Friday, October 03, 2008

फिर नया अनुभव

मेरी कक्षा का एक हिस्सा


पहला दिन था मेरा इस साल इन बच्चों के साथ। ८ साल और ९ साल के, कक्षा तीसरी और चौथी के। पिछले साल कक्षा ५,६,७ और आठवीं को पढ़ाने का काम मिला था। १२-१३ साल के बच्चे, बड़े हो चुके होते हैं इतने कि अपनी ज़िम्मेदारी समझने लगते हैं (प्राय: सभी)। इस साल अलग असाइन्मेंट है।

तो मेरा पहला दिन इन बच्चों के साथ। कक्षा में शोर सा, सब बैठे, पर थोड़ी देर बाद ही दो-चार उठ कर घूमते हुये दिखे, अचानक ही छितरे हुये। ह्म्म, ऐसा पिछले साल तो नहीं था। मिसेज़ सी, मिसेज़ सी की आवाज़ें कई बार बेवजह, कई बार पेन्सिल भूल जाने की शिकायतें। उनको मेरे कहानी पढ़ कर सुनाते वक्त, कई बार बीच में ही बोल उठते, अपनी किसी कहानी को इस कहानी में बिठाने की कोशिश करते (जो कि एक बहुत अच्छी रीडिंग स्ट्रैटिजी तो मानी जाती है, पर सही डिसिप्लीन नहीं)बच्चे...।

मैंने प्राइमरी (किन्डर्गार्टन से तीसरी तक) बच्चों को पढ़ाने का अलग से कोर्स ले रखा है फिर भी लगा बहुत फ़र्क़ है बड़े बच्चों को और छोटे बच्चों को पढ़ाने का। तो सबसे पहले तो कक्षा में नियम बनाने और उनको ढाँचा देने में कुछ और वक्त बिताया। मगर अगले दिन भी वही हाल। बार बार की हिदायतें दीं, बच्चों अब तुम छोटे बच्चे नहीं रहे, कक्षा दूसरी में नहीं हो और बात करने या कुछ कहने से पहले हाथ उठाना ज़रूरी है, टीचर के बोलने के बीच बोलना ’रूड’ कहलाता है, कक्षा के नियमों को चलो साथ दोहराते हैं... आदि। बच्चों के लिये क्लास में एक चार्ट बनाया, अच्छा काम किया अगर किसी बच्चे ने -जैसे कि किसी दूसरे बच्चे की मदद, या अपने मौक़े (टर्न) का हाथ उठा कर इंतज़ार करना, अपना काम समय पर करना, तो उन्हें तारे (स्टार) मिलते हैं। और कोई अगर अपना काम समय पर न करे, अपने साथियों से ’रूड’ हो, सबसे इज़्ज़त से बात न करे, आदि तो फिर नेगेटिव चिह्न मिलते हैं जिससे स्टार कैन्सल। हर तीन महीने के अंतर पर जो सबसे ज़्यादा स्टार पा सकेगा, वो किसी रिवार्ड का अधिकारी होगा।

बच्चे नये नियम, नये तरीके सीख रहे हैं। मैं भी सीख रही हूँ कि छोटे बच्चों को पढाना कोई असान काम नहीं , बहुत ज़्यादा धैर्य की ज़रूरत होती है। गुस्सा आये तो भी गुस्सा पी जाने की कला आनी चाहिये। वैसे भी बच्चे इतने प्यारे होते हैं कि क्या उन पर कोई गुस्सा करे। शिक्षक की ज़िंदगी में, (या किसी की भी वैसे तो) हर दिन एक नया अनुभव और सीखने वाला अनुभव होता है। इस साल फिर नया सीख रही हूँ। आशा है ये सीख आगे और भी काम आयेगी।

1 comment:

अनूप शुक्ल said...

गुस्सा आये तो गुस्सा पी जाना बहुत मेहनत का काम है जी!! है न!
मेरा सुझाव है कि आप नियमित अपने क्लास रूम के बच्चों के साथ हुये अनुभव लिखती रहें। अच्छा रहेगा।