Tuesday, November 04, 2008

तुम नहीं आये


आज फिर शाम हुई

और तुम नहीं आये

आसमां की लाल बिंदी

छूने चली भवें क्षितिज की

और कुछ झोंके हवा के

ढेरों भीगे पल ले आये

पर तुम नहीं आये



चल पड़ा ये मन अचानक

उसी पेड़ के नीचे से गुज़रा

कुछ सूखे पत्ते पड़े थे नीचे

और एक पहचानी खुश्बू आ लिपटी

वैसा ही एक पत्ता कबसे

मेरे सपनों के पास रखा है

कभी रेत की सूखी आँधी में

जाने क्यों मचल उठता है

उड़ता है गोल गोल और

उस खुश्बू से जा उलझता है

जैसे उलझा करते थे कभी

झूठी कहानियों पे हम भी

आज पत्ते क्यों चुपचाप पड़े हैं

कैसे उस खुश्बू को समझायें

शाम वही पर तुम नहीं आये



गुज़रा अभी मेरे पास से एक पल

हल्की सी दस्तक दे गया वो

गुनगुना रहा था वही धुन जिसपे

हम दोनों साथ चले थे कभी

कितने बेसुरे लगते थे तुम

मेरा सुर हँसता था तुम पर

आज भी वो ढुँढ रहा तुम्हें

अब कैसे उस सुर को समझायें

शाम हुई तुम क्यों नहीं आये...
(पुरानी एक कविता)

5 comments:

Dr. Amar Jyoti said...

सुकुमार भावों की उतनी ही सुकुमार अभिव्यक्ति!
बधाई।

MANVINDER BHIMBER said...

कितने बेसुरे लगते थे तुम

मेरा सुर हँसता था तुम पर

आज भी वो ढुँढ रहा तुम्हें

अब कैसे उस सुर को समझायें

शाम हुई तुम क्यों नहीं आये...
बधाई।

surendra said...

Aapki kavita bahut acchi lagi.
Ise padhkar mujhe kuch yaad aa gaya.
aasha hai aap aage bhi likhti rahengi.

रंजना said...

वाह ! बहुत ही सुंदर रचना.सुकोमल भाव मर्म तक सीधे पहुँच जाते हैं.बहुत सुन्दरता से भावों को शब्दों में पिरोया है आपने.

Dr. Sudha Om Dhingra said...

सुकोमल भावनाओं से गुंथी सुंदर रचना
बधाई---
सुधा