Monday, December 01, 2008

ग़ज़ल- डूबना था हमको देखो, पर किनारा बन गये



जो अंधेरों से उठे तो फिर उजाला बन गये
क्या हुआ 'गर जुगनु थे कल, अब सितारा बन गये


जब उठा तूफ़ां तो हम सैलाब से बहने लगे
डूबना था हम को देखो पर किनारा बन गये


सोचते थे इस जहां में हम सभी से हैं जुदा
राह चल के दूसरों की हम ज़माना बन गये



इस ज़मीं पर गिर के देखा, स्याह रातें काट ली
उठ गये फिर आस्मां में और हाला बन गये


(हाला- चंद्रमंडल/halo)


'दोस्त' तुम को तो भरोसा था बड़ा तदबीर पर
तुम भी क्या तक़दीर का खु़द ही निशाना बन गये?



(तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ मैं महावीर शर्मा जी और प्राण शर्मा जी का जिन्होंने मेरी इस ग़ज़ल को सँवारने में मेरी मदद की साथ ही अनूप शुक्ल जी को धन्यवाद जिन्होंने हमेशा एक सच्चे दोस्त की तरह मुझे प्रोत्साहन दिया है, चाहे वो कोई लेख अप्रूव करवाना हो या कोई साधारण सी पोस्टिंग ही सही...)

9 comments:

नारदमुनि said...

bahut khub narayan narayan

mehek said...

bahut hi achhi gakal khas karke aakhari sherbahut pasand aaya.

mehek said...

bahut hi achhi gazal khas karke aakhari sher bahut pasnad aaya.

कंचन सिंह चौहान said...

sundar shabda...khubsurat gazal

नीरज गोस्वामी said...

सोचते थे इस जहां में हम सभी से हैं जुदा
राह चल के दूसरों की हम ज़माना बन गये
क्या बात है...बहुत खूबसूरत शेर है...ऐसे गुणी जन आप के गुरु हैं तो ग़ज़ल अच्छी होनी ही है...वाह.
नीरज

डा. अमर कुमार said...


एक खूबसूरत पेशकश !

महावीर said...

सारे ही अशा'र पहले भी बहुत पसंद थे और अब यहां इस ख़ूबसूरत तस्वीर के साथ तो मज़ा आगया।
देखो, इस ग़ज़ल के चार चांद लग जाएंगे अगर इसे तुम्हारी मधुर सुर में सुनने का अवसर मिले। 'अर्श' साहेब ने तो तुम्हारी आवाज़ के लिए मेरे ब्लॉग पर एक 'ख़िताब' भी दे दिया हैः- 'मख़मली आवाज़'!
महावीर
http://mahavir.wordpress.com

dr. ashok priyaranjan said...

अच्छा िलखा है आपने । भावों को प्रभावशाली ढंग से अिभव्यक्त िकया है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-उदूॆ की जमीन से फूटी गजल की काव्यधारा । समय हो तो पढें और प्रतिक्रिया भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

MUFLIS said...

jo andheroN se uthe to phir ujala bn gaye..(kya hua gar jugnu the kal) yahaaN kuchh khatkaa.sa lagta hai...guruji ne to theek samjhaya hoga, aapse hi kaheeN chook ho gayi
lagti hai. yooN kr ke dekheiN...
(kya hua jugnu tthe kal tak, ab sitara bn gaye).. ya..(kya hua jugnu agar tthe...)
aur ye sher bahot hi khoob kahaa aapne...Dost tumko to bhrosa tha bahot tadbeer pr , tum bhi kya taqdeer ka khud hi nishana bn gaye.
Ek achhi aur pur.asar ghazal kehne ke liye mubaarakbaad.
---MUFLIS---