Saturday, January 30, 2010

ओ रे बचपन!

ओ रे बचपन जीवन के संग
क्यों कट्टी मिट्ठी करता है

बूढ़ी कबड्डी
चक्कर घिन्नी
अक्कड़ बक्कड़
बम्बई दिल्ली
पुलिस पकड़ती
अंडा चोरी
मां से लड़कर
डंडा गिल्ली
ओ रे बचपन छूट गया मन
तेरी कुटिया कहीं पड़ा है

छ: बाराती
दो की शादी
चांद की नगरी
की शहज़ादी
बाँहों की डोली
में चढ़ कर
मैके से मैके
की सवारी
ओरे बचपन सादा जीवन
किस खूँटी से टंगा पड़ा है

नीली बारिश
पीली छतरी
छप-छप जूते
गुस्सा बदरी
मुट्ठी में
मखमल का कीड़ा
कीचड़, छीटें
मैला कुरता
ओ रे बचपन सूख गया तन
भीगा मन तुझ में अटका है

10 comments:

Udan Tashtari said...

आनन्द आया-बेहतरीन अभिव्यक्ति बचपन को याद करते!

निर्मला कपिला said...

नीली बारिश
पीली छतरी
छप-छप जूते
गुस्सा बदरी
मुट्ठी में
मखमल का कीड़ा
कीचड़, छीटें
मैला कुरता
ओ रे बचपन सूख गया तन
भीगा मन तुझ में अटका है
वाह बहुत सुन्दर रचना बचपने की याद दिला दी। शायद जीवेन के स्वर्निम पल होते हैं बचपन । शुभकामनायें

दिगम्बर नासवा said...

बचपन के कितने अनछुए पल आँखों से गुज़र गये ............ बहुत ही गहरी अनुभूति लिए है ये रचना ..... बचपन के खिलोनों की तरह सॅंजो कर रखने वाली रचना ..........

श्रद्धा जैन said...

छ: बाराती
दो की शादी
चांद की नगरी
की शहज़ादी
बाँहों की डोली
में चढ़ कर
मैके से मैके
की सवारी
ओर बचपन सादा जीवन
किस खूँटी से टंगा पड़ा है

sunder abhivaykti

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपने बहुत प्यारी बालकविता लिखी है!
बधाई!

essbeev said...

बहुतही सुन्दर रचना!!

JHAROKHA said...

manasi ji
aapane to apani bachapan ki
kavita se hamen yaadon ke tale chhupi
maasumiyat bhare bachapan main punah vapas pahuncha diya.jo sabhi ke liye ek anmol ratan hai.
poonam

psingh said...

मानसी जी
बेहद खुबसूरत रचना
बहुत बहुत आभार ग़ज़ल

बेचैन आत्मा said...

यह गीत भी अच्छा है मगर इस में एक लाईन नहीं जम रही है...
तेरी कुटिया कहीं पड़ा है
'कुटिया' है तो पड़ी है होना चाहिए ..
मेरे विचार से ऐसा होता तो अधिक अच्छा होता..
तू कुटिया में व्यर्थ पड़ा है

...यह मेरी माथापच्ची है ..मैं गलत भी हो सकता हूँ.

मानसी said...

बे.आ. जी,
जो मन छूट गया है, वह मन तेरी कुटिया में कहीं पड़ा है।

सादर
मानोशी