Wednesday, January 21, 2009

ग़ज़ल- ये तो तुमने ज़्यादती की है


मनाया जाए मातम हर किसी ग़म का ज़रूरी है
छुपा दो दर्द ’गर हँस कर, कहीं इक टीस रहती है

कोई बतलाये हमको क्यों मुहब्बत रास नहीं आती
वगरना इश्क़ में हमने कहाँ कोई कमी की है

भरम टूटा जो उसके झूठे वादों का तो अब उससे
मुहब्बत है कि नफ़रत है अभी दिल में ठनी सी है

कभी क्या तुम हमें करते नहीं हो याद बिल्कुल भी
यहाँ आ़लम तो ये है कि चिता इक जल रही सी है

जो आये हैं यहाँ तक बेखु़दी में ’दोस्त’ हम, ला के
लहूलूहान छोड़ा ये तो तुमने ज़्यादती की है
.
बहर- मफ़ाईलुन x ४
वज़न-१२२२ x ४
(बहरे हज़ज़ मुसमन सालिम)

(उर्दू के जानकार जानते होंगे कि उर्दू के हिसाब से मत्ले के क़ाफ़िये में एक छोटा सा दोष है, मगर हिन्दी में ये ठीक है)

7 comments:

Udan Tashtari said...

उर्दु तो उर्दु के जानकार जाने, बताती नहीं तो हमें तो पता भी न चलता कि कोई दोष है..बस, वाह कहते..सो तो अभी भी कह रहे हैं. :)

"अर्श" said...

AAPKI GAZALEN HAMESHA SE HI ACHHI HOTI HAI ,WO DOSH TO MARTA BHAR KA HAI, WAKAI AAPNE SAHI KAHA HAI KE WO HINDI ME PATA NAHI CHALEGA,..
BAHOT HI UMDA GAZAL ... DHERO BADHAI AAPKO...


ARSH

Pratap said...

मनाया जाए मातम हर किसी ग़म का ज़रूरी है
छुपा दो दर्द ’गर हँस कर, कहीं इक टीस रहती है
कभी क्या तुम हमें करते नहीं हो याद बिल्कुल भी
यहाँ आ़लम तो ये है कि चिता इक जल रही सी है
जो आये हैं यहाँ तक बेखु़दी में ’दोस्त’ हम, ला के
लहूलूहान छोड़ा ये तो तुमने ज़्यादती की है
.....
बहुत ही हृदयस्पर्शी हैं ये पंक्तियाँ.
हुमा परवीन की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं-
सच है की प्यार का इक रिश्ता है जिंदगी
लेकिन तेरे बगैर तमाशा है जिंदगी

JHAROKHA said...

Manoshi ji,
Pahle to main apko blog par ane ke liye dhanyavad de rahee hoon.
Apkee ye gazal to vakai bahut achchhe bhavon kee abhivyakti hai.Badhai.
Poonam

डॉ .अनुराग said...

khoob.......

गौतम राजरिशी said...

बहर कैसा कहां का काफ़िया,मतलब है बातों से
गुनेंगे हम, गज़ल तेरी जो भी अब हम से कहती है

....बहुत ही प्यारी गज़ल बनी है मनोशी

वो क्या कहते है इंगलिश में hats off

प्रकाश गोविन्द said...

बहुत खूब !

वाह ,,,,,,वाह ,,,,,,वाह

अहसासों से लबालब गजल !

मैं तो इस गजल की धुन बना रहा हूँ !