Wednesday, October 26, 2005

कुंडली मिलन की खास बातें--(आगे और)...



पुरुष






स्त्री







भाग ८ (भाग ७ यहां देखने के लिये यहं क्लिक करें)

आज इस लेख को खतम कर देने का प्रयास करूंगी। मंगल-शुक्र, शनि-मंगल,राहु-मंगल के बाद अब हम देखेंगे कि मन या आत्मा का मिलन कैसे देखा जायेगा। ये मिलान सिर्फ़ दंपतियों के लिये ही नहीं बल्कि दोस्तों के लिये भी आज़माया जा सकता है।

देखें कि एक पत्रिका का सूर्य दूसरे पत्रिका के चंद्र से क्या रिश्ता बनाता है। अगर ये नव-पंचम ( ५:९) का रिश्ता बनाता है तो सबसे उत्तम होता है। ऊपर के चित्र में पुरुष का सूर्य अंक २ या वृषभ में सातवें स्थान पर है और स्त्री का चंद्रमा अंक ६ पहले स्थान पर है। तो २ से ६ (२,३,४,५,६) ५ स्थान गिने आपने अर्थात नव-पंचम का मिलन है जो बहुत ही अच्छा माना जायेगा दोस्ती के लिये। इसी तरह स्थान देखने पर सूर्य और चंद्रमा का रिश्ता १:७ का है जिसे कहते है कि domination with respect का रिश्ता होगा। ६:८ और २:१२ बुरा माना जाता है, ४:१० भी अच्छा नहीं माना जाता पर फिर वही अधिकार dominance वाली बात आ जाती है । इसी तरह पुरुष का चंद्रमा और स्त्री का सूर्य भी देखें। नवमांश चक्र मिलाना न भूलें।

इसके अलावा, पुरुष का और स्त्री का सातवे स्थान का अधिपति क्या रिश्ता रखता है देखना चाहिये । ५:९ या एक ही स्थान पर हों तो सबसे अच्छा, ६:८, २:१२ बुरा माना जाता है।

दोनों के लग्नधिपति किस स्वभाव के हैं ये भी देखना चाहिये। अब और विस्तार से नहीं बता रही यहां मगर हर राशि का अपना स्वभाव माना गया है, आग्नेय, जल, पवन, भूमि। तो अगर एक का लग्न आग्नेये राशि है और दूसरे की जल तो कैसे निभ सकती है?

इतने गुण खास कर शुक्र-मंगल मिलन, राहु/शनि-मंगल मिलन, सूर्य-चंद्र मिलन आपने देख लिया तो काफ़ी कुछ बातें cover हो जाती हैं।

अगली बार किसी और शीर्षक पर लिखने की कोशिश करूंगी...

समाप्त

Thursday, October 20, 2005

कुंडली मिलन की खास बातें--(आगे और)...


पुरुष








स्त्री







भाग ७

आइये अब आगे बढें--

२. हमने शुक्र और मंगल का मिलन पिछले अंक में देखा। अब चलते हैं आगे।
अगला कदम : पुरुष का शनि और राहु स्त्री के मंगल के साथ हो या मंगल पर दृष्टि रखे। अब जब मैने देखने या दृष्टि की बात कही है तो उसका मतलब भी बताना पडेगा।

ग्रहों की दृष्टि से मतलब है कि हर ग्रह किसी भी पत्रिका में एक निर्धारित स्थान पर अपना प्रभाव छोडता है। इसे ग्रहों का देखना कहते है या ग्रह दृष्टि ( aspect) कहते हैं।
हर ग्रह अपने स्थान से सातवें स्थान को देखता है मगर कुछ ग्रहों की विशेष दृष्टि होती है। जैसे कि गुरु या ज्यूपिटर अपने से सातवें स्थान के अलावा पांचवे व नौवें स्थान को भी देखता है। इसे समझने के लिये ऊपर पुरुष वाले चक्र को देखें... यहां गुरु बारहवें स्थान पर है ( जो कि ७ अंक है अर्थात तुला राशि उस स्थान का ग्रहाधिपति हुआ)। तो ये गुरु अपने से सातवें, पांचवें और नौवें स्थान को देखेगा। अर्थात इस गुरु की दृष्टि इस चक्र के छठवें ( 7th aspect या दृष्टि, ऐसे गिनें-१२,१,२,३,४,५,६-हुये न ७ स्थान यानि सातवीं दृष्टि), चौथे ( 5th aspect, ऐसे गिनें-१२,१,२,३,४ ), और आठवें ( 9th aspect, ऐसे गिनें-१२,१,२,३,४,५,६,७,८) स्थान पर होगी।

इसी तरह शनि की भी सातवें दृष्टि के अलावा विशेष दृष्टि होती है- अपने से तीसरे और दसवें स्थान पर , और मंगल की अपने से चौथे और आठवें स्थान पर और राहु की पांचवे, नौवें और बारहवें स्थान पर।

ये भी याद रखें कि राहु की गिनती उल्टी होते है अर्थात दायीं तरफ़।

तो अब आप कुंडली मिलन के लिये पुरुष के शनि को देखेंगे कि क्या ये स्त्री के मंगल पर दृष्टि डालता है? तो ऊपर के चित्र के अनुसार, पुरुष का शनि मेष राशि ( अंक है १) में है और स्त्री का मंगल मकर ( अंक है १०) में। तो गिने १ से १० तक... अरे हां...शनि की दसवीं दृष्टि तो है ( इसका मतलब होता है कि स्त्री पुरुष के प्रति आकर्षित रहेगी) , स्थान के अनुसार भी देखें। पुरुष का शनि है छ्ठें स्थान पर और स्त्री का मंगल है पांचवें स्थान पर तो संबंध हुआ २:१२ का जो अच्छा नहीं माना जाता। मगर नवमांश देखना भी ज़रूरी है। और क्योंकि एक शर्त पूरी होती है, कहा जा सकता है कि स्त्री का इस पुरुष के लिये आकर्षण काफ़ी रहेगा।

इसी तरह पुरुष के राहु की दृष्टि भी देखें स्त्री के मंगल पर, राशि से, स्थान से और नवमांश से। । ये भी इसी बात का द्योतक है कि स्त्री का पुरुष के लिये कितना आकर्षण रहेगा। ऊपर के चक्र में खुद ही देखें कि क्या स्थिति है?

अब मन और आत्मा की मिलन के लिये क्या क्या देखें?

क्रमश: ( कोई भी प्रश्न आप comments में पूछ सकते हैं।)

Saturday, October 15, 2005

कुंडली मिलन की खास बातें--(आगे)

पुरुष





स्त्री











भाग ६
आइये अब इन दो कुंडलियों की मदद से कुंडली मिलाने की विधि सीखें। मैने पहले ही कहा है कि ये विधि ३६ गुण मिलन की विधि नहीं है मगर काफ़ी प्रभावी है। चलिये ऊपर की दो पत्रिकाओं को यूं मान लिया जाये कि पहली वाली कुंडली पुरुष की है और दूसरी वाली किसी स्त्री की।

हम अभी कुंडली के लग्न चक्र को मिला रहे हैं मगर ध्यान रहे कि नवमांश को भी इसी तरह देखना होता है। सिर्फ़ लग्न चक्र को देख कर निर्णय दे देना ठीक नहीं। और ये भी ध्यान रहे कि जो कुछ मूलभूत बातें यहां बतायी जा रही हैं सिर्फ़ उतने से ही दो जीवन सुखी रह पायेंगे या नहीं का निर्णय नहीं लिया जा सकता, मगर एक अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों का एक दूसरे के प्रति कैसा रवैया रहेगा।

१.
(क) स्त्री के लिये उसका मंगल शादीशुदा ज़िन्दगी, पुरुष के साथ संपर्क इत्यादि के लिये मह्त्व्पूर्ण माना जाता है। और वहीं शुक्र पुरुष के लिये। मंगल और शुक्र के मिलन को देख कर दोनों का एक दूसरे के लिये शारीरिक आकर्षण का अनुमान किया जाता है । तो आप देखें कि स्त्री का मंगल कहां है ---ऊपर पत्रिका में देखें --- ये मंगल १० यानि कि मकर में है। और पुरुष का शुक्र देखें, ये शुक्र पुरुष के कुंडली में ३ यानि कि मिथुन में है। अब गिनें १० से ३ तक...१०, ११, १२, १, २, ३ कितने स्थान गिने आपने? ६ स्थान, ठीक? अर्थात ये ६:८ ( कुल १२ राशियां होती हैं) का संपर्क हुआ जो कि बुरा माना जाता है। २:१२ का संपर्क भी अच्छा नहीं माना जाता। तो अच्छा क्या है? अगर दोनों ग्रह एक ही राशि में हों अर्थात पुरुष का शुक्र भी १० या मकर में होता या १:७ का सम्पर्क अर्थात अगर पुरुष का शुक्र ४ या कर्कट में होता ( गिन के देखें १० से ४ ) तो इस जोडी में शारीरिक आकर्षण बहुत ज़्यादा होता। कोई और तरह का संपर्क बुरा न हो मगर वो चुम्बकीय आकर्षण भी न हो शायद।
(ख) सिर्फ़ राशि स्थान ही नहीं घर भी देखिये। यहां स्त्री का मंगल पांचवे स्थान पर है और पुरुष का शुक्र आठवें स्थान पर ( आपको अब तक स्थान या घर देखना आना चहिये)। तो संपर्क हुआ...५ से ८ अर्थात ४:१० ह्म्म्म...आप ही सोचिये क्या होगा? क्या चुम्बकीय आकर्षण होगा? माना ये जाता है कि एक ही स्थान पर या १:७ के इस तरह के मंगल-शुक्र के संपर्क से पुरुष स्त्री के प्रति बहुत आकर्षित रहता है।
(ग) आपके पास नवमांश चक्र भी होने चाहियें। यही चीज़ अब नवमांश में देखिये। अब मान लीजिये कि नवमांश तो मिल जाता है मगर राशि चक्र वाली कुंडली नहीं मिलती..तब? तब आपको सोच समझ कर, और भी बहुत सारी चीज़ें मिला कर निर्णय लेना होगा। अभी तो हमने सिर्फ़ एक ही चीज़ देखी है- शुक्र और मंगल का मिलन।
मैने पाश्च्चात्य ज्योतिषियों को स्त्री का शुक्र और पुरुष का मंगल भी मिलाते देखा है ठीक इसी तरह और कई कामयाब जोडे भी देखे हैं। कुंडली मिलन के लिये मैं व्यक्तिगत रूप से राय दूंगी कि इस तरह भी मिला के देखें। शुक्र-मंगल का मिलन एक दूसरे के लिये आकर्षण बढाता है।

और क्या क्या देखें?

अगले भाग में और.... ( इस लेख से संबंधित कोई भी प्रश्न आप comments में कर सकते हैं)

क्रमश:

Friday, October 14, 2005

कुंडली मिलन की खास बातें

भाग ४ के लिये यहां देखें

भाग ५

अभी बहुत कुछ बाकी है बेसिक्स में मगर चलिये अभी एक सरल तरीके से पहले कुंडली मिलाने की विधि के बारे में चर्चा करें। इस लेख को पढने के बाद आप अंधाधुंध कुंडली मिलाने मत लग जाइये, क्योंकि इतना असान भी नहीं होता कि एक लेख पढ कर कुंडली मिलानी आ जाये।

हमारे देश में शादी से पहले कुंडली मिलन का चलन है। आज कल इन बातों पर ज़्यादा यकीं नहीं किया जाता मगर एक समय था ( अभी भी कई जगह) बिना कुंडली के मिले शादियां होती ही नहीं थीं। मगर अपने व्यक्तिगत अनुभव से देखा है मैने कि ३६ गुणों के कुंडली मिलन के बावजूद शादियां टूटती हैं और कुंडली बिना मिले भी कुछ शादियां कामयाब होती हैं। कुछ दिनों पहले मेरा संपर्क एक बहुत ही कामयाब ज्योतिषी से हुआ जो दरअसल एक अभियंता हैं मगर ज्योतिष विद्या में पारंगत। कहते हैं उनकी भविष्यवाणियां खाली नहीं जाती। आजकल उन्हीं से सीख रही हूं ( बल्कि उनके एक छात्र से)। कई जन्म पत्रिकाओं को देखने के बाद लगा कि उनके कुंडली मिलाने की विधि में कोई तो विशेष बात है जो उनके बताये गये तरीके से मिलायी गयी कुंडलियों की जोडियां कामयाब रही हैं। आगे और जैसे जैसे ज़्यादा अनुभव होगा, तब इस विधि पर और विश्वास बढेगा।

यहां मैं सिर्फ़ कुछ बहुत बेसिक बातें बता रही हूं ( ध्यान में रखते हुये कि इस लेख को कोई भी पढे तो समझ सके), इसके अलावा व्यक्तिविशेष के जन्मपत्रिका पर भी निर्भर करता है कि उसकी शादीशुदा ज़िन्दगी या रिलेशनशिप्स कैसे होंगे। उस पर भी बाद में कभी लिखूंगी...

अगर आपने इस लेख का भाग १ और भाग २ पढा है तो आपको इस लेख को समझने में कोई परेशानी नहीं होगी।
सबसे पहले ये याद रखें कि किसी भी जन्मपत्रिका को बनाने और सही भविष्यवाणी करने के लिये सही जन्म समय बहुत ज़रूरी होता है।
क्योंकि आजकल बहुत अच्छे साफ़्ट्वेयर उपलब्ध हैं इसलिये मैं अभी ज़्यादा विस्तार में नहीं जाऊंगी मगर यहां ये बताना ज़रूरी है कि एक तो होती है - राशि जन्म पत्रिका ( जो साधारणत: जन्म कुंडली कहलाती है) और फिर माहिर ज्योतिषी उसी जन्मकुंडली को कई हिस्सों में बांट कर और कई जन्मपत्रिकायें बनाते हैं जिन्हें वर्ग पत्रिकायें कहते हैं और बहुत सही भविष्यवाणी करने की चेष्टा करते हैं। ऐसे ही जब किसी कुंडली के किसी घर (स्थान) को नौं हिस्सों में बांट कर एक और पत्रिका बनायी जाये, उसे नवमांश पत्रिका कहते हैं। ये कुंडली भी उसी तरह से पढी जाती है जैसे जन्मकुंडली। अच्छे ज्योतिषी, बिना नवमांश को देखे कभी निर्णय नहीं देते। और इस नवमांश कुंडली की भी अहमियत जन्म कुंडली जितनी ही होती है। अब ये नवमांश कहां से आये? कौन बनाये? तो आप जब किसी अच्छे साफ़्ट्वेयर में जन्मपत्रिका बनायेंगे तो वो अपने आप नवमांश कुंडली भी तैयार कर देगी।

अब आइये देखते हैं कि कैसे दो व्यक्तियों की कुंडलियों को मिलाया जाये--

क्रमश: (अगले भाग में)...तब तक भाग १ और २ को पढ कर रखें।

Thursday, October 13, 2005

आवारा बदरी
















"घर से निकली छुप कर एक बदरी
इक आवारा हवा ने कलाई पकडी
भोली अल्हड कुछ यूँ मचली
हाथ थाम कर संग उसके चली
किसी अनजाने नशे में चूर
दूर बहुत दूर....

प्यासी धरती मिली राह में
भीगने की उसकी चाह में
संग रोयी उसके हल्के हल्के
बस एक दो मोती छलका के
खिंची चली ज्यों संग एक डोर
दूर बहुत दूर...

रुपहली चांदनी हौले से मुस्कायी
कहा मेरे संग न इक रात बितायी
एक क्षण मुझसे आँख मिचौली
खेली फिर हुई तुम परायी
हल्के से मुस्का कर बदली चली उड़
दूर बहुत दूर...

आस्मां में मुस्काते धनुष के
एक रंग ने कहा ताव में आ के
पास न आना मेरे प्रीतम के
सुन्दर-सलौने हैं मेरे मीत मन के
कलूटी तू ने उनका रंग लूटा
तू आवारा तेरा प्यार भी झूठा
बरस गयी तब काली बदरी
रंग छोड कर ज्यों हुई बिरही
और चली उदास घर की ओर
दूर बहुत दूर....

Wednesday, October 12, 2005

विभिन्न राशियों की विशेषतायें...(आगे)

भाग ३ के लिये यहां देखें

भाग ४

आइये आब आगे की राशियों को देखें:

तुला राशि : तुला राशि का स्वामि है शुक्र। जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है (तराज़ू) ये न्यायवादी होते हैं और हर काम या व्यवहार में सामंजस्य रखने की कोशिश करते हैं। जातक हमेशा सही और गलत के पेच में पडा रहता है मगर सही निर्णय लेता है। ये लोग कला के पुजारी होते हैं । इस राशि के जातक अच्छे प्रेमी, सौन्दर्यप्रिय तथा लोकप्रिय होते हैं। इनकी सुंदर और मनोहर काया होती है।

वृश्चिक राशि: इस राशि का स्वामि है मंगल। भावुक और ईर्ष्यालु ये जातक, क्रोधी भी होते हैं। धन इन्हें उत्तराधिकार में मिलता है। इन्हें प्रेम संबंधों में काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड सकता है। मूडी किस्म के ये लोग अपने निश्चय में दृढ होते हैं। इनके बारे में कहा जाता है कि इनके जीवन की कई बातें गुप्त होती हैं और ये खुली किताब बनना पसंद नहीं करते।

धनु राशि: इस राशि का स्वामि है बृहस्पति। ये जातक अच्छे शिक्षक हो सकते हैं और धर्मभीरु होते हैं। विद्वान व स्वतंत्र विचारों के ये लोग, अच्छे वक्ता होते हैं। साधरणत: अच्छी शादिशुदा ज़िन्दगी गुज़ारते हैं और न्यायवादी होते हैं। इनके कई दोस्त होते हैं और सच्ची बात बड़ी कुशलता से बिना किसी को दु:ख पहुंचाये, कह जाते हैं।

मकर राशि: इस राशि का स्वामि है शनि। अत्यंत बुद्धिमान ये लोग स्वभाव से बेहद स्वार्थी हो सकते हैं। यथार्थवादी ये लोग रिश्तों को सच्चाई से निभाते हैं। इस राशि के जातक किसी भी काम को एकाग्रचित्त हो कर करते हैं। महत्वाकांक्षी ये लोग स्पष्टवक्ता होते हैं। दूरदर्शी ये जातक अपने कामों को पहले से नियोजित कर के ही करते हैं।

कुंभ राशि: इस राशि का स्वामि है शनि। भावुक प्रकृति के ये लोग इन्सानियत की ख़ातिर बहुत कुछ कर जा सकते हैं। शर्मीले भी होते हैं कभी कभी ये लोग और परिवार की ओर से ज़रा सा कम आसक्त मगर स्वाभिमानी। इस राशि के जातक मूडी हो सकते हैं।

मीन राशि: मीन राशि का स्वामि है बृहस्पति। ये लोग बहुत जल्द उत्तेजित हो जा सकते हैं और बेवजह चिन्ता करना इनके प्रकृति में होता है। जल्दी से बात मान लेना इनके लिये मुश्किल होता है और कई बार ये जल्दी से कोई निर्णय नहीं ले पाते। इस राशि के जातक भी भावुक होते हैं और अपने सगी संबंधियों से बहुत जुडे हुये।

आज यहीं तक...बाद में एक छोटे से लेख में मैं पति-पत्नी या किसी जोडे की कुंडली मिलन की कुछ गूढ बातें बताऊंगी। मगर ये तरीका, साधारण रूप से जो ३६ गुण मिलन का होता है, वो नहीं है मगर मैने देखा है कि ये बहुत प्रभावी है। लेख कुछ इस तरह से लिखने कि कोशिश करूंगी कि अगर आप अब तक इस लेख के सारे भागों को पढ रहे हैं तो ज़रूर समझ पायेंगे।

क्रमश: ( प्रकाशन का दिन तय नहीं)...

Tuesday, October 11, 2005

विभिन्न राशियों की विशेषतायें

आपकी राशि क्या है? (यहां पढें)

भाग ३

चलिये अब देखते हैं कि किसी का चंद्रमा के गृहाधिपति का अर्थात राशि का क्या प्रभाव होता है जीवन में...( वैसे एक बात साफ़ कर दूं कि सिर्फ़ राशि की विशेषतायें देखने के अलावा, उस पत्रिकाविशेष में किस ग्रह का कितना प्रभाव है देखना पडता है, मगर अभी के लिये ये देख लेते हैं)...

मेष राशि: इस राशि का स्वामि है मंगल अर्थात इस जातक में मंगल से संबंधित गुण देखने को मिलेंगे। जातक ऐम्बिशस होता है और अडियल भी। गर्म दिमाग का होता है और धैर्य कम दिखायी देता है। जातक स्वार्थी हो सकता है और निडर भी।

वॄषभ राशि: इस राशि का स्वामि है शुक्र और चंद्रमा इस राशि में हो तो उसे उच्च का चंद्रमा कहते हैं, एक तरह से चंद्रमा वृष राशि में बहुत खुश रहता है।जातक में शुक्र के गुण दिखायी देंगे अर्थात वो सौन्दर्यप्रिय होगा, हर काम में पर्फ़ेक्शन की चाह होगी, दोस्तों ( वैसे तो शायद खूब सारे दोस्त न हों, मगर जो हों वो..)के बहुत करीब रहेगा।इस राशि के जातक में कला की ओर रुझान दिखायी देता है, खुद कलाकार न हो मगर कला की सराहना कर सकेगा। ये जातक खाने के भी शौकीन होते हैं।

मिथुन राशि: स्वामि है बुध। और ये एक द्विस्वभाव राशि है। जातक बुद्धिमान होता है और कई चीज़ों में पारंगत मगर कोई भी काम पूरी तरह से नहीं करता ( यानि कि जैक आफ़ आल ट्रेड्स, मास्टर आफ़ नन)। बातचीत में बहुत चतुर और सभा को मुग्ध कर देने वाला होता है। हमेशा बदलाव को पसंद करता है, एक ही काम से बहुत जल्द बोर हो जाता है ( कई बार प्रेम संबंधी मामलों में भी)।

कर्कट राशि: इस राशि का अधिपति है चंद्रमा। यानि कि चंद्रमा अपने ही घर में हो तो राशि हुई कर्कट। अब अपने ही घर में हुआ तो चंद्रमा को बल मिलेगा। जातक काफ़ी सुलझे हुये विचारों का स्वामि होता है और इनका आकर्षक व्यक्तित्व होता है। इन्हें घर-संसार में दिलचस्पी होती है और ये परंपराओं को मानने वाले होते हैं। ये भावुक भी होते हैं।

सिंह राशि: इस राशि का स्वामि है सूर्य। जातक तेजस्वी और आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामि होता है और जहां भी हो ( घर या दफ़्तर) अपनी तरह से काम करने/करवाने की कोशिश करता है। ये लोग अच्छे ऐड्मिनिस्ट्रेटर होते हैं। इनमें लोगों को प्रभावित करने की क्षमता होती है।

कन्या राशि: कन्या राशि का स्वामि है बुध। जातक यथार्थवादी होता है। सुलझे हुये विचारों का स्वामि होता है मगर दूसरे के काम में नुक्स निकालना इनके स्वभाव में होता है। खुद भी ये हर काम ठीक से करने में विश्वास रखते हैं। जिग्यासु ( ग्यान वाला ग्य नहीं टाईप हो रहा) प्रकृति के ये लोग, ईमानदार होते हैं और इनमें सही गलत में पार्थक्य करने की क्षमता बहुत अच्छी होती है। ये न्यायवादी होते हैं।


अगले भाग में अन्य छ: राशियों की विशेषतायें...


क्रमश: (अगला भाग कल प्रकाशित होगा)




Friday, October 07, 2005

पहला लेख ब्लाग पर -२ (ज्योतिष)










भाग -१ के लिये यहां देखें:

भाग २

अब आगे चलते हैं , कुछ और बेसिक्स:

हम बहुत ज़्यादा गहराई में नहीं जायेंगे, मगर आधारभूत कुछ बातों को समझेंगे और जन्म पत्रिका देखने के एक दो गुर सीखेंगे।

हम यहां वैदिक ज्योतिष की बात कर रहे हैं। पाश्चात्य ज्योतिष में ट्रापिकल समय या सूर्य के सामान्य गति को जबकि वैदिक ज्योतिष में ग्रहों के साइडेरिअल स्थान ( जो नक्षत्र से संपर्कित है) को काम में लाया जाता है। वैदिक ज्योतिष की गणनायें इसीलिये ज़्यादा सही मानी जाती हैं। ट्रापिकल और साइडेरिअल वर्ष के फ़र्क को आयनाम्श (ayanamsa) कह्ते हैं । भारत में लाहिडी आयनाम्श के द्वारा अधिकतर गणनायें की जाती है मगर कई ज्योतिषी कुंडली बनाने में अन्य आयनांश का पालन करते हैं। ( मैं खुद कृष्णा आयनांश की सहायता लेती हूं जो बहुप्रचलित लाहिडी आयनांश से ५६ मिनट कम है) । वैसे आजकल सब काम साफ़्टवेयर करते हैं। उस साफ़्टवेयर में पहले से ही आयनाम्श तय होते हैं या पूछे जाते हैं कि आप कौन सा आयनाम्श काम में लाना पसंद करेंगे। लाहिडी सबसे प्रचलित है बहुमत से सही भी माना जाता है। इस बारे में और अलग अलग आयनाम्शों के प्रयोग करने से क्या फ़र्क हो जाता है...हम बाद में चर्चा कर सकते हैं...

अभी बेसिक्स की ओर चलें....

अब जन्म पत्रिका में घर या स्थान तो तय हो गये। लग्न, जैसा कि आप देख सकते हैं ( ये जो ऊपर चित्र है, उत्तर भारतीय पद्धति से बनाई गयी कुंडली है, दक्षिण भारत में इसी कुंडली को अलग तरह से बनाया जाता है।), में एक अंक लिखा है, ८ । ये ८ क्या है? हर घर एक राशि के अधीन होता है और हर राशि के लिये एक अंक निर्धारित है। सिर्फ़ यही नहीं एक ग्रह विशेष उस राशि का स्वामि होता है। हर राशि ३० डिग्री की होता है और १२ रशियां हैं ( हर एक राशि एक घर ले लिये) तो ३६० डिग्री।


ऐसे देखे: ऊपर चित्र में, लग्न ( प्रथम स्थान या पहला घर) ८ के अंतर्गत आता है, यानि कि वृश्चिक ( क्योंकि वृश्चिक का अंक है ८) , तो उस व्यक्ति का लग्न हुआ वृश्चिक अब वृश्चिक का स्वामि कौन? मंगल। अत: इस व्यक्ति का ल्ग्नाधिपति हुआ मंगल। तो हम कह सकते हैं कि इस व्यक्ति में मंगल के गुण दिखायी देंगे, शायद गर्म दिमाग हो, काफ़ी साहसी हो (या दुस्साहसी)....

अब ये अंक देखें...

१. मेष--अधिपति है मंगल
२. वृषभ-- शुक्र
३. मिथुन-- बुध
४. कर्कट-- चंद्रमा
५. सिंह-- सूर्य
६. कन्या-- बुध
७. तुला--शुक्र
८. वृश्चिक-- मंगल
९. धनु--बृहस्पति
१०. मकर-- शनि
११. कुंभ-- शनि
१२. मीन--अधिपति है बृहस्पति

लग्नाधिपति तो मालूम हुआ, अब आपकी राशि क्या है? जी, राशि देखने के लिये देखें कि आपका चन्द्रमा कौन से अंक वाले घर में है? इस चित्र में चंद्रमा ११ में है अर्थात कुंभ। तो उस व्यक्ति की राशि हुई कुंभ और व्यक्ति का व्यवहार, स्वभाव शनि (क्योंकि शनि कुंभ का अधिपति है) के गुणों के प्रभाव में रहेगा। लग्न और राशि व्यक्ति विशेष की शारिरिक रचना व मानसिक रचना या सोच दर्शाने में सहायता करती है।

चलिये अब आपको एक लिंक दे दूं जहां आप अपनी कुंडली बना सकते हैं और अपना लग्न और राशि पता कर सकते हैं। आपको चाहिये आपका जन्म स्थान, जन्म समय, और जन्म तिथि।
पहले तो आप इस लिंक से अपने जन्म स्थान का lattitude/longitude पता कर सकते हैं। फिर इस लिंक पर जा कर अपनी कुंडली बनाइये...और देखिये आपका लग्न क्या है और आपकी राशि क्या है और आपके कौन से स्थान (या घर) में कौन सा ग्रह स्थित है। (नोट: अगर आप भारत में पैदा हुये हैं तो ५ घंटे ३० मिनट पूर्व का टाईम ज़ोन होगा।)

अगले भाग में आपकी राशि की स्वभावगत विशेषतायें ( आप देखेंगे कि लग्न और राशि दोनों के स्वभाव का आप पर मिला जुला प्रभाव हो सकता है)...


क्रमश: ( प्रकाशन का कोई निश्चित दिन तय नहीं...)

Thursday, October 06, 2005

पहला लेख ब्लाग पर - १


आज अनूप शुक्ल जी के कहने पर गद्य लिखने का प्रयास है। ऐसा नहीं कि गद्य लिखा नहीं मगर बहुत वक्त लग जाता है गद्य लिखने में। अब अनूप जी ने ही कहा कि "मैं क्यों लिखती हूं" इस बात पर लिख डालो। सच, मैं क्यों लिखती हूं? जब ये लिखने की कोशिश की तो कुछ लिखते ही नहीं बना। तब अनुप जी की बात याद आई, जो तुम्हें अच्छा लगे वो लिखो। हां तो मुझे क्या अच्छा लगता है। पर अगर मैं वो लिखूं जो मुझे सचमुच बहुत अच्छा लगता है तो मुझे पता है मेरे पास कुछ पर्सनल ईमेल्स आयेंगे , पर ठीक है, हां यही विषय ठीक है, उसी पे कुछ लिख डालूं.....ज्योतिष

जी, मैं ने ज्योतिष पर अपने अब तक के जीवन का काफ़ी समय खर्च किया है। ज्योतिष का शौक हुआ मुझे जब मैं मास्टर्स कर रही थी। मास्टर्स तो रसायन शास्त्र में कर रही थी मगर किताबें ज्योतिष की पढती थी, मम्मी से छुपा कर ( उस उम्र में भी, अब शर्म आती है, अपने गैर ज़िम्मेदार होने पर)। खैर, हमारे घर के ऊपर ( क्वाटर्स में रहते थे हम) एक अंकल रहते थे, उन्होने ही मुझे ज्योतिष के बेसिक्स सिखाये। मगर बेसिक्स सीखने से कुछ भी नहीं होता, ये मुझे आज मालूम है, क्योंकि किसी कुंडली को देखने के लिये, उसे सही पढने के लिये बेसिक्स के अलावा बहुत कुछ जानना ज़रूरी होता है, और फिर जानने से भी कुछ नहीं होता, अनुभव से, बहुत सारी जन्म कुंड्लियाँ देख कर अपने निर्णय लेने की क्षमता पर धीरे धीरे भरोसा होने लगता है। ज्योतिष द्वारा की गयी कई भविष्यवाणियाँ जब सही होने लगीं तो साइंस की छात्रा होने की वजह से जो मन की दुविधा थी, वो कहीं मार खाने लगी और इस विद्या पर यकीं होने लगा। ये बात समझ में आई कि ज्योतिष गलत नहीं ज्योतिषी गलत होते हैं। काफ़ी किताबें पढीं ज्योतिष पर, मगर सबसे अच्छा माध्यम रहा...इन्टर्नेट। बहुत सारे ज्योतिषियों से मुलकात हुई और बहुत सारी जन्म कुंडलियों को देखने का मौका मिला और उनसे सीखने का। ये तो जीवन भर सीखने वाली विद्या है, तो मेरी पढाई तो कभी पूरी नहीं हो सकती मगर इससे ज़्यादा दिलचस्प कोई और पढाई नहीं।

आइए ज्योतिष के कुछ आधारभूत बातों को जानें। फिर हो सकता है इसे पढ कर सचमुच कोई ज्योतिष की तरफ़ इतना आकर्षित हो जाये कि मेरा पर्सनल ईमेल पहुँचे उस तक....

शुरुआत करते हैं ग्रहों से। कुल मिला कर ज्योतिष में ( जो हमारे जीवन को प्रभावित कर सकते हैं) ९ ग्रह माने गये हैं। इन में से दो को छाया ग्रह कहा गया है- राहु और केतु।
सूर्य, चन्द्रमा ( हां ये ग्रह नहीं पर ज्योतिष में उन्हें ऐसे ही सम्बोधित किया जाता है), मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, और शनि के साथ राहु और केतु।
रवि या सूर्य को क्रूर ग्रह माना गया है, शनि, मंगल को पापग्रह और बृहस्पति, चन्द्रमा और बुध को शुभ। यानि कि ये ग्रह अपनी अपनी योग्यता अनुसार फल देते हैं ( ध्यान रहे, ऐसा भी ज़रूरी ही नहीं कि पापग्रह हमेशा बुरा ही करें, क्यों कि अभी तो ये सिर्फ़ बेसिक्स हैं)।

जन्मकुंडली बनाने के लिये सही जन्म दिन, जन्म समय और जन्म्स्थान (longitudr/lattitude) ज़रूरी होते हैं। आज कल कुछ अच्छे साफ़्ट्वेयर हैं जो बिल्कुल सही जन्म कुंडली बना देते हैं जैसे होरा लाईट, कृष्ना, आदि।

जन्म कुंडली में १२ घर होते हैं और हर एक घर का अपना महत्व होता है।
घर १ जिसे लग्न कहते हैं (ऊपर चित्र में नीले रंग से AS यानि कि Ascendent) उस व्यक्ति विशेष की शारीरिक अवस्था, रंग रूप, कद काठी, चिन्तन प्रक्रिया इत्यादि को बताता है
घर २ ( बाईं तरफ़ जहां ९ लिखा है वो दूसरा घर है, अब ९ क्यों लिखा है ये बाद में) धन, परिवार, शादी का कारक, इत्यादि होता है
घर ३ ( जहां १० लिखा है) पराक्रम, भाई, इत्यादि...
घर ४ ( जहां ११ लिखा है) माता, मकान, पढाई लिखाई, सुख इत्यादि को दिखाता है। इसी तरह सारे घर जीवन के विभिन्न पहलुओं को दिखाते हैं। अब कुंडली बनाने पर पता चलता है कि इन घरों में कोई न कोई ग्रह आ कर बैठता है। ( ऊपर देखें) यानि कि अगर आपको दिखे कि सातवें घर में चंद्रमा बैठा है तो आप अनुमान कर सकते हैं कि शायद ( और बहुत चीज़ें देखनी होती हैं पर फिर भी साधरणत:) बीवी या शौहर खूबसूरत हो, घरेलु हो क्योंकि सातवां घर पति या पत्नी स्थान माना जाता है। इस चित्र में सातवें स्थान पर ( बाईं तरफ़ से घर गिन कर देखें) सूर्य बैठा है तो शायद पति या पत्नी काफ़ी तेजस्वी हो, अधिकारी हो। कुछ घर खाली भी रह जाते हैं, वहां कोई ग्रह नहीं होता, मगर ये नहीं कि जीवन का वो पहलू खाली ही रह गया यानि कि अगर सातवें स्थान पर कोई ग्रह नहीं तो शादी ही न हो उस आदमी की...ऐसा नहीं होता... याद रखें, अभी भी हम बेसिक्स में हैं।

अनूप, रवि, जीतू और भी सभी...आप इतने बडे बडे लेख कैसे लिख लेते हैं...हम तो थक गये लिखते लिखते...
आगे और बेसिक्स बाद में...