Friday, April 16, 2010

विरह गीत- दीप बना कर याद तुम्हारी


दीप बना कर याद तुम्हारी, प्रिय, मैं लौ बन कर जलती हूँ
प्रेम-थाल में प्राण सजा कर लो तुमको अर्पण करती हूँ।

अकस्मात ही जीवन मरुथल में पानी की धार बने तुम,
पतझड़ की ऋतु में जैसे फिर जीवन का आधार बने तुम,
दो दिन की इस अमृत वर्षा में भीगे क्षण हृदय बाँध कर,
आँसू से सींचा जैसे अब बन कर इक सपना पलती हूँ।
दीप बना कर...

मेरे माथे पर जो तारा अधरों से तुमने आँका था,
पाकर के वह स्पर्श मृदुल यह गात रक्त्मय निखर उठा था,
उन चिह्नों को अंजुरि में भर पीछे डाल अतीत अंक में,
दे दो ये अनुमति अब प्रियतम, अगले जीवन फिर मिलती हूँ।
दीप बना कर...

तुम रख लेना मेरी स्मृति को अपने मन के इक कोने में,
जैसे इक छोटा सा तारा दूर चमकता नील गगन में,
दग्ध ह्रदय में धधक रहे आहत पल के दंशों को अपने ,
आहुति के आँसू से धो कर आंगन लो अब मैं चलती हूँ।
दीप बना कर...

17 comments:

Suman said...

nice

वाणी गीत said...

दीप बना कर यादों का किसी के विरह में जलना ...
आहुति के आंसू ...या आंसुओं की आहुति से आँगन धोना ...
बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...!!

JHAROKHA said...

तुम रख लेना मेरी स्मृति को अपने मन के इक कोने में,
जैसे इक छोटा सा तारा दूर चमकता नील गगन में,
मौन रो रहे दंश हृदय के, घाव रक्त से ज्यों हो लथपथ ,
आहुति के आँसू से धो कर आंगन लो अब मैं चलती हूँ।
दीप बना कर...

मानोशी जी, बहुत ही सुन्दर और संवेदनात्मक विरह गीत लिखा है आपने। आज अतुकान्त कविताओं के युग में ऐसे गीत बहुत कम लिखे जा रहे हैं। काफ़ी दिनों से आप मेरे ब्लाग पर भी नहीं आईं-----? पूनम

संजय भास्कर said...

हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

संजय भास्कर said...

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

विनोद कुमार पांडेय said...

मेरे माथे पर जो टीका होठों से तुमने टाँका था,
अंग-अंग हर स्पर्श तुम्हारा लाल दग्ध हो मुखर उठा था,
उन चिह्नों को अंजुरि में भर पीछे डाल अतीत अंक में,
दे दो ये अनुमति अब प्रियतम, अगले जीवन फिर मिलती हूँ

प्रेम की एक बेहतरीन अभिव्यक्ति...बढ़िया गीत...प्रस्तुति के लिए आभार

Udan Tashtari said...

मौन रो रहे दंश हृदय के, घाव रक्त से ज्यों हो लथपथ ,
आहुति के आँसू से धो कर आंगन लो अब मैं चलती हूँ।


-ओह! भावपूर्ण रचना!

दिलीप said...

bahut bahut khoobsoorat..prem me tyaag...aur fir apni upasthiti banaye rehne ka prayas...waah...

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

Shekhar Suman said...

bahut hi achhi rachna....
mere blog mein is baar nayi duniya...
http://i555.blogspot.com/

Shekhar kumawat said...

तुम रख लेना मेरी स्मृति को अपने मन के इक कोने में,
जैसे इक छोटा सा तारा दूर चमकता नील गगन में,
मौन रो रहे दंश हृदय के, घाव रक्त से ज्यों हो लथपथ ,
आहुति के आँसू से धो कर आंगन लो अब मैं चलती हूँ।
दीप बना कर...

bahut sundar rachna
bandhai aap ko is ke liye



shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com

श्रद्धा जैन said...

मेरे माथे पर जो तारा अधरों से तुमने आँका था,
अंग-अंग हर स्पर्श तुम्हारा लाल दग्ध हो मुखर उठा था,
उन चिह्नों को अंजुरि में भर पीछे डाल अतीत अंक में,
दे दो ये अनुमति अब प्रियतम, अगले जीवन फिर मिलती हूँ।

bahut bahut achcha laga ye geet
Maansi si
dard bhi hai pyaar bhi hai

bichadne ki anumati ...
aur milne ka wada bhi

Shekhar kumawat said...

bahuUT KHUB

SHEKHAR KUMAWAT

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Shekhar kumawat said...

bahuUT KHUB

SHEKHAR KUMAWAT

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Shekhar kumawat said...

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प्रवीण पाण्डेय said...

प्रशंसा की अभिव्यक्ति के शब्द नहीं हैं । इस भाव को गुंजायमान करती सुन्दरतम रचना ।

सुमन'मीत' said...

बेहद भावपूर्ण रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सिन्दर रचना के लिए बधाई!