Friday, March 08, 2013

नारी दिवस पर


मैं जब शाख़ पर घर बसाने की बात करती हूँ
पसंद नहीं आती 
उसे मेरी वह बात,
जब आकाश में फैले 
धूप को बाँधने के स्वप्न देखती हूँ,
तो बादलों का भय दिखा जाता है वह,
उड़ने की ख़्वाहिश से पहले ही 
वह चुन-चुन कर मेरे पंख गिनता है,
धरती पर भी दौड़ने को मापता है पग-पग,
और फिर जब मैं भागती हूँ,
तो पीछे से आवाज़ देता है,
मगर मैं नहीं सुनती
और अकेले जूझती हूँ,
पहनती हूँ दोष,
ओढ़ती हूँ गालियाँ,
और फिर भी सर ऊँचा कर
खुद को पहचानने की कोशिश करती हूँ
क्या वही हूँ मैं? 
चट्टान, पत्थर, दीवार ...
अब कुछ असर नहीं करता...
मगर मैंने तय किये हैं रास्ते
पाई है मंज़िल
जहाँ मैं उड़ सकती हूँ, 
शाख़ पर घर बसाया है मैंने
और धूप मेरी मुट्ठी में है...

4 comments:

अल्पना वर्मा said...

नारी दिवस मात्र औपचारिकता है ,सही अर्थों में हर स्त्री को यथोचित सम्मान मिलता नहीं है .
कविता में आप ने नारी की जद्दोजहद को बखूबी उभरा है..वह एक कदम आगे बढ़ाती है है दो कदम पीछे खिंच लिया जाता है.
लेकिन फिर भी आज उसकी स्थिति कल से बहुत बेहतर है.सार्थक कविता.

प्रवीण पाण्डेय said...

मन का विश्वास दृढ़ करती कविता..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ...!

दिगम्बर नासवा said...

नारी मन में जब विश्वाल आ जाता है तो वो आसमां को पार कर लेती है ... आशा वादी ओर विश्वास के कंदों पे रक्खी रचना ... बहुत उम्दा रचना ...