Sunday, November 30, 2008

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं






बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं

मेरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जानो ईमां हैं
निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं

फ़िराक़ अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर
कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं

(कुछ और शेर इसी ग़ज़ल के)

खु़द अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होता
उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं

हमारी हर नज़र तुझसे नई सौगंध खाती है
तो तेरी हर नज़र से हम नया पैग़ाम लेते हैं

--फ़िराक़ गोरखपुरी

(आवाज़ जगजीत-चित्रा)

4 comments:

Anonymous said...

तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं

मेरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जानो ईमां हैं
निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं
waah bahut badhiya

नीरज गोस्वामी said...

तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं
फिराक साहेब की इस ग़ज़ल का जवाब नहीं और इसे गाया भी क्या खूब है जगजीत चित्र जी ने...
नीरज

राकेश खंडेलवाल said...

चलो फिर यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें
कम अज कम एक चेहरा तो पहचाना हुआ होगा
( दुष्यंत)

यादें ताजा करने का धन्यवाद

पाराशर गौड़ - हिन्दी राइटर्स गिल्ड said...

Manoshiji

Hirdya se aabhar...

Gazal ke bol, sathe umdaa aawazz .. dono mikar ek chaap chd de te hai hirdya per...

parashar