पिछले सप्प्ताह बर्फ़ पड़ी। बर्फ़ पड़ने के बाद वाले दिन, जब पूरी ज़मीन ढकी होती है सफ़ेद रूई से, और निकलती है खूबसूरत झिलमिलाती धूप, जब -२५ डिग्री सेलसियस तक तापमान नीचे जाता है, तब कुछ ऐसी होती है ठंड की सुबह, दोपहर और रात यहाँ, कनाडा में...
शीत का आँचल फिर से फहरा|
जैसे मोती पात जड़े हैं,
हीरक कण झरते, बिखरे हैं,
डाली-डाली लुक-छुप लुक-छुप
दल किरणों के खेल रहे हैं,
गोरे आसमान के सर पर
धूप ने बाँधा झिलमिल सेहरा |
शीत का आँचल फिर से फहरा |
बूढी सर्दी हवा सुखाती,
कलफ़ लगा कर कड़क बनाती,
छटपट उसमें फ़ँसी दुपहरी
समय काटने ठूँठ उगाती,
चमक रहा है सूर्य प्राणपन,
देखो उसका विफल सा चेहरा |
शीत का आँचल फिर से फहरा|
रात कँटीली काली डायन,
सहमे घर औ’ राहें निर्जन,
है अधीन जादू निद्रा के
सभी दिशायें, जड़ औ’ जीवन,
अट्टहास करती रानी जब
सारा जग ज्यों जम कर ठहरा |
शीत का आँचल फिर से फहरा |

4 comments (click here to comment):
यह ईश्वर की सुख संरचना..
बहुत खूबसूरत चित्रण
अपनी सुविधा से लिए, चर्चा के दो वार।
चर्चा मंच सजाउँगा, मंगल और बुधवार।।
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच।
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
choti si kavita me sardi ka ek puraa din beet gayaa....sundar sahbd.
subah aayi ...dopahar hui .....fir raat .....silsilewaar
carefully,beautifully and brillianlly structured.
bas ek shikaayat hai ki subah me heere the moti the sehraa thaa,aakhri para me to sardi ko "raani" kaha....ye dopahar me bechaari बूढी kyo ho gayi??!!
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