Tuesday, September 25, 2012


एक जीवन जी गई...

पल-पल जीया
बूँद-बूँद पीया
मिट्टी से हवा तक
पानी से आग तक
बादल से धरती तक
लपेट लिया सब कुछ
और फिर भी जान न सकी
तुम्हारे अस्तित्व की वजह,
मेरे जीवन का कारण,
और हम दोनों के होने का रहस्य...
आसपास रहा तुम्हारे और मेरे सिवा
बहुत कुछ...
और फिर भी बस मैं और तुम ही रहे...!

13 comments:

Manu Tyagi said...

बहुत बढिया पंक्तिया

वाणी गीत said...

फिर भी बस मैं और तुम ही रहे !
बहुत खूब !

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत गहरी पंक्तियाँ..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 27-09 -2012 को यहाँ भी है

.... आज की नयी पुरानी हलचल में ....मिला हर बार तू हो कर किसी का .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

भले ही छोटी हो मगर है बहुत भावप्रणव रचना!

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 29/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुंदर ...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया

सादर

Anand Dwivedi said...

दो तो फिर भी है ...

Reena Maurya said...

गहन भाव लिए
सुन्दर अभिव्यक्ति..
:-)

Reena Maurya said...

गहन भाव लिए
सुन्दर अभिव्यक्ति..
:-)

Mukesh Kumar Sinha said...

और फिर भी बस मैं और तुम ही रहे...!
kya kahen hain...
behtareen..

DINESH PAREEK said...

क्या खूब कहा आपने वहा वहा बहुत सुंदर !! क्या शब्द दिए है आपकी उम्दा प्रस्तुती
मेरी नई रचना
प्रेमविरह
एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ