मिला रिटन ड्राइविंग लाइसेंस जिसे जी-1 कहते हैं। चूँकि मुझे पहले गाड़ी चलाने का कोई अनुभव नहीं था, मैं इस लाइसेंस के साथ अकेले गाड़ी नहीं चला सकती थी। और अकेले गाड़ी चलाने के लिये एक दूसरी तरह का लाइसेंस लेना पड़ता है, जिसके पहले इस जी-1 लाइसेंस के साथ एक साल पूरा करना ज़रूरी होता है। तो देखते देखते एक साल गुजर गया और मैंने बकायदा एक ड्राइविंग इंस्ट्रक्टर रखा जो मुझे १० घंटे के ड्राइविंग लेसन के बाद ड्राइविंग टेस्ट के लिये ले जाने वाला था। मेरे पतिदेव ने कहा, "जो इंस्ट्रक्टर तुम्हें सिखायेगा वो तो अपना करीयर ही छोड़ देगा"। तो खैर १० घंटों के लेसन पूरे हुये। और आखिरी लेसन के बाद मेरे इंस्ट्रक्टर ने मुझे खबर सुनाई, " बहन जी, मैं आज के बाद आप्को सिखाने नहीं आ पाउंगा। मैं अपना करीयर बदल रहा हूँ। आज के बाद आपको एक नया इंस्ट्रकटर सिखाने आयेगा" मैं बेहद हैरान, परेशान। मगर फिर पता चला कि मेरे ये इंस्ट्रक्टर साहब दरअसल डाक्टर हैं, पाकिस्तान से। मगर यहाँ आने के बाद ड्राइविंग के लेसन दे रहे थे। अब फिर वापस मेडिकल का कोई कोर्स करने यहाँ के कालेज जाइन कर रहे हैं। मुझे ज़रा सुकूं आया। तो फिर अब ये नये इंस्ट्रक्टर आये और मुझे टेस्ट के लिये टेस्ट सेंटर ले गये।

टेस्ट के रेज़ल्ट का मुझे तब ही पता लग गया जब मेरी एक्ज़ामिनर ने रास्ते में ब्रेक लगा दिया। यानि फ़ेल। तो मैंने बड़े बुझे मन से अपने फ़ेल होने की खबर सुनाने पति को फ़ोन किया, लगभग रोते हुये। पति ने बड़े प्यार से कहा, " चलो आज बाहर खाना खायेंगे। अगली बार पास हो जाओगी।" दिल को बड़ी तसल्ली हुई कि मेरा फ़ेल होना कोई बड़ी बात नहीं। रात को खाना नहीं बनाया, बाहर खाकर अगली बार पास हो जाने की उम्मीद की खुशियाँ मनाई और १० दिन बाद फिर टेस्ट दे कर हकीकत में मैं पास हो गई।

लाइसेंस लेने के बाद भी मैंने गाड़ी चलाने की कोई कोशिश नहीं की, न ही पतिदेव ने कोई इल्तजा की। इसी बीच हमारा दूसरे शहर तबादला हो गया। वहाँ मैं नौकरी नहीं कर रही थी। तो गाड़ी चलाने की ज़रूरत बिल्कुल भी नहीं थी। वहाँ एक रिटायर किये हुए भले मानस मिल गये जो सभी नये सीखने वाले जानपहचान वालों को अपने खाली वक्त में यूँ ही गाड़ी चलाने का अभ्यास कराते थे। मैंने भी उनसे कहा कि मुझे भी प्रैक्टीस करवा दें क्योंकि १० घंटे गाड़ी चला कर मुझे अकेले गाड़ी चलाने की हिम्मत नहीं होती। वो भी मान गये। तो अक्सर ही मैं अंकल के साथ वैंक्यूवर की पहाड़ी रास्तों पर गाड़ी चलाने का अभ्यास करने निकल पड़ती। ऐसे ही एक दिन जब मैं वापस आ रही थी, गाड़ी में अंकल के साथ, सामने पीली ट्रैफ़िक सिग्नल पर एक दूसरी गाड़ी ने अपनी गाड़ी घुमाई (लेफ़्ट टर्न) और हो गई मेरी गाड़ी से उस गाड़ी की---- टक्कर। मेरी गाड़ी तो पिचक गई, मगर उस गाड़ी को कोई नुक्सान नहीं हुआ। पति को फिर रोते रोते फ़ोन किया, उन्होंने कहा, "अब जो करना है नियमानुसार, वो करो। तुम ठीक हो न?" तो खैर, इन्श्योरेंस को रिपोर्ट लिखायी, पूरा बयान दिया, मगर गाड़ी चलाने के लिये जो हिम्मत चाहिये वो पूरी तरह गायब हो गयी। आज तक सिर्फ़ अकेले नहीं चला पाती थी, पर अब तो अंकल या किसी के साथ भी चलाने की हिम्मत नहीं रही। पति के साथ तो वैसे भी कभी नहीं चलाया था, सिर्फ़ झगड़े होते हैं उनके साथ चलाओ तो, कोई फ़ायदा नहीं होता। कोई १ महीने बाद इंश्योरेंस कंपनी ने मुझे दोषमुक्त कर, दूसरे गाड़ी चालक को दोषी करार दिया और मेरी गाड़ी ठीक करवाने के पूरे पैसे भरे। मैंने फिर भी गाड़ी को नहीं छुआ। एक साल बिना गाड़ी चलाये आराम से गुज़र गया। मगर फिर हमारा तबादला पुराने शहर हो गया।

क्रमश:

7 comments:

सुजाता said...

चाहे कुछ भी हो जाए गाड़ी चलाने की हिम्मत न छोड़ना ।वैसे दुनिया मे हर जगह हर टैफिक जाम और हर सड़क गड़बड़ी के की वजह है "कोई मैडम "।लेकिन कटुवचन सुन ने के बाद स्त्रियाँ गाड़ी चलाती हैं ।चलानी भी चाहिये । बल्कि बाइक भी चलानी चाहिये ।गाड़ी के साथ तो फिर भी एक नज़ाकत है ,इश्टाइल और क्लास है । बाइक पर बैठी महिला की दबंगई के क्या कहने ।

masijeevi said...

ये एक शानदार चोखेरबाली जद्दोजहद है। पति चला लेते हैं, ले जाते हैं, एक यूनीवर्सल किस्म की पतिनिर्भरता है, उम्‍मीद है जल्‍द ही आपको गाड़ी चलाते हुए पढेंगे। उम्‍मीद तो ये भी है कि किसी दिन हम भी गाड़ी में ऑंख मूंदे बैठेंगे जिसे हमारी पत्न‍ी चलाएं।...खैर।। सपने, और क्‍या।

Pratyaksha said...

बड़े दिनों बाद मानसी ? लेकिन अब शुरु हुई हो तो ज़ारी रखना । कहाँ रहीं ?
तुम्हारी पोस्ट पढ़कर झुम्पा लाहिरी की मिसेज़ सेन याद आ गईं ।

Udan Tashtari said...

ओह!! तो अब हाईवे पर चला रही हो?? तब तो संभल कर चलना पड़ेगा टोरंटो लौटने के बाद हाईवे पर. :)

बधाई.

अनूप भार्गव said...

हे भगवान ! टोरोंटो की सड़को का अब क्या होगा ? ही ... ही .... ही ...

Manoshi said...

सुजाता, आपकी टिप्पणी के लिये धन्यवाद। मसीजीवी, अगले लेख में गाड़ी चला रही हूँ मैं। हाँ प्रत्यक्षा, आजकल कम ही लिखना हो पाता है। पर जब भी कोई बहाना मिले, लिखने को मन करता है। बस एक बहाना ही है ये लिखने का। ह्म्म समीर आप अब भी भारत में ही हैं? अनूपदा...अब आप्की टिप्पणी का क्या जवाब दूँ :-)

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छी गाड़ी चलाई। हाईवे पर गाड़ी चलाने की बधाई। सब ऐसे ही मौज लेते हैं। चलाती रहो गाड़ी। जो होगा देखा जायेगा।